दो दिन में लीजिए शहर और गांव, दोनों का मजा

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घूमना किसे अच्छा नहीं लगता। नई जगह, नए लोग, नया खान-पान मुझे हमेशा से खुशी देता है। घूमने के लिए सही पार्टनर का साथ होना बहुत जरूरी होता है। पिछले साल के दिसंबर की बात है। मेरी दोस्त का यह पहला सोलो ट्रिप था। वो इससे पहले कभी अकेले कहीं नहीं गई थी। छुट्टियों के अभाव से हम केवल दो दिनों के लिए कहीं जा सकते थे। हमने चंड़ीगढ़ को चुना क्योकि यह दुनिया के सबसे खूबसूरत और सुविधाजनक शहरो में से एक है। इसी वजह से इसे ‘द सिटी ब्यूटीफुल’ भी कहा जाता है। हमें सुबह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़नी थी।

सुबह हम जब हम स्टेशन पहुंचे तो ट्रेन 2 घंटे लेट थी। हमारे पास इंतजार करने का वक्त नहीं था। ट्रेन का प्लान ड्रॉप करते हुए हमने आईएसबीटी कश्मीरी गेट से बस पकड़ी। हमें चार घंटों में चंड़ीगढ़ पहुंचा दिया। बस का किराया 450 रुपय था। बस ठीक-ठाक हालत में थी। बस का कंडक्टर एक सेवानिवृत सैनिक था। जो बहुत ज्यादा बातूनी भी था। पूरे रास्ते वो हमसे बातें करते हुए आ रहा था।

चंड़ीगढ़ सा दूजा कोई शहर नहीं

लगभग दोपहर के 12 बजे हम चंड़ीगढ़ पहुंचे। कंडक्टर ने चंडीगढ़ बस स्टैंड के छोले भटूरों की तारीफ बहुत की थी। हमें विश्वास था कि पंजाब के छोले भटूरे अच्छे ही होंगे। एक टुकड़ा खाते ही हमारी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। इससे ज्यादा खराब छोले भटूरे मैने कहीं नहीं खाए थे तो आप भी यह गलती न करना। अगर आप चंड़ीगढ़ घूमना चाहते हैं तो साइकल-रिक्शा में घूमें। चंड़ीगढ़ पूरा शहर अपने-आप में घूमने की जगह है। रिक्शे की कम रफ्तार में आप शहर को बहुत अच्छे से देख पाएंगे। साफ-सुथरे रास्ते। घरों और सड़कों का समानरूप होना। सड़कों के किनारे पेड़ कतार में लगे हुए थे।

रॉक गार्डन

नेकचंद जी का दिया दुनिया को बेहतरीन तोहफा

रिक्शा रॉक गार्डन के सामने रूका। नेकचंद जी का दिया दुनिया को बेहतरीन तोहफा। रॉक गार्डन को देखने के लिए हम जैसे कई लोग आए थे। हर एक दर-ओ-दीवार से कला टपक रही थी। टूटे मटकों से बनी गुड़िया, चूड़ियों से बने गुड्डे, भूलभुलैया, झरना और भी बहुत कुछ था वहां देखने के लिए। जितना देखा जाए कम ही लगता था।

सुखना लेक

सुखना में जब खो गई मेरी अंगूठी

मुझे अचानक सेनैटरी नैपकिन की जरुरत पड़ गई । रिक्शेवाले को हमने एक छोटी सी मार्केट ले जाने के लिए कहा। उसने हमें सेक्टर 17 की मार्केट में उतारा जो कि कोई छोटी मार्केट न होकर बहुत बड़ी मार्केट थी। सेक्टर 17 की मार्केट में आपको सभी प्रकार के ब्रांड मिल जाएंगे। सेक्टर 17 की मार्केट देखने में बहुत सुंदर पर महंगी थी। अगला डेस्टिनेशन था सुखना लेक। सुखना लेक देखने में बहुत ही मनभावन लगता है।

