बस्तर 8: समृद्ध आदिवासी व्यवस्था या केवल अज्ञानता और कम जागरूक लोग!

(दंतेवाड़ा के परचेली गांव में इससे पहले का सफर यहां पढ़ें)

परचेली गांव से वापसी के रास्ते में एक आदिवासी महिला सिर पर दो बड़े स्टील के मटके, गोद में एक बच्चा और एक बच्ची को उंगली से पकड़े जा रही थी। वो काफी कमजोर दिख रही थी। करीब आने पर देखा कि उसके और उसकी बच्ची के माथे पर छोटी-छोटी काली बिंदियों जैसा कुछ लगा हुआ है।

मैंने उन्हें रोका और अपने साथ चल रहे स्थानीय लड़के से उनकी भाषा में पूछने को बोला कि क्या वो ठीक हैं? लड़के ने उस महिला से पूछकर बताया कि उसे और बच्ची को तेज बुखार है। दोनों ही बच्चों का पेट बाहर की ओर निकला हुआ था। बच्चे कुपोषण के शिकार थे। मुझे बीजापुर के गंगालूर गांव के बीएमओ की बात याद आ गई कि इस इलाके के 95 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं।

बच्ची बुखार से तप रही थी। मैंने दोनों बच्चों को कुछ बिस्कुट दिए। दोनों बच्चों के बदन पर केवल एक छोटा सा कपड़ा था। महिला उन्हें नदी में नहलाने ले जा रही थी। मैंने उन्हें ऐसा करने से मना किया। लेकिन भाषाई दिक्कत की वजह से वो समझ नहीं पाईं। महिला इतनी कमजोर थी कि मुझे उन्हें खड़ा करके समझाना भी सही नहीं लगा।

उनके जाने के बाद लड़के ने बताया कि ये काले निशान गर्म लोहे की रॉड से माथे को दागने से हुआ है। गांव में लोग बीमारी से ठीक होने के लिए ऐसी विधियों का उपयोग करते हैं। उस बच्ची को कितना दर्द हुआ होगा जब उसे गर्म लोहे से दागा जा रहा होगा। ये उस गांव का हाल है जहां स्वास्थ्य विभाग की पहुंच है। अंदर के गांवों में जाने कैसा अंधेरा फैला होगा।

वहां से चलते हुए हम गाड़ी तक पहुंचे। उन दोनों को शुक्रिया बोलकर गाड़ी आगे बढ़ चली। रास्ते में गाटम, जारम, मेटापाल जैसे गांव पड़े। गाटम में कुछ ग्रामीणों से बात की। हर एक गांव में शिक्षा-स्वास्थ्य-सुविधाओं से जुड़ी वहीं समस्याएं नजर आईं। गाटम से गाड़ी आगे बढ़ी तो हम एक पहाड़ी रास्ते पर पहुंचे। खूबसूरत जंगल हमारे साथी बन गए। मैं खिड़की से सिर बाहर निकालकर साफ-सुथरी हवा को फेफड़ों में भरने लगी।

काफी दूर चल लिए लेकिन अब तक कोई गांव नजर नहीं आया। रास्ते पतले हो रहे थे। अचानक से कटेकल्याण के थाना प्रभारी की बात याद आ गई। मैप के बारे में जिसका इस्तेमाल करने को हमें बोला गया था। हम सुरनार की ओर बढ़ रहे थे। वो गांव जो ऊंची पहाड़ी पर है। जहां आए दिन नक्सलियों की हिंसा की खबरें आती-रहती हैं। उसी रास्ते से दो-तीन आदिवासी महिलाएं सिर पर बोझा लिए जा रही थीं।

मैंने एक युवती से पूछा। नानो! आगे कौन सा गांव? उसे मेरा टूटा-फूटा संबोधन, जिसका मतलब दीदी होता है। जवाब मिलता है, सुरनार। हमारे गाड़ी के ड्राइवर लोकल थे। अगला सवाल उनकी तरफ से मेरे लिए अनजान भाषा में था। उन्होंने पूछा था कि यहां से गांव कितना दूर है? युवती ने बताया, करीब बीस से पच्चीस किलोमीटर। हमारे आश्चर्यचकित चेहरे देखकर वो औरतें हंस पड़ीं। गाड़ी घुमा ली गई। क्योंकि हमें अगली खबर नहीं बनना था।

जब वहां से लौटकर कुछ दिनों बाद ये रपट लिख रही हूं। खबरों में डीडी के कैमरामैन अच्युतानंद साहू और चुनावों के वक्त कई नक्सल हमले में हुई मौत की खबरे देख-पढ़ रही हूं। उस डर को अपने रोएं तक में सरसराता महूसस कर रही हूं।

(बस्तर क्षेत्र का ये सफर जारी है, आगे यहां पढ़ते रहें)


ये भी पढ़ें:

बस्तर 2: ‘सशक्त’ आदिवासी औरतों से मुलाकात!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here