गंगा तेरा पानी अमृत बोलने से पहले वरुणा की मरती सांसें तो सुन लो

गंगा, लाखों लोगों की आस्था, करोड़ों लोगों का रोजगार, अरबों लोगों की जीवन रेखा। गंगा केवल एक नदी भर नहीं है, गंगा एक भावना है, गंगा एक जीवन सिद्धांत है। गंगा के किनारे धर्म-नीतियों पर चर्चाएं होती हैं, गंगा की आड़ लेकर राजनीति होती है। हजारों किलोमीटर का सफर तय करती गंगा अपने पूरे सफर में समाजशास्त्र के सारे तंत्रों को जीते हुए आती है। दुरुपयोग की पराकाष्ठा की अपनी टुच्ची आदत की वजह से हम सबने गंगा को बीमार, बहुत बीमार बना दिया है। धार्मिक और राजनीतिक वजहों से गंगा की सफाई को लेकर अचानक से हिलोरें उठती हैं, एक अंतराल के बाद ठंडी भी पड़ जाती हैं।

इस बार जब मैं बनारस गई तो अपनी गंदगी और अव्यवस्थाओं के कारण कुख्यात गंगा घाटों का हाल काफी सुधरा हुआ नजर आया। ध्यान रहे, केवल काफी सुधरा। पूरी तरह से साफ-सुथरा नहीं। घाटों पर बने मूत्रालयों से ओवरफ्लो होता अपशिष्ट सीधे गंगा पर जा रहा होता है और वहीं कोई श्रद्धालु गंगा मइया को अर्घ्य देकर उस जल से आचमन कर रहा होता है। फिर भी बदसूरत घाटों पर मैली गंगा की हालत बेहतर हुई है। यहां पर हमें रुकना होगा, ये शायद हमारी नजरों का धोखा है। बनारस में गंगा के सबसे पहले घाट आदिकेशव घाट पर जाकर ये शायद एक दुखद यकीन में बदल जाता है।

इतनी दुर्गंध पसरी है यहां कि अगले दो दिनों तक नाक अपना विवक खो देती है

गंगा यहां भी चौड़ में बह रही होती है लेकिन एक काला, गंदा, बदबूदार नाला उससे जाकर मिल जाता है। नाला, यही बताया था वहां खड़े दो स्थानीय युवकों ने। लेकिन मैंने तो पढ़ा था कि इस जगह पर वरुणा नदी और गंगा नदी का संगम होता है। आदिकेशव घाट को ढूंढते हुए जब यहां पहुंचे थे तो रास्ते में लोगों ने भी संगम का ही पता बताया था। मैंने जीमैप ऑन किया तो जिस जगह नाला बह रहा था, उसी जगह को मैप वरुणा नदी दिखा रहा था। हम चौंके, सदमा सा लगा जब पीछे खड़े एक मछुआरे ने बताया, अरे यहीं है बरुना (वरुणा)। मैं सकपका गई, अरे लेकिन ये तो नाला है, उन लड़कों ने बताया। मछुआरे ने स्पष्ट किया, हां दिखतीं तो अब नाले जैसे ही हैं। मछुआरे की बात में वरुणा के लिए कितनी आत्मीयता थी कि वो वरुणा को ऐसे संबोधित कर रहा था मानो वो उम्र से उनसे बुजुर्ग महिला हो।

दिल से एक आह से निकली, जिज्ञासा भी जाग उठी कि एक भरी-पूरी नदी का अस्तित्व इतना कैसे धुंधला गया है, कैसे उन दो स्थानीय युवाओं को इस नदी का नाम तक नहीं मालूम। यहां पर एक और जानकारी मैं चस्पा करना चाहूंगी, वाराणसी शब्द दो नदियों के नाम से बना है; वरुणा और असी। असी नदी तो हमें नजर तक नहीं आई और वरुणा की ये हालत कर दी गई। मुझे डर है कि पांच साल बाद जब मैं बनारस जाऊं तो वरुणा भी असी की तरह गायब मिले। मेरा ये डर, हम सबका डर बन जाना चाहिए, इसी में हम सबकी भलाई है।

