गरीबों की फ्री में सर्जरी कर रहे हैं यह ‘योगी’

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देहरादून में बनाया गया डॉ योगी ऐरन का जंगल मंगल। ऐसी जगह जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। मुझे भी बड़ी मुश्किल से इसका पता चला था। शायद कुछ खास खबरों में रुचि होने के कारण ही मैं इस तक पहुंच पायी थी। डॉ. योगी ऐरन देहरादून के बेहतरीन सर्जन हैं। 35 साल से भी ज्यादा समय से वह जले हुए और जानवरों के हमले से जख्मी लोगों का मुफ्त में इलाज कर रहे हैं। हर साल डॉ ऐरन अमेरिकी विशेषज्ञों के साथ साल में दो बार मुफ्त कैंप भी लगाते हैं।

मास्क का एक मॉडल

देहरादून में हमारे पहले कदम

मैं और मेरी दोस्त ने देहरादून के जंगल मंगल जाने और डॉ ऐरन से मिलने का मन बनाया। 23 अक्टूबर की शाम 10:30 बजे हमने कश्मीरी गेट से बस पकड़ी। 350 रुपए में हमें अच्छी-खासी सेमी स्लीपर बस मिल गयी थी। माना कि थोड़ी पुरानी थी पर हमारे पॉकेट के हिसाब से हमें तो अच्छी लगी। चौबीस अक्टूबर की सुबह 4:45 पर बस ने हमें देहरादून बस स्टैंड पर उतारा। आधी नींद भरी निगाहों से हमने चारो तरफ देखा। अंधेरा होने के बावजूद वहां बहुत चहल-पहल थी।

हम डॉ योगी से मिलने के लिए उत्सुक तो थे ही इसलिए जल्दी से हम तैयार हो गए। हमने उन्हे कॉल किया तो पता चला कि उनकी गाड़ी किसी जंगल में खराब हो गयी थी। अगले दिन मिलने की हमारी बात तय हुई। अब हमारे पास पूरा दिन था। हम सफर से थक तो गए थे, इसलिए हमने आराम करने में ही अपना भलाई समझी। अगला दिन हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण था।

देहरादून का बर्न वॉर्ड

अगली सुबह हम जंगल मंगल जाने के लिए तैयार हो रहे थे कि डॉ योगी ऐरन के बेटे कुश ऐरन का फोन आया। वो हमें लेने के लिए गाड़ी भेज रहे थे। वो परेशान न हों इसलिए हमने पहले तो मना किया पर उनके बहुत आग्रह करने पर हम मान गए। थोड़ी ही देर में गाड़ी हमें लेने आ गयी। गाड़ी हमें सबसे पहले देहरादून एक सरकारी अस्पताल ले गयी, जहां उनके बेटे कुश ऐरन से हमारी मुलाकात हुई। बहुत ही गर्म जोशी से उन्होनें हमारा स्वागत किया। वैसे तो बर्न वॉर्ड काफी बदबूदार होते हैं पर इस अस्पताल का बर्न वॉर्ड बहुत साफ-सुथरा था। बर्न मरीजों का डॉ कुश कि निगरानी में विशेष ध्यान रखा जा रहा था।

डॉ योगी ऐरन

डॉ योगी से हमारी मुलाकात

अगला गंतव्य था जंगल मंगल। जैसे-जैसे मंजिल पास आ रही थी, हमारी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। जंगल मंगल पहली नजर में एक वीरान अम्यूजमेंट पार्क लगता है। चारों तरफ हरे-भरे पेड़ हैं। एक अजीब सा तालाब था, जिसमें बत्तख घूम रहे थे। टूटा-फूटा रास्ता था। हमारे आस-पास अधूरे बने हुए झूले पड़े हुए थे। पुराने कंस्ट्रक्शन और कुछ लोहे के जाले थे, जिनमें अभी काम होना बाकी था। देखने में यह ऐसी वीरान जगह लग रही थी मानों लोग सालों पहले इसे छोड़ के जा चुके हों। बीचो-बीच एक छोटा सा अस्पताल था। देखने में अस्पताल काफी जर्जर लग रहा था। वहीं हमारी मुलाकात डॉ योगी ऐरन से हुई। बहुत ही साधारण इंसान थे पर अभी हमारे पास जानने के लिए बहुत कुछ था। वह इतने विनम्र थे, हमें लगा ही नहीं कि हम उनसे पहली बार मिल रहे थे।

इस प्यारी सी बच्ची, जिसकी नाक नहीं थी। डॉ योगी इस बच्ची की नाक दोबारा से उगा रहे हैं, जो अभी माथे पर है। सर्जरी करके उसे सही जगह पर लगाया जाएगा।

वहां रह रहे लोग उनके मरीज कम और परिवार के सदस्य ज्यादा लग रहे थे। डॉ योगी से बातचीत करते हुए हमें काफी प्रेरणादायक बाते मालूम हुईं। उन्होनें हमें बताया कि कैसे उन्होनें अमेरिका में अपनी पढ़ाई पूरी की और भारत में आ कर मुफ्त इलाज करने की ठानी। जानकारी बहुत चौकाने वाली थी कि अब तक वो 5000 सर्जरी कर चुके हैं और 10,000 से ज्यादा सर्जरी अभी कतार में हैं। अस्पताल में उनके आस पास कई मरीज खड़े थे जिनकी उम्र डेढ़ साल से 35 वर्ष के बीच थी।

