धौलाधार की पहाड़ियों पर पहुंचकर कवि की कल्पनाओं में भी रंग भर जाते हैं

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तीन दिनों की लगातार छुट्टी नौकरी पेशा मनुष्यों के लिए किसी ईश्वरीय वरदान से कम नहीं। इन अवसरों पर अपनी जन्मना आलसी प्रवृत्ति के कारण मेरी योजना दफ्तर की कुछ बकाया फाइलें निपटाने, एक साथ तीन-चार किताबें पढ़ने और मुखपोथी पर अविराम विचरने की होती हैं। बल्कि मुझे तो लगता है कि पुरुष मात्र में अपनी भ्रामरी प्रकृति के अलावा आलस्य भी एक जन्मजात ‘मैन्यूफैक्चरिंग डिटेक्ट’ है। किसी भी सद्गृहस्थ से आप अकेले में पूछिये तो वह सहज ही मेले-ठेले, शॉपिंग-वॉपिंग और सैर-सपाटे के प्रतिअपनी वितृष्णा की स्वीकारोक्ति करेगा (बंगाली मानुष शायद अपवाद हों)।

जो घनघोर पुरुषसत्तावादी प्राणी अथवा मानव समूह हैं, उनके लिए तो उनका आलस्य ही उनकी सत्ता का प्रमाण है। कम से कम मेरे लिए तो इसी कारण से वनराज सिंह ईश्वर की श्रेष्ठतम कृति है और मैं टीवी पर घंटों सिंहों की दिनचर्या देखते हुए उनकी नकल करता हूं अर्थात् चुपचाप पड़ा रहता हूं। लेकिन जंगल और गृहस्थी की सच्चाइयां अलग-अलग होती हैं। जैसा कि महान दार्शनिक रूसो कह गए हैं ‘मनुष्य स्वतंत्र जन्म लेता है, किंतु उसके बाद मृत्युपर्यंत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहता है’। तो छब्बीस जनवरी से शुरू होने वाली तीन दिन की छुट्टियों में कूटनीतिक कारणों से मुझे ‘कहीं चलने’ का विचार करना पड़ा।

पर जाएं कहां? या तो वहां जा सकते हैं जो जगह सीधे वायुसेवा से जुड़ी हो, या वहां जहां सड़क मार्ग से पांच छह घंटे में पहुंचा जा सके। रेल यात्रा मैं तभी करता हूं जब कि मरते-फरते भी कोई उपाय न रहे। तो बेंगलुरु, मुम्बई, दिल्ली, हरिद्वार आदि नामों पर विचार करने के पश्चात अंततः धर्मशाला चलने का विचार हुआ।

पर यह क्या? पच्चीस की रात को ही अचानक चंडीगढ़ के मौसम ने करवट ली और छब्बीस की सुबह घटाटोप धुंध छा गयी, ऐसी कि हाथ को हाथ न दिखे। हम हिचकिचाए, यात्रा इतनी धीमी न हो जाए कि दोपहर की बजाए शाम को पहुंचें और पहुंचें भी तो धुंध के मारे कुछ दिखे ही ना। पर हमारे ड्राइवर खास पालमपुर-धर्मशाला के ही हैं। उन्होंने आश्वस्त किया, ‘ना साहब जी। हिमाचल में पंजाब के जैस्सी धुंध नईं होत्ती। आप चलो तो सही।’

उनकी बात सच थी। नंगल में सतलज को पार कर ऊना पहुंचते- पहुंचते पूरे प्रांत पर निर्विकल्प धूप छा गयी थी। शिवालिक के निचले हिस्से में पानी की धारों से कटी फटी नंगी मिट्टी की पहाड़ियां/ ढूह हैं, मानो किसी विराट दैत्य ने अपनी उंगलियों से धरा पर गहरी लकीरें खींच दीं हों, कुछ- कुछ चम्बल की घाटियों की तरह। गांवों के बीच भी टीले हैं, पर उन पर हरियाली है, झाड़ियां हैं, पेड़ हैं। यह पूरी दृश्यावली प्रखर किंतु स्निग्ध धूप में चमक रही थी। ऊना से कोई साठ सत्तर किलोमीटर आगे जाने पर, अम्ब के बाद, आप देव-भूमि में प्रवेश करते हैं, बल्कि देवियों की भूमि में। मां चिंतपूर्णी, ज्वालामुखी और बगलामुखी की भूमि, आप कांगड़ा की घाटी में उनके आशीष के बिना प्रवेश नहीं कर सकते। कांगड़ा के भूगोल को ब्यास नदी बीचोबीच चीरती है, एक गहरी घाटी है जिसकी दूसरी ओर एक कोने पर कांगड़ा का दुर्जेय दुर्ग है। कटोच राजपूतों की सदियों लम्बी गाथा का साक्षी।

