दिल्ली में हुए कत्लोगारत की गवाह है सुनहरी मस्जिद

0
1605
views

अभिनव गोयल टीवी पत्रकार हैं लेकिन झूमझाम और सनसनाती हुई पत्रकारिता से खुद को बचाए रखने की भरसक कोशिश करते हैं। जमीन से जुड़े हैं। किसी विषय पर तब मत व्यक्त करते हैं जब गहनता से उसकी पड़ताल कर लेते हैं। इतिहास में काफी रुचि है। दिल्ली पर काफी कुछ पढ़ रहे हैं, दिल्ली को परत दर परत समझने की कोशिश कर रहे हैं। इसी सिलसिले में हमें एक दिलचस्प खोजबीन लिख भेजी है। पढ़िए और ज्ञान बढ़ाइए।


आज से करीब 278 साल पहले…मौसम में नमी थी, पलाश के पेड़ सख्त लाल रंग के फूलों के इंतजार में थे। महान तवायफों का मुगल शहर अपने उरूज पर था। तवायफों के सौंदर्य, रक्स, नफासत, नजाकत के चर्चे पूरे एशिया में फैले हुए थे। उनके कोठों की तंग गलियां मुगल उमराह के हाथियों से जाम हो जाया करती थीं। उन दिनों शहर में जगह-जगह महफिलें सजा करती थी। एक लंबे अर्से के बाद शहर की जमीं पर सबसे रुमानी कविताएं लिखी गईं। ये मुगल बादशाह रंगीला की दिल्ली थी।

तभी अचानक ऐसा दिन आया जिसे इतिहास ने दिल्ली के इतिहास में सबसे वीभत्स दिन की तरह दर्ज किया। एक ऐसा कत्लेआम जिसे दिल्ली ने अपने इतिहास में कभी नहीं देखा था। आज भी पुरानी दिल्ली की जर्जर इमारतों पर वे जख्म हू-ब-हू दर्ज हैं। उन्हीं में से एक है लाल किले से थोड़ी दूर पर शीशगंज गुरद्वारे के पास सुनहरी मस्जिद। वो सुनहरी मस्जिद जिसके बरामदे में खड़े होकर नादिर शाह ने तलवार म्यान से निकालकर लहराई। फिर क्या ? दिल्ली में लाखों लोगों का दिन के उजाले में कत्ल किया गया। समय के थपेड़ों ने भले ही इसकी मस्जिद की जुबां सिल दी हो लेकिन इस कत्लोगारत की चश्मदीद सुनहरी मस्जिद आज भी बेहवासी में अपनी गवाही दे रही है। कभी समय लगे और पुरानी दिल्ली जाना हो तो सुनहरी मस्जिद जरूर जाना।

आसानी से आपकी नजरों से ओझल हो जानी वाली ये मस्जिद शीशगंज गुरद्वारे के पास है। इसे सुनहरी मस्जिद कहा जाता है। इसके चारों ओर तीन गुमंद बने हुए हैं जिसपर तांबे के साथ सोने का पानी चढ़ाया गया था जिसकी वजह से इसे सुनहरी मस्जिद कहा जाता है। ये मस्जिद अपने आप में एक पूरा इतिहास समेटे हुए हैं। मस्जिद के गेट पर एक बोर्ड लगा है जिसपर आपको उस कत्लेआम का जिक्र मिलेगा। साथ से ही छोटी छोटी सीढ़ियां ऊपर मस्जिद की ओर जाती हैं। कहते हैं इन्हीं सीढ़ियों पर दिल्ली के बादशाह रंगाला के वजीर ने अपनी पगड़ी नादिर शाह के कदमों में रख दी थी। जिसके बाद दिल्ली का कत्लेआम रूका।

कत्लोगारत दिल्ली के हिस्से कुछ यूं आया

एक गरीब चरवाहे का बेटा नादिर शाह देखते ही देखते ईरान का शासक बन बैठा। नवंबर 1738 को नादिर शाह ने लूट के इरादे से हिंदुस्तान की तरफ कूच की। कुंजपुरा की लड़ाई में उस समय के बादशाह रंगीला को हराकर दिल्ली की गद्दी पर जा बैठा। बकरा ईद के दिन दिल्ली की जामामस्जिद के साथ और दूसरी मस्जिदों में सुन्नी ढंग से नादिर शाह के नाम का खुतबा पढ़ा गया। अगले ही दिन दिल्ली में अफवाहें उड़ने लगी की नादिर शाह को मार दिया गया है। इन अफवाहों पर चढ़कर दिल्ली के बाशिंदो ने नादिर शाह के कुछ सैनिकों को मार गिराया। वो सुल्तान जिसने दिल्ली के बादशाह रंगीला को जनानखाने में रहने के लिए मजबूर कर दिया और उसके सैनिकों के साथ ऐसा बर्ताव, ये नादिर शाह को कैसे मंजूर हो सकता था।

अगले दिन यानि 21 मार्च 1739 के दिन नादिर शाह जंगी लिबास में लाल किले से सुनहरी मस्जिद के लिए निकला। कहते हैं जब मस्जिद जाते समय नादिर शाह पर किसी ने गोली चलाई लेकिन वो गोली नादिर शाह के पास खड़े एक आदमी को जा लगी। अपने सैनिकों की लाशें देख नादिर शाह बौखला उठा। नादिर शाह ने सुनहरी मस्जिद के बरामदे से अपनी तलवाल म्यान से निकाली। म्यान तलवार से निकालना सैनिकों को साफ निर्देश होता है कि जब तक तलवार वापिस म्यान में नहीं जाएगी तब तक कत्लेआम होता रहेगा। देखते ही देखते हजारों लोगों को बेरहमी से मार दिया गया।

इतिहासकार गुलाम हुसैन खान ने याद किया “ कई घरों में आग लगा दी गई, कुछ ही दिनों में गलियों और घरों में भरी सड़ती लाशों की दुर्गंध इस कदर ज्यादा थी कि पूरे शहर की हवा इससे खराब हो गई थी। आनंदराम जो उन दिनों वकीलपुरा बस्ती में रह रहा था उसने लिखा कि चांदनी चौक, फलों के चौराहे वाला बाजार, दरीबा बाजार, और जामा मस्जिद के इलाकों में भारी कत्लेआम हुआ। इतिहासकार हरचरंदास के मुताबिक 1 लाख लोग इस कत्लेआम में मारे गए

एक डच चश्मदीद मैथ्यूज वान लिपसाई ने रोंगटे खड़े कर देने वाले इस कत्लेआम को इस तरह दर्ज किया ‘ईरानी जानवरों की तरह बर्ताव कर रहे थे।। ऐसा लग रहा था कि खून की बारिश हुई हो, क्योंकि नाले खून से बजबजा रहे थे। कम से कम 10 हजार महिलाओं और बच्चों को गुलाम बनाकर ले जाया गया’। देर शाम बादशाह रंगीला का संदेशा लेकर उसका वजीर नादिर शाह के पास पहुंचा। वजीर ने अपनी पगड़ी नादिर शाह के पैरों में रख दी। नादिर शाह की सारी शर्तें मानने के बाद ही तलवार को वापस म्यान में रखा गया। कुछ घंटे चले इस कत्लेआम में हजारों लोग मारे गए। ऐसा कत्लेआम दिल्ली ने फिर कभी नहीं देखा। कुछ दिन रहकर नादिर शाह वापिस इरान लौट गया और दिल्ली की बादशाहत रंगीला के नाम कर गया।


ये भी पढ़ेंः

‘दिल्ली अभी दूर है’ कहावत के पीछे की कहानी

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here