बिड़ला हाउस: गांधी जी को लगी तीनों गोलियों और ‘हे राम!’ का साक्षी

0
525
views

दिल्ली के लोक कल्याण मार्ग मेट्रो स्टेशन से 1.2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है बिड़ला हाउस। जिसे गांधी स्मृति भी कहा जाता है। वो जगह, जहां बापू ने अपने आखिरी के 144 दिन गुजारे थे, जहां संध्या प्रार्थना के बाद हिन्दू अतिवादी नेता नाथूराम गोडसे ने महात्मा की छाती में 3 गोलियां मारकर उनकी हत्या कर दी थी। 28 कमरों वाले बिड़ला हाउस का निर्माण घनश्याम बिड़ला ने 1928 में करवाया था, जिसे गांधी की हत्या के बाद गांधी स्मृति में बदल दिया गया।

गांधी जी की आखिरी तस्वीर

9 सितंबर 1947 को जब महात्मा गांधी कोलकाता से आजाद भारत की नई राजधानी दिल्ली पहुंचे तब वो दंगे में झुलस रहा था। कोलकाता में गांधी ने शांति का अद्भुत चमत्कार संभव कर दिखाया था। शाहदरा स्टेशन पर बापू का स्वागत करने सरदार पटेल, डॉ राजकुमारी अमृत कौर तथा अन्य लोग गए थे। दिल्ली में उनका घर ‘वाल्मीकि बस्ती’, अब बंटवारे से पीड़ित शरणार्थियों के लिए मुख्य निवास स्थान बना दिया गया था।

इन परिस्थितियों में गांधी से कहा गया कि वो बिड़ला हाउस को अपना अस्थाई निवास बनाएं ताकि राष्ट्रीय नेताओं के लिए भी उनसे मिलना आसान हो जाए। उनके जीवन को लेकर कई लोगों ने विशेष चिंता जताई और बिड़ला हाउस को सबसे सुरक्षित बताया जिसमें कमरे के अंदर ही बैठका, स्नानघर और अन्य जरूरत की सुविधाएं मौजूद थीं।

गांधी जी का कमरा

अपने आखिरी के 144 दिन में गांधी ने बिड़ला हाउस में कई जनसभाएं और दो अनशन किये। 30 जनवरी 1948 को जब गांधी की हत्या हुई तो पूरा देश सदमे में था। इसी परिसर में इनफार्मेशन एंड रीडिंग सेक्शन के अनुसार, उस समय के साक्षी और अमेरकी पत्रकार विन्सेन्ट शीन बताते हैं कि “मैं टैक्सी में शाम की प्रार्थना सभा के समय के आसपास बिड़ला हाउस गया। इस बार मैं अकेला था। मैं बिड़ला हाउस के गेट के सामने एक पेड़ के नीचे टैक्सी को खड़ा करवाया और प्रार्थना सभा स्थल की ओर चलने लगा। अभी शाम के पांच नहीं बजे थे और बड़ी संख्या में लोग पैदल, गाड़ियों और तांगों में आते जा रहे थे। जब मैं बगीचे के अंत की तरफ बने प्रार्थना स्थल पर पहुंचा तो वहां मुझे बीबीसी के दिल्ली संवादाता बॉब स्टिम्सन मिले, बॉब ने कहा कि उन्होंने बीबीसी के लिए महात्मा से कुछ प्रश्न पूछे हैं और परिसर में होने के कारण उन्होंने सोचा कि प्रार्थना सभा में भी भाग लें।

मेरी घड़ी में 5.12 हुए थे बॉब ने कहा ‘वे आ रहे हैं’। हम दोनों बगीचे की दीवार के किनारे खड़े हो गए जहां से वे आ रहे थे और संख्या के प्रकाश में चमकते भूरे माथे को देख रहे थे। यहां हमेशा की तरह लोगों का एक बड़ा समूह था, जिसमें कुछ तो खड़े थे और कुछ घुटनों के बल उनके आगे झुके थे। बॉब और मैं सीढ़ियों से करीब 10 फीट की दूरी पर थे और हम गांधीजी को नहीं देख पा रहे थे, क्योंकि वो लोगों के समूह से घिरे हुए थे। तब मैंने 4 छोटे, बेरंग, अंधेरे धमाकों की आवाज सुनीं। अनजाने भय से घबरा कर मैंने बॉब से पूछा ‘यह क्या है’? मैं नहीं जानता, उसने कहा और मुझे याद है कि उसके चेहरे का रंग उड़ गया था। ‘महात्मा तो नहीं’। मैंने कहा और तभी मुझे जवाब भी मिल गया।”

