किसी ‘मर्द’ को साथ लिए बिना जब कश्मीर पहुंची ये लड़की

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आप ट्रिप प्लान करते हैं, टिकट बुक करते हैं, रहने की व्यवस्था ढूंढते हैं, बंदोबस्त करते हैं, तब जाकर कहीं घूमने निकलते हैं पर मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। ऐसे भी मुझे हमेशा लगता रहा है कि घूमना-ट्रैवेल करना मेरे बस की बात नहींं। और ऐसे भी हमारे घरों में, आसपास का माहौल ये कहता है कि लड़कियां तो ‘अच्छी जगह’ घूमने शादी के बाद हनीमून पर ही जा सकती हैं, पति के साथ। खैर, इस से पहले मैंने उत्तराखंड का लैंसडौन देखा था तो पर निकल आए मेरे। अच्छी रही थी वो पहली छोटी सी ट्रिप। इस बार अचानक ख्याल हो आया कश्मीर जाने का। हॉस्टल की एक दोस्त के साथ पढ़ाई के दौरान बातें हुईं थी कश्मीर के बारे में। बात खत्म हुई थी इसी बात पर कि कभी हो आएंगे जन्नत। नौकरी लगने के बाद।

घूमने के ख्याल से फोन घूमा दोस्त के पास। एक सप्ताह बाद निकलने की बात हुई। ‘प्लानिंग’ नहीं की। घर पर भी बोल दिया। घर से ऑब्जेक्शन आना ही था कि कश्मीर क्यों, सिर्फ लड़कियां! जैसा कि आम लोगों का कश्मीर को लेकर परसेप्शन है; आतंक, खतरा, पाकिस्तान। ऐसे में घरवालों का ऑब्जेक्शन लाजिमी है। उनको लेकिन जिद पता है मेरी। साथ ही उन्हें ये विश्वास भी है कि ये लड़की हैंडल कर ही लेगी सबकुछ, करने दो उसके मन की।

कश्मीर के बार में न किसी से पूछा, न उस एक सप्ताह के समय में एक भी बार गूगल किया कश्मीर के बारे में। छुट्टी ली, बैग पैक किया, पैसे रखे, एक दोस्त से पूछा जम्मू तक जाने वाली बस के बारे में और निकल गई दोस्त के साथ। दोस्त का दिमाग भी मेरे जैसा ही है इसलिये उसकी तरफ से भी किसी प्लानिंग की अपेक्षा नहीं की गई थी। लोग कहीं जाने से पहले गूगल सर्च करते हैं। फोन भी पोस्टपेड कराना था, ये वहां पहुंचकर पता चला।

दिल्ली से खुली बस सुबह पांच बजे जम्मू ले कर पहुंची। वहां से श्रीनगर के लिए शेयरिंग गाड़ी की गई। वहीं से ‘टूरिस्ट ट्रैपिंग’ की शिकार होने लगी मैं। जन्नत कहे जाने वाली जगह को लेकर मन में नेगेटिविटी आने लगी। गाड़ी वाले ने मुझसे दोगुने पैसे मांगे। वैसे इसमें आश्चर्य नहीं। हर टूरिस्ट स्पॉट पर आप आसान शिकार बन सकते हैं। लेकिन वहां एक पर शक कर के दूसरे के पास मदद की आस से जाने पर आपको रियायती दर पर ‘ठगा’ जाएगा। पहली नजर में इस चीज को लोगों ने पकड़ लिया कि ‘कोई मर्द नहीं है साथ में?’

खैर गाड़ी में तीन लड़के भी थे साथ में। जैसे-जैसे घाटी में सूरज ऊपर चढ़ रहा था, खूबसूरती बढ़ती जा रही थी और ठंड भी। खिड़की से धूप तीखी आंखों में लग रही थी। दोस्त ने मुझसे कहा, ‘यार कोई शॉल निकाल कर लगा दे खिड़की पर। आंखों में तेज धूप लग रही।’ आगे बैठे लड़के ने सुना और अपने गले में लिपटी सफेद शॉल बिना कुछ बोले पीछे पास कर दी। कश्मीर की सर्दी में एक नरम अहसास उस वक्त हुआ। फैसल नाम था उसका। वो ‘ग्रेटर कश्मीर’ का जर्नलिस्ट है।

