बस्ती! नाम तो सुना ही होगा

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बस्ती से आप क्या समझते हैं? बस्ती नाम लेते ही आपके जहन में अगर कुछ सबसे पहले आता है तो बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच कोई झुग्गी झोपड़ी। लेकिन ऐसा नहीं है। एक बस्ती है जो उत्तर प्रदेश में भी है। वो कोई झुग्गी झोपड़ी वाला इलाका नहीं बल्कि एक अच्छा खासा जिला है और तीन जिलों का मंडल मुख्यालय। मतलब जिले में कमिश्नर बैठते हैं। इस बस्ती के बारे में भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कहा था, बस्ती को बस्ती कहूं तो काको कहूं उजाड़? हालांकि आज के समय में बस्ती पर ये पंक्तियां लगभग सटीक नहीं बैठती। वैसे तो सब कुछ टॉप क्लास नहीं हो गया है लेकिन जिले के करीब 8 किलोमीटर के शहरी इलाके में तीन- चार मॉल हैं, तीन- चार बड़े होटल हैं, दो चार अच्छी दुकाने हैं जिसके चलते अब आपको पास के ही गोरखपुर या फैजाबाद नहीं जाना पड़ेगा। लोग बस्ती का नाम बदलना चाहते हैं। क्यों ये वही जानें लेकिन किसी ने कभी अपने इतिहास से वाकिफ होने की कोशिश नहीं की। बस्ती, बसते-बसते बसी है। उसे उजाड़ने की जिम्मेदारी तमाम सरकारी संस्थाओं की रही उतनी ही हमारी भी।

तो आईए आज आपका उस बस्ती से परिचय कराते हैं जिसके बारे में आप ज्यादा नहीं जानते होंगे। या अगर बस्ती के ही होंगे तो भी आपको यह बातें पता नहीं होंगी।

मखौड़ा धाम

बस्ती की पहचान आज से नहीं बल्कि रामायण काल से है। वक्त ने भले आज बस्ती की पहचान मिटा दी हो लेकिन एक समय था जब चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ के गुरू वशिष्ठ ने पुत्रेष्टि यज्ञ के लिए बस्ती स्थित मखौड़ा चयन का किया। इस जगह को मखौड़ाधाम नाम से जाना जाता है। मखौड़ा धाम यानी मखभूमि में ही राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया था। श्रृंगी ऋषि द्वारा इसी स्थान पर यज्ञ संपन्न कराया गया था। परशुरामपुर ब्लाक क्षेत्र में स्थित इस मंदिर में भगवान राम परिवार सहित विराजमान हैं। यहां हर साल चैत्र पूर्णिमा पर मेला लगता है।

मखौ़ड़ा धाम

भदेश्वरनाथ मंदिर

बस्ती शहर से पांच किलोमीटर दक्षिण कुआनों के तट पर स्थित भगवान शिव का यह मंदिर अति प्राचीन है जिसे भदेश्वरनाथ मंदिर नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि यहां स्थित शिवलिंग की पूजा लंका के राजा रावण ने की थी।

भदेश्वर नाथ मंदिर

छावनी

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में दूरदराज के इलाको में जमीनी स्तर के बहुत से जनसंघर्षो को इतिहासकारो ने नजरंदाज किया गया है । इसी नाते बहुत से क्रांति नायको और नायिकाओं की वीरता की कहानियां अभी भी अपेक्षित महत्व नहीं पा सकी हैं। ऐसी ही एक महान सेनानी बस्ती जिले की अमोढ़ा रियासत की रानी तलाश कुवंरि थीं जिन्होने अंग्रेजों से आखिरी साँस तक लड़ाई लड़ी। उन्होने अपने इलाको में लोगों में अंग्रेजो के खिलाफ ऐसी मुहिम चलायी थी कि रानी की शहादत के बाद कई महीने जंग जारी रही। यहां आजादी की लड़ाई में जो भी नौजवान अंग्रेजो की पकड़ में आ जाता उसे छावनी में पीपल के पेड़ पर रस्सी बांध कर लटका दिया जाता था। इसी पीपल के पेड़ के पास एक आम के पेड़ पर भी अंग्रेजों ने जाने कितने लोगों को फांसी दी। इस पेड़ की मौजूदगी 1950 तक थी और इसका नाम ही फंसियहवा आम पड़ गया था। पीपल का पेड़ तो खैर अभी भी है पर आखिरी सांस ले रहा है। इस स्थल पर करीब 500 लोगों को फांसी दी गयी। अंग्रेजों ने प्रतिशोध की भावना से गांव के गांव को आग लगवा दी और इसमें गुंडा कुवर तथा महुआ डाबर सर्वाधिक प्रभावित रहे। इन गांवो से काफी संख्या में लोगों का पलायन भी हुआ।