30 जनवरी 1948 को संध्या प्रार्थना के पहले गांधी ने सरदार पटेल के साथ 1 घन्टे के मीटिंग की थी। तत्पश्चात गांधी बैठका खिड़की से निकले और प्रार्थना स्थल की ओर अपने आखिरी कदम चले थे। जब आप बिड़ला हाउस जाएंगे तो उस खिड़की से लेकर प्रार्थना स्थल तक गांधी के आखिरी कदम के ढांचे बनाये गए हैं, जो उस पूरे रास्ते को फिर से जीवंत बना देता है।

कमरे के अंदर गांधी की लाठी से लेकर चश्मा, पानी पीने का ग्लास और खड़ाऊ जैसी चीजें रखी हुई हैं, मानो गांधी अभी यहां बैठक करने वाले हैं। कमरे की दीवारों पर गांधी के कुछ मूल्यवान संदेश टंगे हुए हैं जिसके बल पर गांधी ने देश को आजादी दिलाई।

प्रार्थना स्थल पर जिस जगह गांधी की हत्या हुई थी, उसी जगह पर समाधि स्थल बना दिया गया है। जहां बैठ कर आप ध्यान कर सकते हैं, पूरा प्रार्थना स्थल गांधी के शांति संदेश को फिर से उजागर करता है, बिड़ला हाउस के पूरे प्रांगण में मानो हर जगह गांधी मौजूद हैं, भले ही उसी जगह उनके शरीर की हत्या कर दी गयी हो पर उनके विचार आज भी वहां जिंदा हैं।

आधुनिकता के साथ गांधी का परिचय:

गांधी स्मृति के अंदर मल्टी-मीडिया म्यूजियम है, जिसके अंदर गांधी के संदेशों और उनके जीवन के बारे में आधुनिक यंत्रों के जरिए दिखाया गया है। इस म्यूजियम के अंदर आपकी मदद के लिए हमेशा लोग रहते हैं, जो आपको हर यंत्र के काम करने का तरीके से लेकर उसमें छुपे संदेश बतलाएंगे। युवाओं को गांधी के बारे में बताने के लिए ये म्यूजियम बेहतरीन है, गांधी जीवन को ये म्यूजियम कई तरीकों से चित्रित करता है, जैसे की गांधी जी पहली बार जिस रेलगाड़ी से पूरा भारत घुमे थे, वैसी ही रेलगाड़ी का एक मॉडल तैयार किया गया है जिसमें बैठ कर आप उसी सफर का पूरा चित्रण कर सकते हैं।

हैंडलूम खादी:

प्रांगण के अंदर आप हैंडलूम खादी से बने कपड़े भी खरीद सकते हैं, वो भी बहुत ही वाजिब कीमतों पर। खादी ग्राम के अंदर कपड़े, झोले, कुर्ते, गमछे, गांधी जी से जुड़े स्मृति चिन्ह जैसी चीजें मिलती हैं।


ये जरूरी बातें हमें लिख भेजी हैं निलय निरुपम ने। निलय पत्रकारिता के छात्र हैं। निलय को इतिहास और राजेनीति में विशेष रुचि है। वो बताते हैं कि नई-नई जगहों को देखने में एक अलग ही मजा आता है। लजीज खानों के बड़े शौकीन हैं। जानवरों से खूब प्यार है। लोगों से बातें करना बड़ा पसंद है। दोस्ती निभाने में तो उस्ताद हैं। देश-दुनिया के तमाम मुद्दों पर बेबाक राय रखते हैं। 


ये भी पढ़ें:

दांडी : मैं छूना चाहता था सत्याग्रह की पवित्र जमीन

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here