बस्तर 5: बीजापुर में संस्कृति संरक्षण के नाम पर दादा लोग नरक मचा रखे हैं

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(ये इस यात्रा का पांचवा भाग है, चौथे क्रमांक का लेख यहां पढ़ें)

बीजापुर के गांव गंगालूर में उस दिन स्वास्थ्य शिविर लगा था। उस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में आस-पास के पचास गांवों से भी ज्यादा मरीज आते थे। वहां पर बीएमओ पद पर तैनात विजय ने बताया कि यहां पर बीमारियों को लेकर भयंकर भ्रांतियां फैली हुई हैं। यहां लोग आज भी मलेरिया जैसी बीमारियों से मर रहे हैं।

हमारे पासे ऐसे बहुत से लोग आते हैं जिनका हाथ, पेट, माथा जला हुआ होता है। ये बर्न किसी बीमारी से बचने के लिए गर्म लोहे से दागने की वजह से होता है। बच्चों को ढंग से खाना नहीं मिल पाता है। उबला चावल और इमली का पानी इनका मुख्य भोजन है। ज्यादातर बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। हमने इसलिए एक अलग से मालन्यूट्रीशन वार्ड बनाया है। लेकिन स्टाफ की कमी की वजह से उसे सुचारु रूप से संचालित नहीं कर पा रहे हैं।

जड़-जंगल-जमीन का स्वार्थ

आगे ईटपाल से मुसालोर गांव की तरफ से गुजर रहे थे तो सड़क की हालत बद से बदतर होती जा रही थी। लाल पानी लिए नदी बह रही थी। गांव वाले उसी लाल पानी को मटकों में भर कर ले जा रहे थे। यहां के निवासी आज भी यही जहरीला पानी पीने को मजबूर हैं। मैं ओडिशा के सबंलपुर के आस-पास के इलाकों में माइनिंग कंपनियों और प्लांटों की लाइन देखती थी। पूंजीवादियों की पहाड़ों और जंगलों को तहस-नहस करने की कुटिल चाल देखती थी।

लगता था कि जड़-जंगल-जमीन को बचाने के लिए आवाज उठाने वाले लोगों के साथ खड़े रहना बहुत जरूरी है। लेकिन आंदोलन की ये आवाज बहुत बरसों पहले ही भटक चुकी है। अब ये भी एक बिजनेस बन चुका है। बाहर के राज्यों से आए कुछ प्रभुत्वशाली और तेज दिमाग के लोग यहां की भोली-भाली जनता को ठग रहे हैं और अपना घर सजा रहे हैं। अगर आंदोलन के सर्वेसर्वा लोगों को यहां के मूल निवासियों का जरा भी ख्याल होता। तो जो दारुण दृश्य मैं यहां पर देख रही हूं, वो एक मिथ्या होता।

भरोसा- नक्सली और सुरक्षाबल

सड़क न बनने देना, अस्पताल की एंबुलेंस सेवाओं को आम जन तक न पहुंचने देना, बिजली के खंभे तोड़-फोड़ डालना। ये सब संस्कृति को बचाने की कोई कवायद नहीं बल्कि लोगों को मूर्ख बनाकर अपना दबदबा बनाए रखने की एक गहरी साजिश है। और हां, ये भी सच है कि पुलिस और सुरक्षाबलों पर आंख मूदकर भरोसा करना भी एक तरह का खतरा है। लेकिन अपने घरों से दूर, बहुत दूर एक बीहड़ जंगल में उन लोगों की सुरक्षा करते हुए अपनी जिंदगियां झोंकना, जो आपको हर पल संशय से देखते हैं। बहुत बड़ी बात न सही, इतनी बड़ी तो है कि उसकी सराहना की जा सके।

सी-85 बटालियन के एक जवान ने हमें जानकारी दी कि जिस पक्की सड़क से आप बीजापुर शहर से यहां इतने अंदर गंगालूर गांव में आई हैं। उसको बनवाने में 200 से भी ज्यादा जवानों की जानें गई हैं।। मैं सोचती रही, 200 जवान! एक सड़क बनवाने में शहीद हो गए। कितनी कीमती है ये सड़क!

ये सच है कि सेना और सुरक्षाबलों ने कई इलाकों ने अपने अधिकारों और प्रभुत्व का भयंकर तरीके से गलत इस्तेमाल किया है। चाहे वो जम्मू-कश्मीर हो या सीमावर्ती पूर्वोत्तर भारत के इलाके। छत्तीसगढ़ के इन इलाकों से भी वर्दी की खौफनाक कहानियां सुनने को मिल जाएंगी। लेकिन कैम्प में तैनात एक जवान के मुताबिक, अब पुलिसिंग और फोर्स दोनों का ही रवैया बदला है।

हमें ऊपर से भी ऑर्डर होते हैं कि गांव वालों को किसी भी कीमत पर नुकसान नहीं पहुंचाना है। इन सब ऑर्डर्स के ऊपर भी जाकर हम गांव वालों से दोस्ती करने की कोशिश करते हैं। उन लोगों को हमसे कोई लगाव नहीं है, जिसकी अपनी वजहें भी हैं। फिर भी कैम्प के बाहर गांव वाले फल वगैरह बेचने आते हैं तो हम उनके बताए दामों से भी ज्यादा पैसे देकर वो सब खरीद लेते हैं। देर सबेर ही सही उन्हें भी समझ आने लगेगा कि हम उनके दुश्मन नहीं हैं, उनकी रक्षा करने के लिए यहां खड़े हैं।

(यात्रा जारी है, इसके पहले और आगे का विवरण यहां पढ़ें)


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