काशी में ही इतना आकर्षण हो सकता है, जो अजनबियों को भी अपना बना ले

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फोटो: प्रज्ञा श्रीवास्तव

‘का भैया कहवां जाएके बा’, लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डे पर उतरते ही हाथ से सामान छीनते हुए एक बनारसी ने बहुत ही मनोरम भाव से पूछा मुझसे। बिना कुछ सुने ही उस बनारसी ने मेरा हाथ पकड़कर अपनी गाड़ी के पास ले गया सारा सामान ऊपर कैरियर पर रख के कहा, ‘आवा भैया बइठा, कहवां जाईब?’ मैंने भी उसी स्टाइल में जवाब दिया, ‘मीरापुर बसहि में आपन घर बा, ओहिजे ले चला।’ गाड़ी में बैठकर हवाई-अड्डा प्रांगण से बाहर निकलते ही काशी के रोड पर चल पड़े। थोड़ी दूर चलते ही याद आया कि काशी को क्योटो बनाने के लिए बहुत वादे किए गए थे पर गाड़ी में हो रहे उछाल को देखकर लग रहा था कि अभी उसमें बहुत समय है।

टई साला सब घर हटा-हटा के रोड काट दिया है पर बनेगा कब, नहीं पता, बताव मर्दे, अधिकारी लोग आके डरा-धमका के सारा घर, दुवार हटवा दिहिस पर रोड के नाम पे खाली गढ्ढा बनाकर रख दिया है।’ दिल्ली से दूर बाबा के धाम में राजनीति बतियाने का मन नहीं हुआ तो बात को घुमाकर हमने पूछा, ‘छोड़ हो ई सब, ई बतावा कहां रहे ल, काशी दर्शन करा दोगे हमारा?’ ‘कहे न कराइब भैया? प्रभु के नगरी में आइल बानी दरशन त कराइये देब।’ उनका नाम, घर के हालात, बीवी-बच्चे, ससुराल, जाती और नंबर पूछते हुए हम गाड़ी से उतर गए।

घर पहुंचने के बाद मिट्टी के कुल्हड़ में लस्सी और दालमोट मिला, खाने से पहले फोन में एक ठो फोटो लेकर वॉट्सएप पर भी चिपका दिए। फिर दो गिलास लस्सी पिये। रात्रि भोजन में रोटी और पनीर की सब्जी बनी थी, भर पेट खाये, फिर सो गए। काशी का एक अलग ही आनंद हृदय में था, 11 बजे उठने वाला दिल्ली का लौंडा 6 बजे बिहान में ही उठ गया। थोड़ा गली-मोहल्लों में घूमे, दांत घिसे, फिर घर के बाहर छकौड़ी के समोसे खाने निकल गए। छकौड़ी, 1967 से ही हमारे घर के बाहर समोसे बेचता था, अब उसका लड़का बैठता है। माटी के कटोरी में 2 समोसे फोड़ा, ऊपर से छोले डाला, थोड़ा हरा चटनी, चाट मसाला और एगो लकड़ी का चम्मच खोस दिया। जैसे ही पहला कौर खाये, ऐसा लगा कि ये समस्त प्रकृति अपनी कोमलता निचोड़कर उस एक कौर में समाहित कर दिया है। समोसे के बाद लौंगलत्ता खाये, वो भी मस्त था।

खा-पीकर घर लौट आये, आज सबसे पहले सारनाथ का प्लान बना था। वो नजदीक भी था। संतोष भैया को भी हम बोल दिए थे कि ग्यारह बजे तक आ जाइयेगा। संतोष भैया भी अपनी गाड़ी साढ़े दस पर ही दुवारी पे लगा दिए, अपने मौसा-मौसी के साथ ग्यारह बजे तक गाड़ी में बैठ गए और बनारस के ट्रैफिक को भेदते हुए चल दिये।

‘दू पड़ाका देब एहिजे गिर जइबे’, जाम को भेदने के लिए ये मूल मंत्र होता है बनारस में। अगर आपने इसका चार जगह सही उच्चारण कर लिया तो समझ लीजिए कि जाम क्या नॉर्थ कोरिया वाला सनकी भी अपनी सनक मिटा दे। खैर, बोलते बतियाते सारनाथ पहुंचे। पहुंचते ही ढेरों गाइड पीछे लग गए। वो तो भला हो संतोष जी का जो ‘दू पड़ाका’ वाला मंत्र बोलकर सबको भगा दिए।

घूमने की शुरुआत हुई सारनाथ के चिड़ियाघर से, वैसे तो जब एक बार दिल्ली के चिड़ियाघर गया था तो तय कर लिया था आगे से कभी इस नरक में कदम नहीं रखूंगा, जहां जानवरों को कैद में रखा जाता है। पर सारनाथ की बात अलग थी, वहां के हर जानवर का भरण-पोषण कोई खास व्यक्ति कर रहा था। जैसे चिड़ियों की देखभाल बी.एच.यू के कोई प्रोफेसर साहब कर रहे थे, मनोरम दृश्य था। सारनाथ के तालाब में बोटिंग भी की। चिड़ियाघर घूमते- घूमते मंदिर का कपाट खुल चुका था। बोधगया से लेकर सारनाथ तक एक ही उच्चारण की गूंज थी, बुद्धम शरणं गच्छाम। मंदिर में घुसते ही एक अलग सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त हुई।

