अलवर: क्या हर छोटे शहर में औरतों की नियति घरों में दुबका रहना होता है

अलवर के प्याऊं के पास बैठी महिला

अलवर, ट्रेन से जाओ तो दिल्ली से तीन-चार घंटे लगते हैं। मतलब जयपुर से कम दूरी पर। मतलब यार, जल्दी से पहुंच जाएंगे। हां, तो चल यहीं चलते हैं। ये बातें मेरी एक दोस्त मुझसे कह रही है, जिसे लंबे रास्तों से डर लगता है लेकिन घूमने का मन भी बड़ा करता है। और मैं तो, कहीं भी घूमने के लिए एवररेडी रहती हूं। अलवर कभी गई भी नहीं थी। रात में बात हुई थी और अगली दोपहर भोजन कर हम दोनों निकल पड़े। बिना कुछ गूगल किए और सस्ते से सस्ते में ट्रैवेल करना है, ऐसी धुन चढ़ी थी। ट्रेन का रास्ता थोड़ा बोरियत भरा था, लेकिन हमारी चटपट बातों से काम चल रहा था।

राजस्थान में एंटर करते ही मौसम का मिजाज बदलने लगा। दिल्ली में तो गर्मी चरम पर थी लेकिन यहां थोड़ी बदली नजर आने लगी थी। ट्रेन से दिखते इलाकों में आबादी धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। हम दोनों अपनी सीट छोड़ ट्रेन के फाटक पर जा बैठे। हल्की बूंदाबांदी भी शुरू हो गई थी। मस्त हवा चल रही थी। थोड़ा रोमांच सा फील हो रहा था। क्योंकि इससे पहले हम दोनों में से किसी ने भी फाटक पर बैठकर सफर नहीं किया था, अब तक बस लड़कों को ऐसा करते देखा था, मन में ऐसा करने की उमंगें तो उठती थीं लेकिन अब तक ऐसा कोई मौका नहीं मिला था। अभी कुछ ही समय तो हुआ था, अकेले सफर करते हुए। जब वहां बैठे हवाओं से बातें कर रहे थे तो मन हुआ फेसबुक पर लाइव जाने का। लेकिन घरवाले नाहक ही चिंतित हो जाएंगे, ये सोचकर छोड़ दिया। वैसे फाटक पर बैठकर सफर करना, बड़ी सही बात नहीं है, लेकिन कभी-कभी नियम तोड़ने का अपना ही मजा है।

हंसते-बतियाते हम अलवर पहुंच गए। गूगल तो किया नहीं था, तो वहां पहुंचकर मालूम चला कि बहुत ही छोटा सा शहर है अलवर। बिल्कुल साधारण सा। वही फैजाबाद जैसी आटा-चक्की, अग्रवाल धर्मशालाएं, सब्जी के ठेले के नीचे कुचलकर कीचड़ बना दी गईं पुरानी सब्जियां, कूड़े के ढेर से खाना जुगाड़तीं गायें। हमने रिक्शा लिया और रिक्शेवाले से बोला कि सस्ती वाली धर्मशाला में ले चलो। उसने हमें गुरुद्वारे के सामने एक धर्मशाला में छोड़ा। तीन सौ का कमरा था। ठीक ही था। लेकिन रात में कमबख्त मच्छरों ने रुला दिया। सस्ता कमरा हमारी नींद के लिए काफी मंहगा पड़ गया।

सोने से पहले हमने सोचा, आस-पास का एक चक्कर लगा लिया जाए। हमने ई-रिक्शा लिया और शहर के सबसे बड़ मॉल के पास पहुंच गए। रास्ते भर हमें एक अलग सी नजरें पीछा करती रहीं। एक लड़की के लिए अजनबी सी नजरें कोई नई बात नहीं है। लेकिन ये इरीटेटिंग नजरें दिल्ली से काफी अलग थीं। धीरे-धीरे समझ आने लगा, रात के नौ बज चुके हैं और दो लड़कियां अकेले, बिना परिवार के क्यों घूम रही हैं। हमने इन नजरों को अपना लिया और खाने-पीने, सामान खरीदने में मशगूल रहे। जब लौटने की बारी आई तो रिक्शे ढूंढना पड़ा। क्योंकि अलवर में नाइटलाइफ जैसा कुछ नहीं है, और ये हर छोटे शहर की कहानी है। एक रिक्शावाला आया, हमसे बोला, आइए मैडम आपको हम सुरक्षित छोड़ देंगे। सुरक्षित शब्द पर उसने थोड़ा ज्यादा दबाव डाला था। कमरे पर आकर मच्छरों से एक और जंग लड़नी थी।