मछुआरे की पुकार ने मेरे इस विचार क्रम को तोड़ दिया, वो हमें वरुणा और गंगा के संगम को करीब से दिखाने और उस पार के खेतों में घुमा लाने की बात कर रहा था। सूरज ढल रहा था। काली सी वरुणा और नीली-स्लेटी सी गंगा पर सूरज के बदलते रंगों का प्रतिबिंब बन रहा था। मछुआरा नाव खोल चुका था अपनी, मैं खोई सी उसमें जा बैठी। मेरी दोस्त वीडियो बनाने के लिए कैमरा संभालने लगी। मछुआरा बोलने लगा, ई वोहे बरुना हैं, खूब स्वस्थ हुआ करती थीं। हम लोग इहें में नहाते-धोते, कुल्ला करते थे। लेकिन अब तो पानी छू लें इनका तो खुजली होने लगता है।

यकीन मानिए, ये दिल्ली के किसी नाले की नहीं, बनारस की पूजनीया नदी वरुणा ही है

गंगा पर बना पुल, दूर घाटों पर बने प्राचीन मंदिर, पल्ली तरफ के चौड़े मैदान, पानी में निगाहें गड़ाकर बैठा गोताखोर सब नारंगी हो रहे थे, सब सूर्य के रंग में सराबोर होकर उसे विदा दे रहे थे। इतने में नाव उस पार आकर किनारे पर लग जाती है। मछुआरे से अब तक हमारा काफी परिचय हो जाता है। उनका नाम लच्छू साहनी है, एक दिन पहले खत्म हुए मेले में उन्होंने खूब सारे सामान खरीदे हैं, मोदी जी ने जो गंगा का शुद्धीकरण का काम शुरू किया है उसकी बड़ी तारीफ करते हैं। लेकिन साथ में ही कहते हैंं, बरुना का हाल एकदम नाला जैसा हो गया है। बनारस से कूड़ादान आ रहा है सफाई करके और सब यहीं बरुना में डाल दिया जा रहा है तो कहां साफ हो गई गंगा। सब कचड़ा वहीं गंगा में ही तो जा रहा है न।

लच्छू साहनी

लच्छू हमें शुक्रिया करते हैं कि हम वहां आ गए, बात को आगे तक ले जाएंगे वरना यहां बरुना की सुध लेने वाला कौन है। हमारी ये बातें सुनकर जमीन पर बैठे सुरती ठोंक रहे बजरंगी निषाद बोल उठते हैं, मीडिया वाले हैं क्या। हमारे हां में सिर हिलाने पर हमको पास बुलाकर थोड़े गुस्से के साथ बताते हैं। कूड़ा सब लाकर यहीं डाल देते हैं, हमारा मछली पकड़ने वाला एकदम महीन सा होता है, खराब हो जाता है। दो-तीन हजार का एक जाल आता, हमारा कितना नुकसान हो जाता है।

बजरंगी निषाद

बजरंगी की बातें खत्म होने का इंतजार कर रहे लच्छू बोलते हैं, आप लोग गंगा पार करके आए हैं तो थोड़ा यहां घूम लीजिए। मैंने एक सौ अस्सी डिग्री नजरें घुमाईं, तराई का दलदल बन चुका है, जिसमें प्लास्टिक के तमाम कचड़े हम पर हंस रहे थे, सड़ रही मछलियों की बदबू पूरे इलाके को अझेल बना रही थी, अधबने घरों से बच्चों की चिल्लाहटें हम तक साफ पहुंच रही थीं। 

हमने लच्छू जी से कहा, चलिए वापस चलते हैं। उन्होंने निर्भाव से नाव खोली और हमें बिठा लिया। नाव पर लगे मोटर की तेज आवाज के बीच रास्ते में हमसे बोले, गंगा मइया का पूजा करने का क्या फायदा, जब दूसरी तरफ से लोग उनको मार रहा है।


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