पूरा सारनाथ घूमने के बाद मंदिर के बाहर ‘रीमा काकी का चाट’ नाम का एक ठेला दिखा, भूखे-प्यासे पेट ने अपने आप ही मेरे कदम उधर बढ़वा दिए। जाते ही पहले तो 12 गोलगप्पे खाया। काकी बोलीं, बेटा हमार यहां के ‘टमाटर चाट’ खा के जा।’ अब भूखे तो पहले से ही थे, इस आग्रह को मना नहीं कर पाए। जिस प्रकार वो बना रहीं थी ऐसा लग रहा था मानो कोई कवि अपने अंदर की उफान को अपने शब्दों से तृप्त कर रहा हो। चेहरे पर बनारसी मुस्कान, तवा से उठता धुआं, सब मेरी भूख और बढ़ा रहे थे। तभी एक छोटा मटका मेरी तरफ आया जिसमें ऊपर तक कुछ लाल-लाल मसालेदार चीज रखी हुई थी। उसपर भी एक लकड़ी का चम्मच रखा हुआ था। मन की तृप्ति और शांति दोनो मिल गयी, बुद्ध का भी असली सुख वहीं मिला। ये सब कर-कुराकर, संतोष भैया को विदा कर हम अपने घर चले आए।

दूसरे दिन काशी के दूसरा छोर घूमने का प्लान बना, संतोष भैया पहले की तरह ही आ गए थे। वही ग्यारह बजे गाड़ी में बैठ कर चल दिये बनारस देखने। सबसे पहले संतोष भैया ने नया वाला काशी विश्वनाथ घुमाना तय किया, जो कि बी.एच.यू में स्थित है। दिल्ली वाले जे.एन.यू के बाद काशी वाले बी.एच.यू ने खूब लुभाया, बस ईंटों का रंग लाल से पीला हो गया था। ‘भैया एगो सवाल पूछेंगे, सही उत्तर दे दिए तो पूरा का पूरा काशी दर्शन हमारी तरफ से’, संतोष भैया ने हमारे घुटना पर एक ठो पड़ाका मारते हुए बोला। हमने भी अकड़ में आकर बोल दिया, पूछिये। ‘ई जो बी.एच.यू है, इसको हिंदी में काशी हिंदू विश्वविद्यालय बोलते हैं लेकिन अंग्रेजी में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, बोलिये काहे?’, संतोष भैया ने पूछा। सवाल सुन के तो आंखें चौंहिया गयी, सिट्टीपिट्टी गुम। मन में खुद को कोस रहे थे कि थोड़ा पढ़ लिए होते तो आज बनारस फ्री में घूमने मिल जाता। खैर, हमने उदास चेहरे से कहा, नहीं पता भैया।

फिर संतोष भैया ने बताया कि जब मदन मोहन मालवीय ने पूरा विश्वविद्यालय खड़ा किया तो अंग्रेजों को इसके ‘काशी’ नाम से बहुत दिक्कत थी तो मालवीय जी ने अंग्रेजों से बोला कि ‘इस विश्वविद्यालय की ईंट-ईंट पर काशी लिखा है, अगर नाम बदलना है तो पूरा विश्वविद्यालय फिर से बनवाना पड़ेगा।’ तब से ही बी.एच.यू के अंग्रेजी और हिंदी नाम में फर्क आ गया।

यहीं सब बोलते-बतियाते हमलोग नया वाला विश्वनाथ मंदिर गए। मंदिर में दर्शन किए, टीका किए, फिर बाहर आये। संतोष भैया ने बोला कि बाहर जो लस्सी वाला लगाया है उसकी लस्सी बहुत मस्त होती है। मौका न गंवाते हुए दो गिलास लस्सी पिये। सचमुच वैसी लस्सी कहीं नहीं पिये थे। मिट्टी के गिलास में दही की दो इंच मोटी मलाई के साथ, ऊपर से केसर, काजू, बादाम। आहा!!

फोटो: प्रिया सिंह

फिर संकट मोचन, दुर्गा कुंड, मानस मंदिर। सब निपटा डाले। इतना नेता लोग चुनाव के टाइम में मंदिर नहीं जाते होंगे जितना हम एक दिन में हो लिए। अब बारी आई काशी की आत्मा, गंगा घाट की। जीवन की शुरुआत और अंत, दोनो ही काशी है। एक तरफ मणिकर्णिका घाट पर लोग मोक्ष के लिए अंतिम अग्नि लेते हैं वहीं दूसरी ओर कुछ नौयुवक उसी दिव्य अग्नि को एक नई ऊर्जा के साथ मां गंगे को भेंट करते हैं। बहुत मनमोहक और भव्य दृश्य होता है गंगा आरती का। हमारी गंदगी से मैली हो चुकी गंगा की शुद्ध आत्मा उस आरती और कीर्तन में बसती है।

काशी भ्रमण से पहले मैं भी बिना किसी मजबूत तर्क वाली नास्तिकता के साथ जी रहा था। धार्मिक तो नहीं पर काशी ने आध्यात्मिक जरूर बना दिया।


दिलबर बनारस में विचरते हुए बिताए गए दिनों के बारे में हमें लिख भेजा है निलय निरुपम ने। निलय पत्रकारिता के छात्र हैं। निलय को इतिहास और राजेनीति में विशेष रुचि है। वो बताते हैं कि नई-नई जगहों को देखने में एक अलग ही मजा आता है। लजीज खानों के बड़े शौकीन हैं। जानवरों से खूब प्यार है। लोगों से बातें करना बड़ा पसंद है। दोस्ती निभाने में तो उस्ताद हैं। देश-दुनिया के तमाम मुद्दों पर बेबाक राय रखते हैं। 


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