बस्तर 10: सुकमा में स्कूल तो दिखे लेकिन किसी कंकाल की माफिक

(जीरम घाटी से गुजरते वक्त महसूस किए गए भाव पिछले लेख में दर्ज हैं, यहां पढ़ें)

जीरम घाटी का वो रास्ता मुझे बस्तर डिवीजन के सुकमा जिले में ले जा रहा था। जो मेरी यात्रा का आखिरी पड़ाव था। इससे पहले दिमाग ज्यादा उलझ जाए, मैं आपको सुकमा में बिताए अपने पिछले दिन और रात के अनुभवों को बता देना चाहती हूं।

सुकमा, छत्तीसगढ़ के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित जिला है। यह छत्तीसगढ़ के तीन जिले दंतेवाड़ा, बीजापुर, बस्तर, ओडिशा के मलकानगिरी, आंध्रप्रदेश के पूर्वा गोदावरी जिले और तेलंगाना के खम्मम जिले से घिरा हुआ है। ये जिला तीन विकासखंड कोंटा, सुकमा और छिंदगढ़ में बंटा हुआ है। यहां की 20 प्रतिशत आबादी छह साल और उससे छोटी हैफ इसलिए मैंने सोचा कि क्यों न प्राथमिक स्कूलों का ज्यादा से ज्यादा जायजा लिया जाए।

पोर्टा केबिन- आवसीय विद्यालय

हम कोंटा ब्लॉक के एक आवासीय बालक स्कूल में घुसे। ये एक पोर्टा केबिन था। बस्तर के गांवों में आकर मैंने पोर्टा केबिन के बारे में जाना था। यहां पर गांव बहुत दूर-दूर और दुरूह रास्तों पर होते हैं। इसलिए पोर्टेबल केबिन के रूप में स्कूल चलाने की कवायद शुरू हुई। हालांकि अब ये स्कूल बिल्डिंग में चल रहे हैं और किसी भी तरह से पोर्टेबल नहीं हैं।

इस पोर्टा केबिन में बच्चे अलग-अलग कक्षाओं में पढ़ रहे थे। मैं पांचवी कक्षा में घुस गई। भारत के राष्ट्रपति कौन हैं? जैसे सवालों से बातें शुरू करती हूं। एक बच्चा, जो क्लास का मॉनिटर भी था। सारे जवाब पटापट देता है। लेकिन बाकी के बच्चे बेसिक बातों से भी अनभिज्ञ हैं। बच्चों की कॉपी-किताबें देखीं तो पाया कि टीचर्स इन कॉपियों में किए गए कामों को नहीं जांचते, बस पढ़ाकर निकल जाते हैं।

भाषा है बड़ी समस्या

बच्चों के हॉस्टल में गए। टीनशेड में बच्चों के बिस्तर लगे हुये थे। ये देखकर हम निराश हा गये। इन सबके बारे में वहां के प्रिंसिपल से बात की। उनके मुताबिक, ‘इन बच्चों को पाठ्यक्रम पढ़ा पाना अपने आप में एक टेढ़ी खीर है। सबसे ज्यादा दिक्कत भाषा की है। अब अलग-अलग जनजातियों के बच्चे अपनी भाषाओं में बात करते हैं। इसलिए हमने एक तरकीब निकाली है कि हम पहले उन्हें हिंदी में बताते हैं। फिर उसी पाठ को हल्बी में दोहराते हैं, फिर गोंडी में और जरूरत पड़ने पर बाकी की भाषाओं में भी उसका ट्रांसलेशन करवाया जाता है।’

यहां जाति प्रमाण पत्र बनने में होने वाली दिक्कतों से बच्चों को सुविधाएं मिलने में देरी हो जाती है। दरअसल होता क्या है कि इन बच्चों के माता-पिता के पास जागरूकता की कमी की वजह से अपनी पहचान और जड़ें सिद्ध करने के लिए किसी भी तरह के डॉक्यूमेंट नहीं होते हैं। इसलिए बच्चों के प्रमाणपत्र अटक जाते हैं।