अधूरी नींद लिए हुए हम सुबह जल्दी उठ गए। इस कमरे को छोड़कर बस भागना था। किसी ने बताया था, अलवर की कचौड़ियां काफी मशहूर हैं। दोस्त अभी अलसाई सी थी, मैं फटाफट पास के एक नुक्कड़ पर पहुंच गई कचौड़ियां लेने। सुबह के साढ़े सात बज रहे थे। और इस वक्त भी सड़कों से लड़कियां गायब थीं। कल शाम और रात को हमें लगा था, शायद तय समय सीमा की वजह से इस वक्त लड़कियां घरों के अंदर होगीं। लेकिन अब समझ आ रहा था, ये शहर सिर्फ क्षेत्रफल में ही छोटा नहीं है, दिमाग के आयतन में भी छोटा है।

इसी विचार क्रम के बीच मैं कचौड़ी की दूकान के सामने खड़ी थी। बीसियों लोग वहां खड़े होकर कचौड़ी-सब्जी खा रहे थे, लेकिन उनमें से लड़की एक भी नहीं थी। दूकानदार ने पूछा, कितना पैक कर दूं? मैंने तपाक से कहा, क्यों, पैक क्यों करना, मैं यहीं खाऊंगी। दूकानदार ने अचरज से मुझे देखा, यहां! अरे पैक कर देते हैं। मैंने न में सिर्फ हिला दिया और वहीं उन सब कुंद पड़ चुके दिमागों के बीच खाने लगी। दोस्त के लिए पैक कराकर जब लौट रही थी तो ऐसा लगा मानो कचौड़ी गले में ही अटक गई है। मैंने फोन निकाला और फेसबुक पर अपडेट किया, पैट्रिआर्की रन्स इन द ब्लड ऑफ अलवर। साथ ही सुबह की इस कचौड़ी वाली घटना भी लिख डाली। एक सीनियर ने इस पोस्ट पर रिप्लाय किया, ये तुमने बहुत अच्छा किया कि उसे जवाब देकर चौंका दिया। अब उसे एक बार को ही सही, ऐसा करना अजीब और गलत लगेगा। रूढ़ियों को ऐसे चौंकाते रहना बहुत जरूरी है।

दोस्त अब तक नहा-धोकर तैयार हो चुकी थी। मैंने भी फटाफट अपना नित्यकर्म निपटा डाला। उसके साथ एक बार फिर से मैंने चाय-कचौड़ी का मजा लिया। फिर धर्मशाला के लॉकर में बैग रखकर हम निकल लिए। घूमने के लिए पहला मुकाम तय किया, बाला किला। कोई भी रिक्शा वाला तीन सौ के नीचे में चलने के लिए तैयार नहीं था। हमें इतने पैसे फूंकने नहीं थे। हम और विकल्प तलाशने लगे। इतने में एक कार हमारे पास आकर रुकी। दो युवक थे उसमें। उन्होंने हमें बताया कि वो भी उधर जा रहे हैं, हम उनके साथ चल सकते हैं। थोड़ा अचकचाहट हुई पहले, फिर लगा घुमक्कड़ों को लिफ्ट लेने में सकुचाना नहीं चाहिए। मजेदार इंसान थे वो दोनों। उनके मुताबिक, हमें जो अब तक कटु अनुभव हुए, अलवर उसके अलावा बहुत कुछ है।

उनकी बातें जल्द ही सही साबित होने लगीं। हम बाला किले की ओर बढ़ रहे थे, रास्ते में घने जंगल, पथरीले रास्ते और उन पर विचरते खूब सारे मोर। मौसम ने एक अंगड़ाई ली। तेज धूप अब बादलों से छनती ठंडक में बदल चुकी थी। बाला किला काफी जर्जर हालात में है। मुख्य भवन में प्रवेश वर्जित था। लेकिन उन दो लोकल लड़कों की वजह से हमें ऊपर जाने की इजाजत मिल गई। किले की छत से समूचा अलवर दिख रहा था।

