हमने जिन्हें सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया, उन्हें एक घर दे रहा है गुड समैरिटन्स इंडिया

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जॉर्ज बाबू राकेश, बाएं

न जाने कितनी बार ऐसा होता होगा कि हम अपनी गाड़ियों में जा रहे हों और रास्ते में कोई पागल या मानसिक, शारीरिक रूप से विक्षिप्त बूढ़ी महिला या पुरुष हमें सड़कों पर नजर आ जाए; उसे देखकर हमें दया बहुत आती है, उसे देखकर हमें लगता है कि काश उसकी किसी तरह मदद कर सकते, उसे देखकर हमें ख्याल आता है कि ये आखिर कितने दिनों का मेहमान है, उसे देखकर हम इस सोच में पड़ जाते हैं कि क्या इनका कोई परिवार वाला नहीं है, ये तमाम ख्यालात, ये तमाम सवालात हमारे दिमाग में आते हैं, थोड़ा सा गम मनाते हैं, थोड़ा सा तरस खाते हैं और इसी ऊहापोह में वहां से आगे बढ़ जाते हैं, कुछ कर नहीं पाते। ये वाक्य जानबूझकर ज्यादा लंबा किया गया है, ताकि हम सेकंड भर ही सही रुककर सोचें।

सड़क पर बेसुध पड़ा एक इंसान

घर-समाज से त्याग दिए गए ऐसे लोगों के लिए बहुत कुछ कर रहा है, तेलंगाना राज्य के सिकंदराबाद में एक संगठन ‘गुड समैरिटन्स इंडिया’। जॉर्ज बाबू ने गुड समैरिटिन्स इंडिया की शुरुआत 2008 में की थी। वो लोग, जिन्हें उनके अपनों नें दर-दर की ठोकर खाने के लिए छोड़ दिया है। वो बुजुर्ग जिन्होंने अपने बच्चों के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया, उन्हीं के बच्चों ने आज उन्हें सड़कों में मरने के लिए छोड़ दिया है। गुड समैरिटियन ऐसे लोगों को ही घर प्रदान करता है। आपको एक बार उनके सेंटर पर जाना चाहिए, कुछ और हो न हो, आप थोड़े और संवेदनशील जरूर बन जाएंगे।बातचीत के दौरान जॉर्ज हमें एक वाकया बताते हैं, उनके दोस्त गणेश का। गणेश एक पादरी थे। हर कोई उनके पास प्रार्थना करवाने के लिए आता था। गणेश ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे। दिलोजान से लोगों की सेवा करते थे। उन्होंने 60 अनाथ बच्चों को गोद भी ले रखा था। एक अंतराल के बाद वो बहुत बीमार रहने लगे। भयंकर पेट दर्द से परेशान। जांच में पता चला कि उनका लिवर खराब हो चुका है। मधुमेह तो उन्हें पहले से था ही। जीवन के आखिरी समय तक जॉर्ज उनके साथ बने रहे। उनका ज्यादातर समय अब गणेश की सेवा में जाने लगा। इससे उनके परिवारिक संबंधों में भी थोड़ी खटास लगने लगे।

गणेश की अब वो हालत नहीं थी कि बच्चों का ख्याल रख सकें। किसी तरह कोशिश कर के जॉर्ज ने सभी बच्चों में से 59 बच्चों को दूसरे अनाथालयों में दाखिल किया। एक बच्चा गणेश के साथ ही था। जिंदगी के आखिरी वक्त में गणेश के मकान मालिक ने उन्हें घर से निकाल दिया था, यह कह कर कि वो किसी बीमार इंसान को अपने घर में नहीं रखेंगे। जब तक जॉर्ज को ये बात पता चली, गणेश दुनिया से रुखसत हो चुके थे। हद तो तब हो गई जब किसी भी भी चर्च ने उस भले पादरी को दफनाने से मना कर दिया। गणेश की लाश लिए जॉर्ज मारे मारे फिर हर चर्च गए पर उन्हें जगह नहीं मिली। अंततः गांव पार एक अजनबी कब्रिस्तान में उन्हे दफनाया गया।

गुड समैरिटन के सेंटर पर एक जरूरतमंद बुजुर्ग

यही वक्त था जब जॉर्ज ये सोचने में विवश हो गए कि इतना पढ़-लिखने के बाद, पैसे होने के बाद भी वो एक आदमी को दफनाने के लिए जमीन तक नहीं दिला पाएं। क्या हर किसी को सम्मानित मौत पाने का अधिकार नहीं। उसके बाद वो कभी भी किसी बुजुर्ग को सड़क पर भटकता देखते तो अपने यहां ले आते और उसके मरने तक उसकी देखभाल करते। इस काम को करते हुए कई ऐसे लोग भी मिले जिन्हें उनके परिवार वालों ने खुद छोड़ दिया था। कई तो मानसिक रूप से बीमार थे। जिनका कोई नहीं था उन्हें जॉर्ज ने अपना नाम दिया। जिन लोगों का पता उनके परिवारवालों ने अपने राशन कार्ड से निकाल दिया था। उन लोगों को जॉर्ज ने अपना पता दिया।

एक बूढ़ी महिला को बिठाते जॉर्ज

जॉर्ज अब कोशिश कर रहे हैं कि कैसे इन लोगों को सामान्य लोगों और समाज के साथ दोबारा जीवन जी सके। किसी पर निर्भर न रह कर अपना खर्चा खुद उठा सकें। ताकि कोई उनसे न कहे कि तुम अब किसी काम के नहीं। तुम्हारी अब जरूरत नहीं। दस सालों में गुड समैरिटियन इंडिया के तीन ब्रांच बन गए हैं। जिसमें एक में इलाज होता है और दूसरी में उन्हे छोटे-मोटे स्किल्स सिखाए जाते हैं। गुड समैरिटियन ने आज तक 300 से ज्यादा लोगों के जीवन को बचाया है। कम से कम 150 लोगों को आम जिंदगी में वापस परिवार में भेजा है।

जॉर्ज ये सब किसी फेम पाने के लिए नहीं कर रहे। कर रहे हैं उस भावना के लिए जिसे इंसानियत कहते हैं। ये लोग उनके उतने ही अपने हैं जितना परिवार होता है। एक बेटे, एक भाई एक दोस्त सबक एक ही इंसान में मिला है इन लोगों को। जो कोशिश कर कर रहा है उनके लिए। जो सोचता है उनके लिए।

अब गुड समैरिटन ही इनका घर है और जॉर्ज इनका परिवार

अब अगर आपको कोई रास्ते में चलता हुआ दिखे जो मानसिक बुजुर्ग हो या मानसिक रूप से बीमार हो तो बस अफसोस न करें। उसे एक घर देने की सोचें, जहां उसे आगे जीवन जीने की राह मिले। कई लोग हैं जो इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं, आपको बस एक कदम बढ़ाना है। बाकी काम वो खुद कर लेंगे।


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