सुकमा में कुछ स्कूलों को देखने के बाद आगे बढ़ने पर गाड़ी पेदाकुर्ती नाम के एक गांव में पहुंचती है। यहां के प्राथमिक स्कूल का हाल तो बेहद खराब था। शौचालय नहीं थे, नन्हें बच्चे जंगल में शौच जाने को मजबूर थे। न पीने का साफ पानी और न ही समुचित खाने की व्यवस्था। ज्यादातर बच्चे मुरिया और दोरला जनजाति के थे। तीन शिक्षक थे जिनमें से कोई भी स्थानीय नहीं था। उनमें से किसी को जनजातीय भाषा नहीं आती थी। ऐसे में वे जनजातीय रहन-सहन के बच्चों को क्या ही शिक्षा दे रहे थे, समझ के परे है।

लड़कियों की सुरक्षा: चिंताजनक हालत

दौरा अगले गांव दुब्बाटोंटा में लगता है। यहां पर एक गर्ल्स हॉस्टल-स्कूल देखकर मैं रुक गई। मैं गेट से अंदर गई। मुझे देखकर अपने-अपने खेलों में मशरूफ कुछ बच्चियां मुझे घेरकर खड़ी हो गईं। उस वक्त वे चार से ज्यादा थे। स्कूल का टाइम खत्म हो गया था। मैं उन बच्चियों के साथ स्कूल के अंदर दाखिल हुई। अंदर मौजूद सारी बच्चियां एक-एक करके अपनी किताब लेकर लाइन से बैठ गईं।

तभी मैंने देखा एक अनजान युवक बेधड़क वहां घुसता है और हैंडपंप से पानी भरकर चला जाता है। मैं चिंतित हो उठती हूं और पूछती हूं कि ये ऐसे बिना अनुमति लिए कैसे अंदर आ सकता है। ये बच्चियों का हॉस्टल है। जवाब आता है, ऐसे ही कोई भी यहां घुस आता है। मेरी चिंता दोगुनी हो गई।

मैं बच्चियों के कमरे को देखने गई। सब बच्चियां मुझे घेरकर साथ-साथ चल देती हैं। मैं उनको बैड टच और गुड टच के बारे में समझाती हूं। वो जितने कौतूहल से मुझे सुन रही थीं। उससे समझ आ रहा था कि ये सब बातें उन्हें अब तक किसी ने नहीं बताईं। मैं उनमें दस मिनट में यकीन भर देना चाहती थीं कि डरना नहीं है, खुलकर बोलना है।

ऐसे असुरक्षित माहौल में पढ़ रहीं बच्चियों के लिए ठंडी आह भरकर बाहर निकल आती हूं। निकलते ही पता चलता है कि लड़कियों के लिए कोई बाथरूम भी नहीं है, वो खुले मैदान में नहाती हैं। अब मेरा गुस्सा चरम पर था लेकिन मेरी शिकायतों को सुनने के लिए वहां पर वार्डेन भी मौजूद नहीं थी। मैं अपनी डायरी में ये सब नोट करते हुए अगले गांव की तरफ चल देती हूं।

एकला चलो रे!

अब मैं चिकपाल गांव के नवीन कन्या आश्रम में जाती हूं। यहां पर भी वैसे ही हालात थे। एक बच्ची मेरे ही सामने बेहोश हो जाती है। उसे अस्पताल पहुंचाने के लिए स्कूल वालों के पास कोई भी साधन नहीं होता है। स्कूल की वार्डेन के साथ हम उसे नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र ले जाते हैं। जहां पर थोड़े वक्त बाद उसे होश आता है। डॉक्टर बताते हैं उसे फूड इंफेक्शन हो गया था।

मैं वार्डेन को बच्चियों का और ज्यादा ख्याल रखने को कहती हूं। वार्डेन के समर्थन में डॉक्टर बोलते हैं, ये मैडम बच्चियों का ख्याल रखने का पूरी कोशिश करती हैं। लेकिन आप ही सोचो कि अकेले ही वो खाना-पीना, स्वास्थ्य, अनुशासन सब कैसे मैनज कर सकती हैं? वो भी ऐसे इलाके में, जहां आधारभूत सुविधाओं के लिए भी इतना सिर पीटना पड़ता है। मैं कुछ-कुछ समझती हूं। पिछले दो घंटों में महसूस की गई अशक्ति, बेबसी, रोष ने मुझे पूरे ही बस्तर इलाके की जड़ता महसूस करा दी थी।

(बस्तर क्षेत्र की यात्रा जारी है, यहां पढ़ते रहें)


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