कश्मीर 7: सुंदर गुलमर्ग की घाटी में घूमते-घूमते वो देखा जिसे देखकर बस अफसोस किया जा सकता है

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(ये इस यात्रा का सातवां भाग है, पिछले विवरण यहां पढ़ें)

अगली सुबह आंख खुलते के साथ हमारे सामने नून चाय, उबले अंडे और लवासा (चाय से खाई जाने वाली बड़ी सी रोटी) परोसी गई। नाश्ता करने के बाद हम गुलमर्ग जाने के लिए तैयार होने लगे। क्योंकि कश्मीर बंद था और हम बारामूला से बाहर नहीं निकल सकते थे। मैं, स्नेहा और मेरी कश्मीरी दोस्त ने गुलमर्ग, भारत के आखिर गांव के पास का वॉटर फॉल और बाबा ऋषि की मजार को देखा। ढेर सारी फोटो खिंचाई।

गाड़ी के ड्राइवर पूरे समय कश्मीरी में ही बात करते रहे जो हमारे कुछ पल्ले नहीं पड़ा। ड्राइवर साहब अपने धर्म को लेकर बेहद सख्त थे इसलिए अजान का हवाला देकर उन्होंने गाड़ी में गाने नहीं बजाए। उन्होंने बाबा ऋषि की मजार पर जाने से पहले हमें नसीहत भी दी कि सिर पर दुप्पटा रखकर जाइए, हमने उनकी बात मानी भी। इस पूरी यात्रा के दौरान जो एक बात मुझे बेहद खटकी वो थी उनका बिंदी पर सवाल उठाना। दरअसल, मैंने और स्नेहा ने बिंदी लगाई थी। मेरी कश्मीरी दोस्त को भी बिंदी लगानी थी, उन्होंने मुझसे मांगी और मैंने दे दी। बिंदी लगाकर वो बेहद प्यारी लग रही थीं।

लेकिन लौटते समय ड्राइवर की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने मेरी दोस्त को कहा, ‘आपने ये ठीक नहीं किया है। आप इस्लाम का अपमान कर रही हैं। हमारा धर्म इसकी इजाजत नहीं देता है।’ ‘मैं अपने धर्म को बेहद इज्जत देती हूं और दिल से मानती हूं।’ मेरी दोस्त अपने बचाव में बस इतना ही कह पाई और मैं चाहकर भी कुछ नहीं बोल पाई और मुझे इस बात का अफसोस है। बस मैं अच्छा फील नहीं कर रही थी और दिमाग में चल रहा था कि अगर मुझे ये बातें किसी अजनबी ने कहीं होतीं या अगर ये कश्मीर नहीं होता तो मैं उसका मुंह तोड़ देती।

धर्म यहां भी एक भारी मुद्दा है

कश्मीर जाकर इतना समझ आ गया था कि लड़कियां चाहे कश्मीर की हो या बिहार की। उनके लिए हालात एक जैसे ही होते हैं। पाबंदियां एक जैसी ही होती हैं। बुर्का किसी की पसंद नहीं हो सकती है। जो लड़कियां बुर्के में बाहर निकलती हैं, वो घर में आते ही कुछ और होती हैं। उन्हे अपने शरीर से वो बोझ उतारना होता है। वो भी खुले बालों के साथ रहना चाहती हैं, सेल्फी लेना चाहती हैं, गानों पर खुलकर नाचना चाहती हैं, जींस-टीशर्ट में बाहर निकलना चाहती हैं। लेकिन धर्म आड़े आ जाता है।

कश्मीर में लड़कियों को जॉब करने की इजाजत नहीं है। अगर करना भी है तो उन्हें सरकारी जॉब के लिए मोटिवेट किया जाता है। कश्मीर में धर्म बुरी तरह हावी है। यहां के नौजवानों को, लोगों को हिंदुत्व से दिक्कत है लेकिन इस्लाम के नाम पर वो हर चीज को जस्टिफाई करते नजर आते हैं। उन्हें हिंदू राष्ट्र से दिक्कत है लेकिन कश्मीर को इस्लामिक देश बनाने में कोई हर्ज नहीं। हद तो तब हो गई जब दोस्त के साथ फेसबुक पर डाली गई फोटो तक मुझे डिलीट करनी पड़ी क्योंकि मेरी दोस्त ने बिंदी लगाई थी।

उनके दोस्तों ने धर्म को लेकर इतने ताने दिए कि उन्होंने मुझसे रिक्वेस्ट किया कि मैं फोटो हटा दूं। हां एक और चीज जो बेहद अजीब है, यहां के लड़कों के हिसाब से कश्मीर के लड़कियां अपनी मर्जी से बुर्का पहनती हैं। मतलब बुर्का पहनने में लड़कियों का ही फायदा है क्योंकि वो उसकी आड़े में किसी से भी मिल सकती है या कुछ भी कर सकती हैं। (ये नतीजा मैंने कुछ लोगों से बात करने के बाद ही निकाला है)

(आगे की यात्रा के लिए अब तक तो जान ही गए होंगे कि जाना यहां है)


कश्मीर की अपनी इस यात्रा के बारे में हमें लिखकर भेज रही हैं भारती द्विवेदी। भारती दिल्ली में पत्रकार हैं। मूलतः बिहार की हैं। इनकी शान में दोस्त लोग इन्हें ‘मनमौजी बिहारन’ कहकर पुकारते हैं। तेजस्वी नयनों की मालकिन हैं, मुंहफट हैं, बेबाक हैं और बहुत ही ज्यादा प्यारी हैं, दरवाजे पर लटके विंडचाइम की माफिक। ये लिखने पर हमें इनकी तरफ से उलाहना आएंगी लेकिन एक अभिनेत्री हैं, तापसी पन्नू। उनकी शक्ल हूबहू भारती से मिलती है।


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