चम्बा और कांगड़ा के राजवंश अपनी प्रजा- वत्सलता और पहाड़ी जीवट के लिए प्रसिद्ध थे और इसी कारण एक लम्बे अरसे तक अपनी स्वतंत्रता बचाए रखने में सफल भी हुए। सल्तनत और मुगल काल में पराजयों के बावजूद उनका स्वतंत्र अस्तित्व पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। संसार चंद कटोच इस वंश के सबसे समादृत शासक थे कि जिनने महाराजा रणजीत सिंह तक की आंख में आंख में डाल कर मुकाबले का साहस दिखाया और गोरखा आक्रांताओं से भी दो दो हाथ किये। पर अंततः 1810 की ज्वालामुखी संधि के में कांगड़ा ने लाहौर की अधीनता स्वीकार कर ली और जब महाराजा रणजीत सिंह जी की मृत्यु के पश्चात अंग्रेजों ने सिख साम्राज्य को दबोचने में कामयाबी पायी, तो कांगड़ा अंग्रेजों के मातहत हो गया।

यह इस पर्वतीय क्षेत्र की यात्रा का एक नया पड़ाव था। 19वीं सदी के प्रारंभ से ही अंग्रेज अपनी फौजों और हाकिम-हुक्कामों को हिंदुस्तान की झुलसती गर्मी से राहत देने के लिए हिमालय की निचली श्रेणियों पर हिल स्टेशन बसा रहे थे । कांगड़ा और चम्बा की उपत्यकाओं को हासिल करने के बाद अंग्रेजों ने यहां भी पांव पसारे। नेपाल से युद्ध के दरमियान आक्टरलूनी साहब ने गोरखा जाति के दुर्दम्य साहस का साक्षात किया था। उनकी प्रेरणा से ही अंग्रेजों ने अनेक गोरखा रेजिमेंटों का गठन किया और कांगड़ा से उपर कोई बीस किलोमीटर आगे एक प्राचीन हिंदू तीर्थ ‘धर्मशाला’ में 66 गोरखा लाइट इंफैट्री और प्रथम गोरखा राइफल्स की छावनियां बसायीं। आज यहां 4 गोरखा राइफल्स की एक प्रमुख छावनी है। हिमाचल का पर्वतीय क्षेत्र तो आजादी के बाद तक पंजाब का हिस्सा रहा पर उसके बहुत पहले ही धर्मशाला ने धीरे धीरे कांगड़ा का वैभव छीन लिया और जिले का मुख्यालय बन बैठा।

देवियों में चिंतपूर्णी जी की महत्ता किंचित् ज्यादा है और मुख्य राजमार्ग पर दूर दूर तक वहां जाने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए छोटे मोटे होटल-ढाबे हैं। चिंतपूर्णी प्रतिष्ठान ने भी पैदल यात्रियों को खयाल में रखते हुए मार्ग में बड़ी चिताकर्षक ‘वर्षा शालिकाएं’ बनवायी हैं।

समयाभाव के कारण हमने देवियों को बिना रुके दूर से ही प्रणिपात किया। हां, एक ढाबेनुमा रिसार्ट में चाय पीने के लिए जरूर रुके जिसके पीछे बच्चों के मनोरंजन के लिए एक छोटा-सा अम्यूजमेंट पार्क था। हिमाचली लोग अपने स्वभाव के माधुर्य के लिए जाने जाते हैं। होटल वाले ने चाय में भी यथेष्ट माधुरी डाली थी, ऐसी कि मेरा जैसा मधु-प्रेमी भी हथियार डाल गया।

