अग्रसेन की बावलीः पीके फिल्म से लोकप्रिय हुई जगह, जिसके बारे में कई अनसुनी बातें हैं

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अग्रसेन की बावली एक संरक्षित पुरातात्विक स्थल है, जो नई दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास स्थित है। इस बावली की बनावट और शैली आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। अंधेरे से सराबोर इस बावली को दिल्ली की डरावनी जगहों में से एक माना जाता है। बावली से जुड़ी कुछ खास बाते यहां साझा की जा रही हैं।

बावली

बावली का अर्थ होता है सीढ़ीदार कुआं। इन कुओं का निर्माण बरसात का पानी इकट्ठा करने के लिए किया गया था लेकिन पुराने जमाने में बनाई गई ज्यादातर बावड़ियां अब सूख चुकी हैं। बरसात के मौसम में इनमें पानी न के बराबर ही होता है। अग्रसेन की बावली भी सूखा कुआं बन चुकी है जिसमें अब कबूतर और चमगादड़ रहते हैं। अग्रसेन की बावली के गार्ड ने बताया कि साल भर में सरकार 2-3 बार सफाई करवाती है। सफाई करने की वजह वो पैसा रहता है जो लोग कुएं में चढ़ावे के तौर पर डाल देते हैं।

अग्रसेन की बावली का प्रवेश द्वार।

इतिहास और बनावट

अग्रसेन की बावली का इतिहास आज तक रहस्य है क्योंकि माना जाता है कि इस बावली को महाभारत के समय में बनाया गया था। देखने में यह बावली काफी पुरानी लगती है। 14वीं शताब्दी में राजा अग्रसेन ने इसका पुनर्निर्माण करवाया था। बाद में अग्रवाल समाज के लोगों ने इसका जीर्णोद्धार कराया। इस इमारत में लगे लाल व बलुए पत्थर आपको इतिहास की झलक दिखा देते हैं।

108 सीढ़ी उतरकर इसकी चौड़ाई 15 मीटर और लंबाई 60 मीटर पता चलती है। बावली की स्थापत्य शैली तुगलक व लोदी काल से मेल खाती है। बावली भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ओर अवशेष अधिनियम 1958 के तहत भारत सरकार द्वारा संरक्षित है।

बावली से जुड़ी कहानियां सच या अफवाह

कहा जाता है कि अग्रसेन की बावली में अक्सर दिल्ली के लोग तैराकी का लुत्फ उठाने आते थे। फिर धीरे-धीरे बावली का पानी काला होने लगा और उस काले पानी में ऐसा सम्मोहन था कि लोग खुदखुशी करने लगे। चूंकि बावली काफी गहरी और पुरानी है इसीलिए बावली के ऊपर कई अफवाएं सुनने को मिल जाती हैं। जैसे कि बावली को भूतिया करार देना।

अग्रसेन की बावली को अपने पन्ने पर उकेरते कलाकार

सैलानियों की संख्या में इजाफा

बावली में पैरानॉर्मल गतिविधियां होने की अफवाहों के कारण भी ये लोगों के बीच आकर्षण का केन्द्र है। ये रहस्य लोगों को आकर्षित करते हैं। फोटोग्राफी करने के लिए यह बावली काफी प्यारी है। पहले बावली के बारे में लोगों को अधिक जानकारी नहीं थी जिसकी वजह से सैलानियों की संख्या बहुत कम थी। जबसे यह अग्रसेन की बावली को बॉलीवुड की पीके समेत अन्य फिल्मो में दिखाया गया है तबसे ये लोगों के आकर्षण का बड़ा केन्द्र बन गया है। अब यहा बावली लोगों से भरी रहती है।

बावली देखने के लिए आप सप्ताह के किसी भी दिन सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे के बीच आ सकते हैं। बाराखंभी मेट्रोस्टेशन से भी पास है जहां से आप आसानी से पैदल भी पहुंच सकते हैं।


अग्रसेन की बावली के बारे में हमें बताया है मोना सिंह ने। मोना दिल्ली में रहकर पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही हैं। अपने बारे में बताते हुए कहती हैं, हर काम को दिल से लगाना और दिमाग से करना फितरत है मेरी। बोलने से ज्यादा सुनने में यकीन रखती हूं और मन में चल रही उथल-पुथल को शब्दों में पिरोना मुझे हमेशा से पसन्द हैं।


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