एक सर्जरी करने में 5-6 घंटे लगते हैं, तो आप ही सोचिए कि कितना समय लगा होगा 5000 सर्जरियां करने में। 1 सर्जरी के लिए लोग लाखों देने के लिए तैयार हैं, तो सोचिए 5000 सर्जरी के लिए उन्हें कितने पैसे मिल सकते थे। उनका काम यहीं तक सीमित नहीं है, वो साल में दो बार अमेरिका से आए विशेषज्ञों के साथ फ्री कैंप लगाते हैं। जिसमें आग से जले और जानवरों के हमलोें से पीड़ित गरीब वर्ग के लोगों का मुफ्त में इलाज करते हैं। इतना करने के बाद भी उन्हे लगता है कि उन्होंने कुछ नहीं किया। इतनी सरलता, इतनी विनम्रता मैंनें आजतक तो किसी में नहीं देखी।

जंगल-मंगल

गजब के क्रिएटिव हैं डॉ योगी

बात-चीत के दौरान वो बताते हैं कि जब वह भारत आए थे तो उनकी आंखो में एक सपना था ‘चिल्ड्रेन साइंस पार्क’ का। जिसके लिए उन्होनें जमीन भी खरीदी और उसे नाम दिया जंगल-मंगल। पैसों के अभाव के कारण वो सपना पूरा न हो सका। जो व्यक्ति लोगों के लिए 35 साल से संघर्ष कर रहे हों, वो इतनी जल्दी हार मानने वाले कहां थे। उन्होंने हमें अपने नए प्रोजेक्ट के बारे में बताया। टॉपैरी (TOPIARY) तकनीक से पेड़ों को लोगों के लिए उपयोगी बनाने वाला प्रोजेक्ट। उन्होंने बताया कि कैसे लोग पेड़ों के ऊपर, नीचे और आस-पास रह सकते हैं। कैसे लोगों के रहन-सहन को पेड़ों से जोड़ा जा सकता है। लोगों के हित के लिए वह अपनी एकड़ों की जमीन दान में देने के लिए तैयार है। वो कहते हैं कि मैं चाहता हूं मेरा प्रोजेक्ट का लाभ गरीब से गरीब तबके तक पहुंचे और अगर मेरे प्रोजेक्ट को कोई गोद लेना चाहे तो मैं अपनी जमीन दान कर दूंगा।

बातचीत के बाद वहां आस-पास हमें घूमने का मौका मिला। वहां रह रहे मरीज अबतक हमारे दोस्त बन चुके थे। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम उन लोगों से कुछ घंटे पहले ही मिले हैं। वहां हमें मिलीं उमा दी और उन्हीं पर हमें जंगल-मंगल दिखाने का जिम्मा आया। उमा दी का हाथ एक दुर्घटना में जल गया था। जिसके कारण उन्होंने बहुत तकलीफ झेली थी। पर वह बहुत जिंदादिल हैं। उन्हें यह विश्वास है कि वह भविष्य में जरूर कुछ बड़ा कर दिखाएंगी। उनका यह आत्मविश्वास शायद डॉ योगी की ही देन है। उनके प्यार, विश्वास के कारण उनके मरीज जिंदगी में आगे बढ़ने का हौसला रख पाए हैं।

ट्री बेंच

हम जैसे आगे बढ़ते गए, नई-नई चीजों से हमारा सामना होता गया। पेड़ों के बने घर, पेड़ों के ऊपर बने घर, खरगोश के घर, पेड़ो के साथ बनी बड़ी-बड़ी संरचनाएं। पेड़ों के तने से लेकर जड़ तक एक मोटा पाइप लगाया गया था, जिससे सूखी पत्तियां गिर कर खाद में बदल जाए। और भी बहुत कुछ था वहां। कई चीजों को बयान करने के लिए शब्द कम ही पड़ जाते हैं, उन्हें सिर्फ देख सकते हैं और महसूस कर सकते हैं। कम शब्दों में कहूं तो मैने भविष्य का एक ऐसा प्लान देखा था, जिससे बढ़ते हुए प्रदूषण को आसानी से हल किया जा सकता है। डॉ योगी के पास उसका फूल प्रूफ प्लान था। अब तक वो बरगद के 250 पौधे लगा चुके हैं। भविष्य में इनकी संख्या बढ़ सकती है। ऐसा रहा तो वह एक दिन अपना नाम गिनीज बुक ऑफ वल्ड रिकॉर्ड में दर्ज जरूर करवा लेंगे। पर अभी भी डॉ योगी ऐरन पैसों की कमी से जूझ रहे हैं।

सबसे मजेदार बात यह रही कि हमें भी मौका मिला एक ट्री हाउस में समय बिताने का। हम वहां घंटो तक बैठे रहे। हम सोचते रहे, जहां डॉक्टरी का पेशा एक व्यापार बनता जा रहा था वहीं डॉ योगी ऐरन हैं जो चाहते तो सर्जरी कर के लाखों पैसा कमा सकते थे, नाम होता, शोहरत होती, विदेशों में यात्रा करते, एक आरामदायक जीवन गुजारने के लिए सब कुछ होता। पर उन्होनें सभी सुख सुविधा को छोड़कर अपने जीवन को लोगों के लिए समर्पित कर दिया। यह शायद हमारा ही दुर्भाग्य है कि देहरादून के एक कोने में डॉ योगी ऐरन जैसे डॉक्टर गुमनामी और पैसों की कमी से दो चार हो रहे हैं।


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