बिनसर: उत्तराखंड का एक और नगीना हिलस्टेशन

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बिनसर के घने जंगलों में चलना अलहदा सुख है. सघन पेड़ों और हरियाली को एकदम चीरती हुई सड़क पर चलना. जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, पेड़ बदलते हैं, जंगल को सघनता बढ़ती है, जीरो पॉइंट जो इस पहाड़ और इलाके का सबसे ऊंचा बिंदु है, पर पहुंचने की इच्छा भी बढ़ती है! यहां ऊपर से हिमालयी चोटियों का एक वृहत नजारा दिखता है, चौखम्बा से लेकर पंचाचूली और उससे भी आगे नेपाल तक कि चोटियों का..!!

नीचे रास्ता चीड़ के शुद्ध जंगलों से शुरू होता है जो ऊपर बढ़ते बढ़ते बांज, बुरांस के मिक्स जंगल में बदल जाती है। उत्तर की तरफ के ढालों पर अच्छी छाया और नमी होती है। यहां पेड़ के तने बेलों और छोटे-छोटे पौधों (epiphytes) से ढंके रहते हैं।

रास्ते में बिनेश्वर महादेव का मंदिर ही जगह आती है जहां सांप की तरह लहराती सड़क को आराम मिलता है, यहां कुछ समतल और खुला घास का मैदान है, छोटी सी जलधारा है, एक-दो नौले भी हैं। नौला एक छोटा-सा कुंड होता है, जिसमें पहाड़ों के अंदर से पानी रिस-रिस कर इकट्ठा होता रहता है और इस कुंड को झोपड़ी बनाकर ढंक दिया जाता है।

13 किमी का रास्ता और घना जंगल पार करके जीरो पॉइंट तक पहुंचे लेकिन इस बार भी पूरा हिमालय नहीं दिख पाया, चोटियों की ऊंचाई बादलों में ढंकी हुई थीं।

पिछली बार बिनसर बारिश में आना हुआ था, उस समय तो हिमालय दिखना वैसे भी दुर्लभ होता है। इस मौसम में हरियाली थोड़ी कम दिखती है लेकिन बहुत सी घासें जो बारिश के बाद सूख जातीं हैं, उन पर फल-बीज आ जाते हैं और भी बहुत कुछ बदल जाता है। इस बार कस्तूरी मृग, लंगूर और सुनहरा पाइन मार्टन दिखे, पक्षियों में कठफोड़वा, टिट, फोर्कटेल दिखे।

रास्ते में सुस्ताने बैठे तो दिल्ली से एक सज्जन कार से सपरिवार निकले. रोक कर पूछने लगे,
“तुम लोग ऐसे खुले में बैठे हो..लैपर्ड या कोई जंगली जानवर का डर नहीं है?” हमने कहा, “वो दिन में इतनी खुली जगह और चालू सड़क पर नहीं आयेगा, बाकी 1% किसी मजबूरी में आ भी जाये, तब देख लेंगे।”

फिर उनको बताया कितना रास्ता बचा है. ऊपर क्या-क्या है ‘देखने को’ क्योंकि उनको तो जंगल के अलावा यहां कुछ दिख नहीं रहा था।

पहाड़ों में कितनी भी प्लानिंग कर लो, वेदर फोरकास्ट देख लो, होता वही है जो पहाड़ चाहते हैं, क्या दिखना है, कितना दिखना है, सूर्योदय..सूर्यास्त…सब इन्हीं के हाथ में हैं। हमें प्रकृति की इसी लय को समझना और उसका सम्मान करना आना चाहिए। जो हो रहा है..वो एक बहुत बड़े सिस्टम का एक हिस्सा है…उसमें से जो हमें मिलता है वही हमारा भाग (भाग्य) है।

हां, कुछ ज्यादा समय लेकर आया जाए, तो बहुत कुछ मिल जाता है.

बिनसर पहाड़ी पर फैला एक वन्य जीव अभ्यारण्य है और इसके 3 एंट्री पॉइंट है. सबसे प्रमुख अयारपानी की तरफ से है. अयारपानी, अल्मोड़ा-बागेश्वर रोड़ पर है. अयारपानी (बिनसर गेट) के बाद खुद के वाहन से ही जाया जा सकता है. कोई टैक्सी या रिक्शा नहीं मिलता. अयारपानी से पैदल भी जाया जा सकता है लेकिन उसके लिए सुबह जल्दी शुरू करें, 8-9 बजे। ताकि सूर्यास्त से पहले वापस नीचे आ सकें.

शाम 6 बजे तक रोड़ पर शेयर्ड टैक्सी मिल जाती है, उसके बाद मुश्किल होती है. अयारपानी से जीरो पॉइंट तक का लगभग पूरा रास्ता चढ़ाई में है. लंबाई अधिक होने के वजह से चढ़ाई बहुत आसान है. रास्ते में बिनेश्वर महादेव के मंदिर पर ही पीने का पानी उपलब्ध है. रेस्ट हाउस तक आराम से कार जाने लायक सड़क है…उसके बाद जीरो पॉइंट तक भी कार जा सकती है लेकिन सड़क बहुत खराब है. बेहतर है रेस्ट हाउस के बाद पैदल ही जाएं. 

रुकने के लिये KMVN रेस्ट हाउस भी बुक करा सकते हैं. कुछ प्राइवेट रिसोर्ट भी हैं एक दो. बिनसर पक्षियों को देखने लिए भी बहुत अच्छी जगह है इसलिए साथ में दूरबीन भी लेकर जाएं. ये हिमालयी चोटियां देखने के काम में भी आएंगी.


ये खूबसूरत सा यात्रा वृतांत हमें भेजा है आदित्य निगम ने. आदित्य पेशे से आर्किटेक्ट हैं. इन्होंने लैंडस्केप आर्किटेक्चर में मास्टर्स किया है। इन्हें सुदूर-अनदेखी जगहों की यात्रा, फोटोग्राफी और लेखन में रुचि है । साथ ही एकल घुमक्कड़ी बहुत पसंद है। आदित्य पिछले कुछ सालों से हिमालय में नियमित ट्रैक कर रहे हैं


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