छावनी

चंदो ताल

चंदो ताल जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। माना जाता है कि प्राचीन समय में इस जगह को चन्द्र नगर के नाम से जाना जाता था। कुछ समय पश्चात् यह जगह प्राकृतिक रूप से एक झील के रूप में बदल गई और इस जगह को चंदो ताल के नाम से जाना जाने लगा। यह झील पांच किलोमीटर लम्बी और चार किलोमीटर चौड़ी है। माना जाता है कि इस झील के आस-पास की जगह से मछुवारों व कुछ अन्य लोगों को प्राचीन समय के धातु के बने आभूषण और ऐतिहासिक अवशेष प्राप्त हुए थे। इसके अलावा इस झील में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पक्षियों की अनेक प्रजातियां भी देखी जा सकती है। ये ताल नगर बाजार से पूर्व में सेमरा चींगन गांव तक पहुंचा हुआ है।

चंदो ताल

बस्ती की चीनी

बस्ती एक ऐसा जिला है जहां चीनी मिलों की भरमार थी लेकिन आज एक वक्त है कि दो प्रमुख चीनी मिलों पर लोग उसे संचालित कराने के लिए धरना दे रहे हैं. हाल ही में जिले की मुंडेरवा चीनी मिल को शुरू किए जाने की घोषणा की गई जिसके लिए 3 किसान शहीद हो गए थे। हालांकि लोग उसमें राजनीति चमका रहे हैं लेकिन ठीक है कम से कम कुछ तो हुआ। पूर्वांचल चीनी का कटोरा कहा जाता है और उसमें बस्ती का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. यह बात बहुत ही कम लोगों को पता होगी कि बस्ती में बनाई जाने वाली की आकार बड़ा होता था और वो अमेरिका निर्यात की जाती थी।

हर्रैया की मनोरमा

हर्रैया बस्ती जिले का एक कस्बा और नगर पंचायत है। यह कस्बा मनोरमा नदी के तट पर बसा है। हालांकि अब कस्बा तो सुधर गया। धीरे-धीरे शहर होने की ओर है लेकिन नदीं अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। मनोरमा अब सूख चुकी है लेकिन शास्त्रों में आज भी वो जिंदा है।
अन्य क्षेत्रे कृतं पापं काशी क्षेत्रे विनश्यति।
काशी क्षेत्रे कृतं पापं प्रयाग क्षेत्रे विनश्यति।
प्रयाग क्षेत्रे कृतं पापं मनोरमा विनश्यति।
मनोरमा कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति।

500 बेड का अस्पताल

बस्ती में ही 500 बेड का अस्पताल है। जिसे कैंसर अस्पताल या ओपेक कैली के नाम से जाना जाता है। इस अस्पताल का उद्घाटन पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने किया था। इसमें वो सारी सुविधाएं लैस हैं जो एक अच्छे मेडिकल कॉलेज में होती हैं लेकिन हालात ये है कि टेकनिशियन और डॉक्टरों के अभाव में लाखों की मशीन धूल फांक रही हैं। बता दें कि इस अस्पताल के नाम के आगे ओपेक इसलिए लगा है क्योंकि इसमें पेट्रोलियम उत्पादक 12 देशों का संगठन है। इसके सदस्य हैं,अल्जीरिया, अंगोला, ईक्वाडोर, इरान, ईराक, कुवैत, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, नाइजीरिया, लीबिया तथा वेनेजुएला। और इन सबके सहयोग से यह अस्पताल बना है।

इन सब अचल संपत्तियों के अलावा बस्ती के पास खूब सारी साहित्यिक और राजनीतिक दिग्गजों की दी हुई विरासत भी है। अब बात उनके बारे में,