एक वृद्ध दंपति स्वेटर-शाल के कील कवच से लैस अपने अपने हाथों में सस्ते किंतु वृहदाकार चीनी मोबाइल पकड़े आभासी दुनिया में खोये थे, और उससे बाहर तभी आये जब वेटर उनके सामने डेढ़ हाथ लम्बे मसाला डोसा रख गया। नीचे पार्क के एक अपेक्षाकृत सूने से कोने में एक युवा जोड़े ने अड्डा जमाया था। युवती अपनी बात नैनन से , बैनन से और सैनन से कह चुकने के बाद बची हुई बातें हिचकीनन से कह रही थी। युवक निरूपाय सा लग रहा था। इस आधुनिक युग में यह रीतिकालीन समां देखकर मुझे कौतूहल सा हुआ, पर जब्त कर गया। दूसरे के फटे में भला क्या टांग अड़ाना।

कांगड़ा के बाद चढ़ाई थोड़ी तीखी है, बहुत नहीं। दिन साफ हो तो आप नीचे से ही हिमाच्छादित शैल शिखरों की झलक पा सकते हैं। किंतु पहाडों पर शाम जल्दी झुकती है और धर्मशाला पहुंच कर हम जब तक खाना-वाना खाकर होटल से निकलते, चोटियों पर धुंधलका सा छा गया था। हम सीधे मैक्लोडगंज निकल लिए।

मैक्लोडगंज धर्मशाला का जुड़वां कस्बा है, धर्मशाला से कुछ उपर। अंग्रेजों द्वारा बसायी गयी गोरखा रेजिमेंट की छावनियाँ धर्मशाला और मैक्लोडगंज के बीच की ऊंचाइयों पर हैं और मैक्लोडगंज मूलतः एक छावनी बाजार है। इसके सहारे आज भी पंजाब के तात्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर Donald Friell McLeod साहब बहादुर की स्मृति जीवित है। मैक्लोडगंज से कुछ नीचे, रास्ते में ही Forsythgunj नाम की एक जगह है, किन्हीं अन्य गुमनाम से साहब Forsyth के नाम पर। वहीं एक टूटे फूटे कब्रिस्तान से घिरा एक भग्नप्राय चर्च है St John in the Wilderness- यथा नाम तथा रूप। कांगड़ा के भयानक भूकंप (1905) में क्षतविक्षत और भारतीयों की स्वभावगत इतिहास विमुखता से शापित। चर्च की दीवारों पर गोरखा राइफल्स के शुरुआती दिनों में उनके सेनानायक रहे अंग्रेज अफसरों की स्मृति में ताम्र पट्टिकाएं लगीं हैं।

1857 के गदर के बाद जब भारत की सत्ता ईस्ट इंडिया कंपनी से सीधे महारानी विक्टोरिया के हाथों में गयी तो बड़े लाट साहब (गवर्नर जनरल) वायसराय भी कहलाने लगे। पहले वायसराय थे लार्ड कैनिंग और दूसरे लार्ड एल्गिन। वायसराय एल्गिन ने मैक्लोडगंज में ही अपनी आखिरी सांसे ली थीं और इसी चर्च के पीछे उन्हें दफन किया गया था। परिसर में लगे एक अभिलेख के अनुसार लाट साहब की मैक्लोडगंज से बड़ी लगन लग गयी थी और उन्होंने यहां के तीन देवदार वृक्षों को एडिनबर्ग स्थित अपनी पुश्तैनी जमींदारी में भिजवाया था जहां कि वे आज भी फल फूल रहे हैं। उन्होंने यह इच्छा भी जाहिर की थी कि जब भी, जहां भी उनकी मृत्यु हो, उन्हें इसी चर्च में दफनाया जाए।

उनकी पत्नी Mary Louisa ने अपने पति James Bruce, Earl of Elgin & Kincardine की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्हें यहीं दफनाने की व्यवस्था की और उनकी याद में एक स्मारक बनवाया था जो आज गुमनामी के इस बियाबान में खोया पड़ा है। यद्यपि इस स्मारक पर आदम और हव्वा के हतभाग्य पुत्र Abel से संबद्ध एक प्रसिद्ध उक्ति उत्कीर्ण है, He Being Dead Yet Speaketh, पर आस पास लार्ड एल्गिन की कीर्ति की कोई आहट भी सुन पड़ती हो, ऐसा नहीं लगता। जिस देश में अब अपने शहीदों की मजारों तक पर मेले नहीं लगते, वहां इन विदेशी शासकों का नाम डलहौजी और मैक्लोडगंज के सहारे बचा हुआ है, यही क्या कम है ?

