बस्तर पार्ट 1: यहां के शहरों की सामान्य जिंदगियां एक भ्रम हैं!

बस्तर! एक नाम, जो भारत में नक्सलवाद का पर्याय बन चुका है. एक ऐसी जगह, जहां पर बाकी के भारतवासी कभी गए तो नहीं, लेकिन सुनी सुनाई बातों पर एक पुख्ता मत बना चुके हैं. यहां दिल्ली में बैठे जब बस्तर डिवीजन में जाने का प्लान बन रहा तो मेरा दिमाग भी बाकियों से खास अलग नहीं सोच रहा था.

90 के दशक में जब नक्सलवाद देश के कई राज्यों में तेजी से पैर पसार रहा था, तब वहां से दूर मैं इस दुनिया में आने की तैयारी कर रही थी. और जब कुछ दीन-दुनिया की समझ विकसित हुई, तब तक देश में नक्सलवाद को एक हद तक काबू में लाया जा चुका था. फिर थोड़ी और बड़ी हुई, कॉलेज पहुंची तो नक्सलवाद भारत में आया कैसे और चीन की एक हथियारबंद क्रांति की नकल भारत में किस तरह से हुई, इस पर जानकारियां मिलनी शुरू हुई.

बस्तरिया नृत्य की एक पेंटिंग, बस्तर के किसी गांव से.

आजाद आदिवासी महिलाओं के प्रति आकर्षण

तमाम राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक बहसों के बीच आदिवासियों का भोलापन सबसे ज्यादा आकर्षित करता था मुझे. अपनी संस्कृति और संरचना के लिए जिस तरह वो सजगता से लड़ रहे थे और हैं, उसकी मैं कायल बनती जा रही थी. मैंने कई जगह पढ़ रखा था, कई लोगों से सुन रखा था कि आदिवासी समाज में खूब जेंडर इक्वेलिटी होती है. पुरुषों की तरह ही महिलाएं भी मनपसंद काम का चुनाव कर सकती हैं, खुल कर नाच सकती हैं, गा सकती हैं. आदिवासी जीवन का एक बना बनाया अनुशासन है, एक अनोखी व्यवस्था है, वो प्रकृति का न्याय मानते हैं. ऐसी तमाम लुभावनी बातों ने आदिवासी समाज को करीब से देखने के लिए एक अदम्य लालसा से जगा दी थी.

बस्तर जाने से पहले ये चाह मुझे पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के कुछ आदिवासी गांवों में ले गई लेकिन वहां पर मुझे यूपी-बिहार के किसी भी अन्य गांव की तरह ही सामन्तवादी और पितृसत्तात्मक समाज दिखा. यही हाल झारखण्ड के आदिवासी गांवों में भी दिखा. समझदारों ने बोला कि ऐसे एक-दो सैंपल पर जज नहीं किया जा सकता। फिर मैं पहुंचती हूं बस्तर.

बस्तर का तिलिस्म !

बस्तर डिवीजन के पांच जिलों में जितना संभव हो सके, उतने गांवों और ब्लाकों में जाने की योजना बनी. नारायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा, बस्तर; इन जिलों में यात्रा की जाने वाली थी. इससे पहले कि आप कन्फ्यूज हों, बता दूं कि छत्तीसगढ़ को 7 डिवीजन्स में बांटा गया है. बस्तर डिवीजन उनमें से एक है. इस डिवीजन में टोटल 7 जिले हैं, जिनमें से पांच के नाम गिना चुकी हूं, बाकी दो हैं, कांकेर और कोंडागांव. बस्तर डिवीजन में ही बस्तर जिला भी आता है. तो अगर बात बस्तर डिवीजन की हो तो उसका मतलब समेकित वो सारे जिले और जब बस्तर जिला की करूंगी, मतलब केवल एक ही जिला, जिसका नाम बस्तर है.

चांद लालिमा ओढ़े हुआ था, हालांकि मेरा ,सामान्य मोबाइल कैमरा वो रंग नहीं पकड़ पाया

मैं रायपुर पहुंचकर नारायणपुर के लिए रवाना होती हूं. एक वक्त के बाद घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर चक्कर लगाती हमारी गाड़ी तेजी से नारायणपुर के जिला मुख्यालय की ओर बढ़ रही थी. रात हो चुकी थी, गाड़ी रुकती है. मैं अब बस्तर डिवीजन के एक जिले में पहुंच चुकी थी.

सब सामान्य सा था किसी छोटे से शहर की तरह. दुकानें सजी हुई थीं, लोगों की आवाजाही जारी थी. मुझे लगा, यहां तो नक्सल के आतंक का जरा भी साया नहीं है. तो क्या सब सही हो चुका था? जवाब है, नहीं.

‘प्रज्ञा की बस्तर यात्रा’ का ये पहला भाग है, आगे का वृतांत यहां पढ़ें.


ये भी पढ़ें:

उदासीन सत्ता, लाल आतंक के बीच संस्कृति बचाने को प्रयासरत आदिवासी समाज

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here