उदासीन सत्ता, लाल आतंक के बीच संस्कृति बचाने में प्रयासरत आदिवासी समाज

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“ऐ जाने वफा ये जुल्म ना कर, गैरों पे करम अपनों पे सितम, मर जाएंगे हम

ये जुल्म ना कर, गैरों पे करम अपनों पे सितम..”

ये बोल हैं 1968 में आई फिल्म ‘आंखें’ में माला सिन्हा-धर्मेंद्र पर फिल्माए गए एक गाने के। आज इसकी प्रासंगिकता छत्तीसगढ़ के आदिवासियों से है, जो अपनी संस्कृति बचाने संघर्षरत है। ये बोल सरकार की तरफ से हो रही उनकी अनदेखी और ‘अंदर वाले’ (यही सम्बोधन करते हैं गांव के लोग नक्सलियों को) की तरफ से उनपर हो रहे सितम, जुल्म को बयां करते हैं।

अपने हकों के लिए धरने बैठे आदिवासी

ये वही आदिवासी हैं जिनके हित की रक्षा करने के मकसद से अट्ठारह साल पहले सन 2000 में मध्यप्रदेश का विभाजन कर छत्तीसगढ़ प्रदेश बनाया गया। 2011 सेंसस के अनुसार प्रदेश की आबादी 2.5 करोड़ आंकी गई जिसमें लगभग तैंतीस फीसदी जनसंख्या आदिवासी है। प्रदेश के उत्तर में सूरजपुर जिले से लेकर दक्षिण में सुकमा जिले तक लगभग 42 जनजातियां प्रदेश में निवासरत हैं जो अपने अस्तित्व को बचाए रखने संघर्षरत हैं और नित नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ की पहचान घोर नक्सल प्रभावित राज्य के रूप में हो चुकी है जिसके लिए सरकार और मीडिया दोनों बराबर रूप से जिम्मेदार हैं। हालिया चुनिंदा रिपोर्टों को छोड़ दें तो मीडिया ने छत्तीसगढ़ को तभी तवज्जो दी है जब-जब यहां की धरती लाल हुई है।

चाहे प्राकृतिक संसाधनों के भंडारण/उत्पादन की दृष्टि से हो या ऐतिहासिक महत्व या प्राकृतिक सुंदरता, किसी भी दृष्टिकोण से छत्तीसगढ़ राज्य देश के अन्य राज्यों से कमतर नहीं है। परन्तु जिस प्रकार इंसान की निन्यानबे अच्छाइयां होने के बावजूद चर्चा एक बुराई की ही होती है, वही हाल छत्तीसगढ़ प्रदेश का है, जिसके लिये मीडिया और सत्ता पक्ष दोनों बराबरी के गुनहगार हैं।

इन सिलवटों में सिमटा है सदियों का सफर

प्रदेश की एक तिहाई जनसंख्या आदिवासी समाज की है जिनकी प्रवृत्ति, जिनका स्वभाव नितांत सरल है और इसी सरल स्वभाव के चलते सत्ता और नक्सलियों के बीच सबसे ज्यादा पिस भी यही समाज रहा है। इनकी सरलता की आड़ लेकर तमाम लोग मौज कर रहे हैं, फल-फूल रहे हैं। आदिवासी समाज की स्थिति में कुछ ज्यादा परिवर्तन आ गया हो ऐसा कहना उनके साथ बेईमानी होगी।

हालांकि छत्तीसगढ़ राज्य प्रगति की ओर अग्रसर है, कई नई ऊंचाइयां छू रहा है, बाकी राज्यों को कई पैमानों में टक्कर देने के साथ उनसे आगे भी है, पर आदिवासी समाज की स्थिति ऊपर और नीचे के दांतों (सत्ता और नक्सली) के बीच फंसे जिह्वा जैसी है।

नेता आते हैं जल-जंगल-जमीन की बातें करते हैं, मुख्यधारा (हालांकि मेरा मानना है कि जिन्हें सरकार मुख्यधारा से जोड़ने की बात करती है असल में वे लोग मुख्यधारा में ही हैं और हम-आप भटक चुके हैं) से जोड़ने की बातें करते हैं पर जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करते हैं।

आज जरूरत है दांतों के बीच फंसे उस जिह्वा को निकालने की जिससे वह खुल कर जी सके। सत्ता पर आसीन नीति निर्माताओं को जरूरत है संवेदनशीलता के साथ आदिवासी समाज से चर्चा करे, उनकी जरूरतों को, अपेक्षाओं को पूरा करने नीति निर्धारित करे। नक्सली समस्या को जल्द से जल्द खत्म करें। वहीं मीडिया को जरूरत है दिल्ली के स्टूडियो से बाहर निकल कर छत्तीसगढ़ में आए जमीनी तौर पर देखें, समझें और रिपोर्टिंग करे।

क्योंकि राज्य से बाहर आमजनता के बीच अभी जो धारणा छत्तीसगढ़ राज्य को लेकर इतने वर्षों में मीडिया ने बनाई है वह केवल एक पहलू है उससे इतर इस राज्य में रामायण काल से लेकर बुद्ध के विहार, जैन तीर्थ, बाबा घासीदास के सन्देश, मानव की आवाज निकालने वाली मैना, हीरे का भण्डार, चित्रकूट जलप्रपात सहित अनगिनत चीजे हैं। जरूरत है खून, शहादत, लाल आतंक से इतर छत्तीसगढ़ की बाकी अच्छाइयों को लोगों तक पहुंचाने की।

नाउम्मीदी में बीत रहा है इनका जीवन

” माना कि अंधेरा घना है, पर दिया जलाना कहां मना है “

निश्चित रूप से मीडिया सहित लोकतंत्र के चारों स्तम्भ अगर संवेदशीलता के साथ इस ओर कदम बढ़ाएं अंधेरा भी छंटेगा, आदिवासी समाज अपने इच्छानुरूप, अपनी संस्कृति को बचाते हुए बढ़ भी सकेगा और छत्तीसगढ़ राज्य से लाल आतंक वाला उपनाम भी हटेगा।


छत्तीसगढ़ के दिल में छिपी बैठीं ये सारी बातें शब्दों में उतारकर हमें भेजी हैं हर्ष दूबे ने। हर्ष पत्रकार हैं। अपने राज्य में इनकी जान बसती है। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक विरासतों और लोककलाओं पर जितना गर्व है, उतना ही मन में जंगल और प्राकृतिक संपदाओं पर लटकी लालचियों की तलवार से उपजी दुश्चिंता भी है। हर्ष आदिवासियों की दिक्कतों को, राज्य पर निरंतर छाए हिंसा के बादलों को विभिन्न मंचों से उठाते रहते हैं।


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1 COMMENT

  1. “वे लोग मुख्य धारा में ही हैं केवल हम और आप भटक गए हैं। ” बहुत सटीक लिखा आपने ..

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