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

हिन्दी साहित्य में आलोचना के शिरोधार्य आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म बस्ती, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनके द्वारा लिखी गई सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तक है हिन्दी साहित्य का इतिहास, जिसके द्वारा आज भी काल निर्धारण एवं पाठ्यक्रम निर्माण में सहायता ली जाती है। शुक्ल जी ने इतिहास लेखन में रचनाकार के जीवन और पाठ को समान महत्व दिया। हिंदी में पाठ आधारित वैज्ञानिक आलोचना का सूत्रपात उन्हीं के द्वारा हुआ। हिन्दी निबंध के क्षेत्र में भी शुक्ल जी का महत्वपूर्ण योगदान है। भाव, मनोविकार संबंधित मनोविश्लेषणात्मक निबंध उनके प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उन्होंने प्रासंगिकता के दृष्टिकोण से साहित्यिक प्रत्ययों एवं रस आदि की पुनर्व्याख्या की।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कवि एवं साहित्यकार थे, पर जब उन्होंने दिनमान का कार्यभार संभाला तब समकालीन पत्रकारिता के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को समझा और सामाजिक चेतना जगाने में अपना अनुकरणीय योगदान दिया। उनका जन्म भी बस्ती में साल 1927 में हुआ था। सर्वेश्वर मानते थे कि जिस देश के पास समृद्ध बाल साहित्य नहीं है, उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं रह सकता। सर्वेश्वर की यह अग्रगामी सोच उन्हें एक बाल पत्रिका के सम्पादक के नाते प्रतिष्ठित और सम्मानित करती है। उन्होंने जिले की प्रमुख नदी कुआनो पर कविता भी लिखीं।

क्रेडिट- छाया

राजेन्द्र प्रसाद

यूं तो हम जानते हैं कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद बिहार स्थित सारन जिले के रहने वाले थे लेकिन उनके परिवार का मूल कुआँगाँव, अमोढ़ा, बस्ती का था । यह एक कायस्थ परिवार था। कुछ कायस्थ परिवार इस स्थान को छोड़ कर बलिया जा बसे थे। कुछ परिवारों को बलिया भी रास नहीं आया इसलिये वे वहां से बिहार के जिला सारन के एक गाँव जीरादेई में जा बसे। इन परिवारों में कुछ शिक्षित लोग भी थे। इन्हीं परिवारों में राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वजों का परिवार भी था।

क्रेडिट- कल्चर इंडिया

हरिवंश राय बच्चन

अमिताभ बच्चन के पिता जानेमाने लेखक स्व.हरिवंशराय बच्चन का बचपन भी अमोढ़ा राज की छांव में ही बीता। उनके पिता अमोढ़ा राजा के कर्मचारी थे। क्या भूलू क्या याद करू में हरिबंश राय बच्चन ने अपने बचपन के अमोढा को याद भी किया है। क्या भूलूं क्या याद करूं में हरिवंश राय ने अमोढ़ा का जिक्र करते हुए लिखा है-

‘बस्ती, हरदोई, लखनऊ, गोंडा, बहराइच, सीतापुर सुल्तानपुर, फ़ैज़ाबाद, परतापगढ़ और इलाहाबाद में श्रीवास्तव कायस्थों के बहुत-से परिवार ऐसे है जो अपने को ‘अमोढ़ा के पान्डे’ कहते हैं, या अपना अल्ल ‘पान्डे अमोढा़’ बतलाते हैं। ‘अल्ल’ शब्द की व्युत्पत्ति मुझे नहीं मालूम; सम्भवतः देशज शब्द है; अर्थ है इसका कुल या वंश। अमोढ़ा के पान्डे लोगों की विशेषता दो बातों में है-पहली यह कि विवाह के समय ब्राह्मण लोग उनका यज्ञोपवीत संस्कार करते हैं-जबकि शूद्र समझने के कारण, कायस्थों की अन्य साखाओं का उपनयन संस्कार वे नहीं करते, या कुछ समय पहले तक नहीं करते थे, अब तो दक्षिणालोभ में, उदारता के कारण नहीं, उन्होंने अपने बहुत-से समय-रूढ़ सिद्धान्तों के साथ समझौता कर लिया है; दूसरी वे मदिरा नहीं छूते- उनके यहां यह किंवदन्ती है कि उनके वंश का जो कोई मदिरा पिएगा वह कोढ़ी हो जाएगा, जबकि अन्य कायस्थ-शाखाएं अनियंत्रित मदिरापान के लिए मशहूर हैं, या थीं-‘कायस्थ होय प्रधान अहोनिसि रहै पियन्तौ’ (पृथ्वीराज रासो); कभी- कभी सोचता हूं, स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधान के रूप में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का पदस्थ होना चन्द बरदाई की उक्ति पर कितना बड़ा व्यंग्य होगा।’

 

क्रेडिट- पत्रिका

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