बाला किला का एक हिस्सा

अब हमारा भी मिजाज नर्म होने लगा था। वो दो लड़के दोस्त बन चुके थे। मैंने अब उनसे पूछा कि आप दोनों तो कई बार यहां घूम चुके होंगे, आज फिर से यहां आने की वजह? तब उन्होंने राज खोला, अरे आप दोनों को देखते ही लग गया कि बाहर से आए हो आप। रिक्शेवालों के चक्कर में बेवजह परेशान हो रहे थे, तो हमें लगा आपकी मदद करनी चाहिए। मैं और मेरी दोस्त हंस दिए।

हवेली, जिसे अब होटल बना दिया गया है

वो दो लड़के और हम दोनों मिलकर अब चार दोस्त हो चुके थे। वो हमें लंच के लिए एक हवेलीनुमा होटल गए। मजेदार थी वो जगह। घी में डूबा बाटी-चूरमा खाकर हमें लगा कि अब तो तीन-चार दिनों तक भूख ही न लगने वाली। खाना खत्म होते-होते तेज बारिश होने लगी थी। उनमें से एक ने बोला कि अब तो सिलीसेढ़ लेक जाने में और भी मजा आएगा। हमारे चेहरे पर प्रश्नवाचक चिन्ह देखकर वो बोले, चलो वहां, फिर समझ आएगा। अरिजित सिंह के गानों को अपने बेसुरे गले से बिगाड़ते हम चारों सिलीसेढ़ की तरफ बढ़ चले। कार जहां रुकी, वो जगह सच में हसीन थी। एक बहुत बड़ी झील थी वहां, खूब सारी हरियाली और बारिश की वजह से मिट्टी की सोंधी खुशबू। बारिश का टिपटिप पानी झील पर उछ्लकर नृत्य कर रहा था। लेक पर ही एक अच्छा सा बार था। रूफटॉप था, वहां बैठकर हम अपने ड्रिंक एन्जॉय करने लगे। काफी देर वहीं बैठ प्रकृति के इस रूप को निहारते रहे। शाम ढल चुकी थी, बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। अब हमें वापस लौटना था।

सिलीसेढ़ लेक का एक हिस्सा

रात में भानगढ़ जाने का प्लान बना, लेकिन आधे रास्ते में जाकर हमें वापस लौटना पड़ा। घटाटोप अंधेरे और फोन की बैट्री खत्म होने की वजह से हमें आगे बढ़ना ठीक नहीं लगा। उन दोस्तों के साथ हम रेलवे स्टेशन आ गए। उन्होंने हमसे कहा, आप यहां स्टेशन पर मत रुको ट्रेन के इंतजार में। सुबह चले जाना, अभी होटल ले लो। ये दिल्ली नहीं है, यहां स्टेशन पर बैठना सेफ नहीं है। हमने उन्हें आश्वस्त किया, हम बिल्कुल ठीक हैं यहां। ‘सेफ नहीं है’, वाली बात ने हमारे अंदर थोड़ी देर के लिए रुकी उसी टीस को फिर से जगा दिया। अच्छा तो अलवर शायद हसीन सा इसलिए लगने लगा था क्योंकि हम दो लड़कियां अकेले नहीं घूम रही थीं। दिलोदिमाग को घेर चुके भारीपन के साथ रात के तीन बजे हमने दिल्ली की ट्रेन ले ली।

और हां, इस पूरे सफर में हमें खुद के लिए कहीं असुरक्षा नहीं महसूस हुई। जो भी असुरक्षा का भाव था, वो लोगों के मन में था। लोगों को ये बात हजम करनी शुरू कर देनी चाहिए, लड़कियां भी वैसे ही अकेले सफर करने में सक्षम हैं, जैसे कि लड़के। सुरक्षा दोनों के लिए ही जरूरी है। सेफ्टी के नाम पर लड़कियों को अपने पांव बांध नहीं लेने चाहिए, यही बात उनके परिवार, दोस्तों, समाज को भी समझनी चाहिए। बस एक बात याद रखिएगा, बहादुरी और बेवकूफी में बस थोड़ा सा फर्क होता है। खूब घुमक्कड़ी करिए, दिमाग खुला रखिए, किसी भी तरह की अप्रिय घटना से निपटने के लिए अपने विवेक का इस्तेमाल करिए। लेकिन सेफ्टी के नाम पर कुछ लोगों की बंदरघुड़की से डरिए मत।


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