ललित निबंध: बुरांस के फूल, ठहाके और जीवन की वो यात्रा

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कुछ यात्राएं भुलाई नहीं भूलतीं। ये वाली यात्रा उनमें से ही एक थी। आज सोचती हूं तो सिवाय ठहाकों के कुछ याद नहीं आता। मैं वे बातें लगभग भूल चुकी हूं कि जिन पर हंसी आई थी, पर हम खूब हंसे थे ये याद है। ट्रिप के बाद हमने भी प्लैन्स बनाए थे। हर महीने न सही हर तीन महीने में एक बार घूमने के प्लैन्स। हम जगहों की लिस्ट बनाते, मिटाते और उसमें नाम जोड़ते जाते। वहां से आने के कई दिनों बाद तक तो गूगल पर best places to visit in summers करके सर्च करती रही थी। हमने जिंदगी के लिए जितने प्लैन बनाए होते हैं, उतने ही झटके जिंदगी हमारे लिए तैयार कर रही होती है। झटके जो सब कुछ हिला देने के लिए बनते हैं।

अब घूमने की बात आती है तो इमोशनल हो जाती हूं मैं। लगता है जैसे कहीं भी चली जाऊं, वो बात न होगी। झरनों में पानी कम हो गया होगा या नदियों में उतना पानी ही नहीं होगा कि हमारे पैर भी डूब जाएं और हरे-नीले-सफेद पत्थर भी साफ दिखाई दें या शायद बुरांस इस बार नहीं मिल पाएगा। क्या पता इस बार वो घास न मिल पाए, जिसे हमने पहाड़ी टैटू नाम दिया था। जिसे उल्टी हथेली पर जोर से चिपकाकर पत्ती छप जाती है। या शायद वो लोग नहीं होंगे, जिन्होंने मेरे मुंह से इतना बुरांस-बुरांस सुन लिया था कि अब उसे देखने के लिए पगलाए जा रहे थे। इतने कि किसी भी पेड़ पर लाल पत्ता दिखता था तो ‘वो तो नहीं है बुरांस’ कहने लगते और गाड़ी की स्पीड भी इसी उम्मीद में थोड़ा धीमी हो जाती। मैं ‘नहीं तो’ कहती और फिर आगे बढ़ते जाते।

अपनी चीज या जगह को देखने का मजा तब और बढ़ जाता है जब आप किसी और को वो चीज या जगह दिखा रहे होते हैं। और वो पल कि जब मुझे अचानक बुरांस का पेड़ दिख ही गया था, मैं कैसे चिल्लाई थी! ऐसे जैसे कि जंगल के बीच किसी टहनी पर लटका हुआ बचपन दिख गया हो। हम सबका बचपन यूं ही तो किसी न किसी टहनी पर लटका रहता है, बस हमारे पास गाड़ी से उतरकर उसकी ओर लपक लेने का टाइम नहीं होता। लेकिन उस दिन हम सबने टाइम निकाला था। मेरे साथियों ने खुद चढ़कर मेरे हाथ में दिया था मेरा बचपन। फिर हम सबने उसे अपनी हथेलियों में रख के देखा और अपना-अपना बचपन महसूस किया। कैसा सुकून मिला था उसके बाद !

मैंने सोचा था कि उस ट्रिप के बाद कुछ लिखूंगी, वहां की यादें सहेज लूंगी लेकिन वो यादें दिमाग में इतनी सुरक्षित हैं कि लिखने की जरूरत नहीं हुई कभी। लिखने लगती तो क्या लिख पाती और क्या नहीं लिखती। यात्राएं एक जगह पर कहां खत्म होती हैं। वो तो बस चलती जाती हैं जिंदगी भर हमारे साथ।


अपनी घुमक्कड़ी को, उस वक्त उमड़े जज्बातों को, यात्राओं से हासिल मुकामों को डॉक्यूमेंट करना, कभी-कभी मुश्किल काम हो जाता है। अपने दिल के आईने से चांदी का वर्क उतारकर इन शब्दों में पिरो दिया है लतिका जोशी ने। लतिका पत्रकार हैं। पहाड़ों में इनकी आत्मा बसती है, झरनों का संगीत इन्हें दुनिया में सबसे सुरीला मालूम होता है, चमकीली नदियों से इनकी नजरें रोशन होती हैं। यायावरी-आवारगी इनका खाना-पीना है। 


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