इस तरह खो गई मेरी अंगूठी

शाम के समय सुखना लेक की सुंदरता और भी बढ़ जाती है। हम शिकारा में सवार हो कर हम सूर्यास्त का मजा लेने लगे। शांत पानी में बहता शिकारा, शाम को घर जाते पक्षी और उनकी चहचहाहट समां को सुहावना बना रही थी। मैनें ना जाने क्या सोच कर पानी में हाथ डाला। इसी बीच पानी में मेरी चांदी की अंगूठी भी डूब गई थी।

गांव में बसी असली सुंदरता

शहर से गांव की ओर

हमारा मूवी देखने का मन था पर पटियाला में रह रहे मेरे रिश्तेदारों के बहुत आग्रह के बाद हम उधर के लिए रवाना हुए। रात हमारी उन्हीं के साथ बीती। अगर आप घूमने के शौकीन हों तो किसी रिश्तेदार के घर कभी न रुकें। उनके और हमारे प्लान में जमीन आसमान का फर्क होता है। अगले दिन किसी तरह हम अपना पीछा छुड़ाकर वहां से भागे। हम पटियाला बस स्टैंड़ पर खड़े थे और अब घूमने के लिए हमारे पास बहुत कम वक्त था। 3 बजे की हमारी चंड़ीगढ़ से दिल्ली के लिए ट्रेन थी। पास में ही था मोती बाग। रिक्शा ले कर हम मोती बाग पहुंचे पर पता चला वहां नवीनीकरण चल रहा था। तभी याद ख्याल आया कि पंजाब आए और गांव नहीं देखा तो क्या देखा। हमें पास में ही एक छोटे से गांव डाकना के बारे में पता चला। वहां के लिए सिर्फ एक ही बस चलती है। जो आपको वहां ले जाती है और वापस भी लेकर आती है। बस तो हमें मिल गयी थी और वापस आने के लिए हमारी बात भी हो गई थी।

बिचालियों से 22 साल बाद हुई मेरी मुलाकात

गांव के एक तरफ प्राचीन गुरुद्वारा था। जिसके अंदर लड़कियों का कॉलेज भी था। दूसरी तरफ हरे भरे खेत थे। जिसमें सरसों लगे हुए थे। बिचाली (धान में से चावल जब अगल किया जाता है तो जो बचता है उसे बिचाली कहते हैं) का बड़ा सा ढेर रखा हुआ था हम खेतों के बीच घूमने लगे। फिर हम गुरुद्वारा के अंदर गए तो वहां से तेज-तेज आवाजें आ रही थीं। हमें लगा कि वहां कोई लड़ रहा है पर वहां नाटक का रिहर्सल चल रहा था। बिना माइक के भी उन लड़कियों की आवाज बहुत बुलंद थी। आत्मविश्वास से भरी वहां की छात्राएं किसी भी शहर की लड़कियों से कम नहीं थीं। वहां का लंगर बहुत स्वादिष्ट था और वहां ढेर सारी लस्सी पीने के लिए मिली। बस आ चुकी थी। हम बस में बैठ कर करीब 2 बजे पटियाला बस स्टैंड पहुंचे। पटियाला से चंड़ीगढ़ 2 घंटे की दूरी पर थी। चंड़ीगढ़ से ट्रेन पकड़ना अब तो बहुत मुश्किल था।

अभी हम घर जाने के प्लान पर काम कर ही रहे थे, तभी एक आइडिया आया। पटियाला से अंबाला की दूरी 1 से डेढ़ घंटे की थी। यहां वही ट्रेन 5 बजे आती थी। हम अंबाला की बस में बैठ गए। 4 बजे बस अंबाला पहुंची। अभी ट्रेन आने में वक्त था। पूरे चंड़ीगढ़ और पटियाला में अच्छी चाय नहीं मिली थी तो हम निकल पड़े चाय की तलाश में। पास ही मार्केट में चाय तो मिली पर बहुत ही बेकार। वापस स्टेशन आकर ट्रेन पकड़ कर ली।

बस यही थी दिल्ली से चंड़ीगढ़ वाली हमारी छोटी सी यात्रा। कभी कभी होता है कि हमारी ट्रिप प्लान के मुताबिक नहीं जाती लेकिन ऐसे रैंडम कहीं भी घूम आना कम मजेदार नहीं होता।


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