मैक्लोडगंज आज मूलतः दलाई लामा के निवास और निर्वासित तिब्बत सरकार के प्राशासनिक केंद्र के रूप में ख्यात है। आधा नगर निर्वासित तिब्बतियों का ही है। भारी संख्या में गेरुआ वस्त्र पहने घुटे हुए सिर वाले लामा य वहां घूमते दिखते हैं। दलाई लामा का मठ मैक्लोडगंज बाजार के एक सिरे पर है। परिसर में शांति है, जैसी अमूमन बौद्ध मठों में होती है। भगवान बुद्ध की मुख्य प्रतिमा की बगल में एक कक्ष है जिसमें आचार्य पद्मसंभव की एक प्रतिमा है कि जिनने अपनी वाग्मिता से तिब्बत में वज्रयान की ध्वजा फहरायी थी।

उसकी बगल में काष्ठ निर्मित भगवान् अवलोकितेश्वर की एक असाधारण मूर्ति है; तपश्चर्या में लीन, चेहरे पर श्मश्रु। कम से कम मैंने इससे पहले बुद्ध की दाढ़ी मूंछ वाली मूर्ति नहीं देखी थी, देखी भी हो तो याद नहीं। किंतु दाढ़ी मूंछ के बावजूद भगवान् के आनन पर प्रभा वही थी, जिनके नयनों से सूर्य और चंद्र, भ्रू से महेश्वर, स्कंधों से देवगण, हृदय से नारायण, दांतों से सरस्वती, मुख से वायु, पैरों से पृथ्वी तथा उदर से वरुण उत्पन्न हुए हों। एक हंसमुख सन्यासी दर्शनार्थियों को एक विराट धर्मचक्र के प्रवर्तन के लिए आमंत्रित कर रहा है। मैक्लोडगंज बाजार की संकरी गलियों में भी जो मंदिर हैं, उनकी चहारदीवारी पर भी छोटे छोटे धर्मचक्रों की श्रृंखला है और यात्रीगण आते जाते उन्हें घुमाते चलते हैं।

मैक्लोडगंज के एक दूसरे सिरे पर भागसूनाथ का प्राचीन मंदिर है। वे गोरखा रेजिमेंट के अधिष्ठाता देव रहे हैं। परंपरा के अनुसार भागसू दैत्यों के राजा थे। उनकी राजधानी अजमेर में पानी का बड़ा संकट था। तो किसी अजस्र जलस्रोत के संधान में वे हिमालय जा पहुंचे। उन्हें एक डल (झील) मिला, नागों का। नागदेव कहीं गए थे। भागसू नाथ ने चुपके से डल का पानी अपने कमंडल में समेटा और निकल पड़े वापस। पर अभी रास्ते में ही थे कि धर्मशाला की पहाड़ी पर नागनाथ ने उन्हें धर दबोचा। लडाई में कमंडल में कैद डल का पानी बह निकला और आज भी वह भागसूनाथ मंदिर परिसर में एक चश्मे से लगातार बह रहा है।

मरने से पहले भागसूनाथ ने नाग देवता से दो वरदान मांगे। एक तो कि उनका नाम भी अनादिकाल तक अजर-अमर रहे। दूजे कि उनकी राजधानी अजमेर में पानी की व्यवस्था हो जाए। नाग देवता ने उनकी दोनों मन्नतें पूरी कीं। तबसे यहां भगवान शंकर का यह मंदिर भागसूनाथ के नाम से जाना जाता है। परिसर के बाहर एक बोर्ड रखा हुआ है ‘शराब और सिगरेट पीकर मंदिर परिसर में आना मना है’। इस आदेश का सम्मान करते हुए चश्मे में नहाने की तैयारी कर रहे कुछ नवयुवक एक पेड़ की ओट लेकर सिगरेट की बजाय गांजा पी रहे हैं।

बाजार से दस-बारह सिख पुरुषों का एक दल गुजर रहा है,गणतंत्र दिवस के उपलक्ष में हाथों में दारू की बोतलें पकड़े अपनी स्वाधीनता की पताका फहराते हुए । दल के सदस्यों में उम्र का फर्क चकित करने वाला है, कुछ साठ पार के हैं, कुछेक चालीस के पेटे में और कुछ बीसेक साल के तरुण। किंतु मदिरा का मद और उद्दाम पौरुष का साझा दंभ उनकी उम्र के अंतर को पाट रहा है। तीस चालीस साल पहले तक भारतवर्ष में पर्यटकों का मतलब पूरा परिवार होता था। अधेड़ गृहपति, कुछ बुजुर्ग, एकाध युवा दम्पति, और बच्चे। फिर दौर आया एकल परिवारों का अर्थात् दम्पत्तियों का अपने बच्चों के साथ घूमने का। फिर युवा, नवविवाहित दम्पत्तियों के हनीमून के लिए अथवा अन्यथा घूमने का। और अब युवा जोड़ों के घूमने का, वे चाहे दम्पति हों न हों। आज अस्सी फीसद भीड़ इन्हीं जोड़ों की है।