दीवार पर स्प्रे पेंट से गुदा बुरहान का नाम

जम्मू से श्रीनगर जाने वाले रास्ते में आप कश्मीर की खूबसूरती देखने लग जाते हैं। जब अलग-अलग गांवों से होकर गाड़ी आगे बढ़ती है तो आपको चप्पे-चप्पे पर आर्मी जवान दिखने लग जाते हैं। उन्हें देखकर मुझे समझ नहीं आया कि मुझे इस जगह से डरना चाहिए या महफूज महसूस करना चाहिए। सड़क किनारे आधे बने, डैमेज्ड मकानों की छतों पर राइफल लिए चौकन्ने जवान। उन्हीं मकानों की दीवारों पर बुरहान वानी, जाकिर मूसा का नाम भी स्प्रे पेंट से लिखा हुआ दिखेगा आपको। इन सबके बीच बेफिक्री से गुजरतीं फिरन पहनीं औरतें, मर्द, स्कूल जाते बच्चे, भेड़ और सूखे चिनारों के बीच बने घर। सड़कों को पीती हरी चेनाब नदी भी दिखी। मैंने पहली बार दूर से बर्फ से ढके पहाड़ देखे और सोचने लगी कि अब मैं उसके बिल्कुल पास हूं।

गाड़ी में साथ बैठे लड़कों से बातचीत शुरू हुई और कश्मीर के डिबेट के साथ खत्म हुई। तल्खी के साथ घिसी-पिटी बातें ही हुई। तबतक हम श्रीनगर पहुंच चुके थे। ऑफ सीजन में मेरे जैसे नए टूरिस्ट निशाने पर थे। हाऊसबोट की लग्जरी दिखाकर काफी पैसे मांगे गए। मैं भी खूबसूरती देख भावनाओं में बह गई। लेकिन जब दो घन्टे इंतजार के बाद भी हाऊसबोट में न तो बिजली, न गर्म पानी मिला नहाने को तो पेशेंस जवाब दे गया। हाऊसबोट वाले भाईसाहब सिर्फ बातों में उलझाने में बिजी थे। उस समय फोन और इंटरनेट की जबरदस्त जरूरत महसूस हुई। थककर बैग उठाया और पहुंची लाल चौक। पहला होटल जो मिला उसी में ठहरना हुआ। व्यवस्था ठीक थी सिर्फ वाई-फाई नहीं था। लेकिन थकान इतनी थी कि हिम्मत नहीं पड़ी लगेज लेकर आगे और होटल ढूंढा जाए। पड़ाव वहीं डाला गया।

बालकनी में पहुंची। लालचौक कॉरपोरेट-बिजनेस हब है। है। लेकिन शाम 6 बजे के बाद दुकानों की शटर गिरने लगी। पता चला गर्मियों में ऐसा नहीं होता पर ठंड में शांति छा जाती है। पर फिर भी 6 बजे इतना सन्नाटा! कश्मीर का ‘शोर’ बहुत सुनते हैं हम सब। लेकिन वहां के सन्नाटे में बहुत शोर है। सर्दियों में वहां हरियाली नहीं होती। सूखे दरख्त होते हैं। ठंडा-शुष्क, रूखा सा मौसम। मुझे पहली शाम बहुत मनहूस सी लगी। लगा, यहां लोग मनी माइंडेड हैं। खाने से लेकर, होटल हर जगह लोगों को ज्यादा पैसे चाहिए। घरवालों से बात करने का मन हुआ पर फोन बिना नेटवर्क का डब्बा बना पड़ा था। लाल चौक पर भीड़ खत्म। आर्मी गश्त पर। सामने दीवार पर काले रंग से लिखा ‘इंडियंस गो बैक’। पूरी रात बाकी है। करने को कुछ भी नहीं। ऐसे में इंसान रोए ना तो क्या करे।

