बस्तर 6: दंतेवाड़ा में पुलिस दस्ते को देखते ही क्यों दगने लगे पटाखे?

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अब हम बहुत ही जाने-पहचाने नाम ‘दंतेवाड़ा’ की धरती पर थे। मुख्य शहर तो गजब का सजा कर रखा गया है। डिजाइनर स्ट्रीट लाइट्स और चमाचम बाजार देखकर एक पल को भयावहता का पर्याय बन चुके इस नाम पर दुलार आ गया। लेकिन ये हर कम विकसित जिलों का पांच-किलोमीटर वाला विकास दिखता है न हमें, बड़ा ही मायावी होता है।

कभी भी केवल शहर देखकर ही उस इलाके के बारे में राय नहीं बना लेना चाहिए। यहां इतनी सुसज्जित शांति इसलिए भी है कि बावन शक्तिपीठों में से एक दंतेवाड़ा भी है। शहर के बीचों बीच माता दंतेश्वरी का प्रख्यात मंदिर है। दंतेश्वरी देवी के नाम पर ही इस इलाके का नाम दंतेवाड़ा पड़ा। मंदिर काफी प्राचीन है और लकड़ी से बना हुआ है। मंदिर में सुबह की आरती देखने के बाद अब गांवों की तरफ निकलना था।

दंतेश्वरी मंदिर का गेट

दंतेवाड़ा जिला 25 मई 1998 को बस्तर जिले से काटकर बनाया गया था। यहां पर माड़िया, मूरिया, हल्बी और गोंड जनजातियों के अलावा धूर्वा जनजाति के भी बहुत सारे लोग रहते हैं। दंतेवाड़ा में विश्व के सबसे बड़े लौह अयस्क का स्रोत बैलाडीला की पहाड़ियां भी हैं। दंतेवाड़ा चार विकासखण्डों (गीदम, कुआंकोण्डा, दंतेवाड़ा और कटेकल्याण) में बंटा है। मेरा प्लान कटेकल्याण की ओर जाना था, जोकि इस रास्ते पर पड़ने वाले आखिरी पुलिस थाना था।

पटाखों के शोर का सच

शहर के सीधे रास्ते से होते हुए गाड़ी आगे बढ़ने लगी।  अभी तक सड़क पक्की ही थी। रास्ते में देखा कि सीआरपीएफ की एक टीम पेट्रोलिंग के लिए निकली हुई है। पुलिस के मोटरसाइकिल दस्ते भी निकलने को तैयार थे। अचानक से कई सारे पटाखों की लड़िया धड़धड़ा उठीं। पटाखों की गूंज दूर तक सुनाई दे रही थीं।

वहीं खड़े एक पुलिस वाले ने बताया कि ये गांव वालों में से मौजूद नक्सलियों के खबरी कर रहे हैं। अभी उन्होंने देखा कि पुलिस का दस्ता निकल रहा है तो इस तरह वो इस गांव से अंदर के गांव में बैठे नक्सलियों को आगाह कर देते हैं। ये एक तरह से उनकी कोड लैंग्वेज है। पहले सबसे करीब वाले गांव से पटाखे की आवाज आएगी। फिर उसे सुनकर अगले गांव में पटाखे दगेंगे। ये क्रम आखिरी गांव तक चलेगा। मैं इस नई जानकारी से थोड़ा ठिठक गई थी।

मित्र पुलिस ?

ज्यादा जानकारी लेने के लिए थाने के अंदर चली आई। थाना प्रभारी सलीम खाखा ने बताया, हम लोग बातचीत से भी हल निकालते हैं। पुलिसिंग का रवैया काफी बदल गया है। कोई भी ग्रामीण नक्सलियों के पास बड़े मन से नहीं जाता। उनकी मजबूरी होती है। अब हम तो उनकी सुरक्षा के लिए चौबीसों घंटे उनके पास नहीं रह सकते। लेकिन चौबीसों घंटे वो नक्सलियों से घिरे रहते हैं।

पुलिस ने सहूलियत के लिए हमें हाथ से बना एक मैप थमा दिया। रूट बताया, जहां पर जाना महफूज है। जहां तक पुलिस या सुरक्षा बलों की पहुंच है। वो जगह भी चिन्हित कर दी, जहां पर बीते दिनों में नक्सलियों के साथ मुठभेड़ हुई थी। इतने दिनों में मुझे एक पैटर्न समझ आया कि नदी के पास वाले सुदूर गांवों में नक्सलवाद कुछ ज्यादा ही शक्तिशाली है। वजह नदी की वजह से टूटी-फूटी ही सड़क का न होना, जंगलों की सघनता बढ़ते जाना।

ये नक्शा दंतेवाड़ा के इस इलाके में भटकते वक्त काफी कारगर साबित हुआ

शिक्षा की रोशनी

कटेकल्याण थाना से आगे बढ़ने पर मुख्यमंत्री डीएवी स्कूल दिखाई दिया। बताया गया कि ये इस इलाके का आखिरी स्कूल है। साथ में हॉस्टल भी था। फोन का नेटवर्क जा चुका था। बस्तर डिवीजन में घुसने से पहले मुझे बीएसएनल का एक नया सिम लेना पड़ा। जिन-जिन जगहों पर सुरक्षाबलों के कैंप हैं। वहीं-वहीं मोबाइल नेटवर्क का टॉवर लग पाया है। वो भी ज्यादातर जगहों पर केवल बीएसएनएल का। हां, कुछ-कुछ जगहों पर जियो का भी नेटवर्क पकड़ता था। सुनने में आया है कि जियो के और टॉवर भी लगने वाले हैं। देश के बाकी हिस्सों की तरह यहां भी जियो के लिए उदारता बरती जा रही है। उस स्कूल के प्रिंसिपल तेलांगना के थे। जानकर अच्छा लगा कि उनकी दोनों बेटियां इसी स्कूल में पढ़ती हैं। प्रिंसिपल साहब चाहते तो अपनी बच्चियों को शहर में किसी अच्छे स्कूल में दाखिला दिला सकते थे। लेकिन उन्हें अपनी शिक्षा और प्रयासों पर भरोसा था।

स्कूल का इंफ्रास्ट्रक्चर इस अति पिछड़े इलाके के हिसाब से काफी अच्छा था। स्कूल बारहवीं तक था। स्कूल में केमिस्ट्री की एक छोटी-सी लैब भी थी। स्कूल सरकार की ओर से वित्तपोषित था। हॉस्टल केवल लड़कों का ही था। हॉस्टल में अपने बच्चों से मिलने आए कुछ अभिभावक भी थे। उनका कहना था कि अगर लड़कियों के लिए भी हॉस्टल हो जाए। तो हम अपनी लड़कियों को भी यहां पढ़ने भेजेंगे। रोज-रोज घर से स्कूल आना न तो सुरक्षित था और न ही इतनी कम दूरी पर था कि चलकर पूरा किया जा सके। स्कूल और हॉस्टल की सुविधा पूरी तरह से मुफ्त थी।

(दंतेवाड़ा में इससे आगे का सफर यहां पढ़ें)


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