जो भाग्यहीन अभी जोड़े नहीं बना पाये हैं, वे दोस्तों के साथ घूम रहे हैं। कुछ झुंड लड़कों के हैं, कुछ लडकियों के। लड़कियां सौंदर्य के प्रति चैतन्य हैं और लड़के उनके सौंदर्य से चेतनाशून्य से हो रहे हैं। नोट करने लायक बात यह है कि लगभग एक ही प्रकार की पृष्ठभूमि से आने के बावजूद लड़कियां अंग्रेजी में गिटपिट कर रही हैं, जबकि लड़के पंजाबी में आहें भर रहे हैं। प्रतीत होता है कि हुस्न और इश्क की भाषा आज के जमाने में अलग-अलग है। पर भावना के उद्रेक में भाषा का चिलमन सरक जाता है। एक लड़की व्हिस्की के एक फ्लास्क पर मोहित हो कर बोल उठती है, अरे किन्ना चंगा लग रहा है यार।

लड़के लड़कियों के कुछ मिश्रित झुंड भी हैं । दारू की एक दुकान पर ऐसा ही एक मिश्रित झुंड खरीदारी कर रहा है। मैं समय से पीछे चल रहा हूं इसलिए मेरी कल्पनाएं भी आशंकित हैं, कहीं A Passage to India या ‘पिंक’ जैसा कुछ न घट जाए। शाम झुकते झुकते ही अंधेरा सुरमई हो गया है। तरह-तरह के तिब्बती स्मृतिचिह्न बेचने वाली दुकानें बंद होने लगी हैं। सडकों पर टीन के डब्बों में अलाव सुलग रहे हैं। एक असंभव सी तंग लगने वाली गली में दो तीन जने खुसुर-फुसुर करते हुए एक संकरे जीने पर चढ़ रहे हैं। जाने क्या पक रहा है।

अगली सुबह कहीं धुंध का नामो-निशान नहीं है। मैं बालकनी में खड़ा होकर सामने की घाटी पर धीरे-धीरे चढ़ती धूप निहार रहा हूं कि सहसा मेरी नजर दाहिने जाती है। हमारे होटल के सामने घाटी है और पीछे पहाड़ी जिसके एक कटाव से एक हिमाच्छादित शिखर दिख रहा है। सामने, साक्षात, मानो हाथ बढ़ा कर छू लें। हम दौड़े-दौड़े छत पर जाते हैं, पर्वतराज हिमालय के दर्शन करने।

पूरा का पूरा धर्मशाला-मैक्लोडगंज धौलाधार पर्वत श्रृंखला के आंचल में बसा है। आप चाहे जहाँ से देखें धौलाधार की चोटियाँ आपको ठीक अपने सर पर दिखेंगी। शिवालिक के हिल स्टेशनों में; मसूरी, नैनीताल अथवा शिमला में आपको बर्फानी चोटियां दिखती हैं, पर इस तरह से बिल्कुल पड़ोस में नहीं। मैं जगह जगह रुक कर इस नयनाभिराम दृश्य को निर्बाध देखना चाहता था, अपने प्रिय कवि ली ताई पो की तरह, We sit together, the mountain and me / Until only the mountain remains. पर एक बार फिर जंजीरों ने मुझे खींचा। अच्छा चलिए अब, बहुत हो गया।


ये दिलचस्प यात्रा विवरण हमें लिख भेजा है संजय कुमार ने। संजय एसबीआई में अधिकारी हैं। देश-दुनिया के तमाम मुद्दों पर खासे सजग रहते हैं। इतिहास में विशेष रुचि है। पढ़ते-लिखते रहना इन्हें जीवंत रखता है। घूमने जाते हैं तो अपनी चमकदार आंखों से उस जगह की हर बारीकियों को दिमाग में संचित करते जाते हैं, फिर लौटकर बड़े ही मजेदार तरीके से लोगों को उसकी कहानियां सुनाते हैं।


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