खामोश लाल चौक

एक मनहूस शाम बीतने के बाद श्रीनगर में अगली सुबह शानदार रही। लोकल मार्केट में शॉपिंग। ड्राई फ्रूट्स, कश्मीरी हैंडिक्राफ्टस, फिक्स रेट पर मिलने वाले फिरन। लाल चौक के नजदीक हनुमान मंदिर के पास फलों-सब्जियों की मंडी लगती है। रोड के उस तरफ यासीन मलिक सेपरेटिस्ट लीडर का रेसिडेंशियल इलाका है। सेंसिटिव माना जाता है। उस दिन अच्छे लोग मिले। कश्मीरी कल्चर से लबरेज। प्यार दिखाया। लिप्टन चाय पिलाई। कश्मीर का कहवा तो मशहूर है ही लेकिन इसके अलावा वहां लिप्टन चाय, नून चाय ज्यादा पीते हैं लोग। अगली बार घर पर आने और ठहरने का न्योता देने वाले लोग। और हां, हर्निफ बर्फी का टेस्ट बिल्कुल पेड़े की तरह होता है। कश्मीरी काजल आंखों के लिए अच्छी होती है!

खूबसूरत शिकारे

ये शाम सुंदर थी। आगे डल पीछे पहाड़, उसके ऊपर चमकता बर्फ। बीच में निशात गार्डन। झील के उस पार डूबता सूरज। हरियाली न होने के बावजूद इस नजारे में सम्मोहन था। जिसे भूल चुके थे वो भी याद हो आया, मुझे भी पता चला कि मैं उसे भूली नहीं हूं। शिकारे से डल की सैर। आह! वैसे पहले दिन हर जगह झटके खाने के बाद मैं संभल गयी थी। हर जगह बार्गेनिंग की। ‘टूरिस्ट ट्रैपिंग’ से बची। शिकारे वाले ने डल के बीच में जहां-जहां भी ‘अच्छा सामान’ लेने के लिए रोका, मैंने वहां से कुछ भी नहीं लिया। डल, चश्मा शाही, निशात गार्डन घूमने के बाद ऑटो वाले भइया बोलते हैं, मैडम अब लौट चलिए। मैंने पूछा, ‘अरे भइया लेकिन क्यों, शालीमार गार्डन तो घूमा ही नहीं।’

ठंड और खराब माहौल का तकादा देकर वो हमें वापस चलने को बोलने लगे। मुझे भी होटल के रिसेप्शन पर बैठने वाले अंकल की माहौल को लेकर दी गई चेतावनी याद आ गई। घूमने निकली लड़की बिना शालीमार घूमे जल्दी होटल लौट आई। जल्दी लौटने के बाद भी रिसेप्शन पर बैठे अंकल की भौंहें तनी हुई थी। उन्होंने घुड़ककर कहा, ‘यहां लड़कियां शाम साढ़े छः के बाद नहीं निकलतीं।’ माहौल-माहौल की चकचक से मैं ऊब गई थी फिर भी मैंने ससम्मान उनकी बात सुनी, घर पर फोन करने के लिए उनका मोबाइल फोन यूज किया और कमरे में चली आई, राहत मिली। पता चला रात में लाल चौक के सारे ‘सो काॅल्ड होटल’ में ताले लग जाते हैं। पहली बार सुना और देखा भी होटल में ताले लगते।

श्रीनगर घूमने के बाद, शॉपिंग करने के बाद अगले दिन गुलमर्ग जाना था। गुलमर्ग के बारे में सुना था कि ‘ये नहीं देखा तो कश्मीर क्या ही देखा!’ कोई आइडिया नहीं था कि पहुंचना कैसे है । फिर वही दिमागी फितूर कि निकलते वक्त ही पता करूंगी। पहले से आने-जाने का टेंशन नहीं लेने का। होटल में पता करने पर पता चला, दो-ढाई घंटे का वक्त लगेगा। मैंने सोचा गाड़ी बुक क्यों करना, यहां के लोकल की तरह ही जाऊंगी। बाद में पता चला कि लोकल खुद गाड़ी बुक कर के जाते हैं। चूंकि फोन-इंटरनेट कुछ भी नहीं था तो जुबानी बताए गए रूट के मुताबिक पहले ऑटो से पारिमपोरा पहुंची। रास्ते में पुलिस सायरन, चेकपोइंट्स, हथियार के साथ खड़े चौकन्ने आर्मी वाले सैकड़ों ट्रक, बस यही दिखा। वहां के ऑटो में भी कार की तरह दरवाजे होते हैं। पारिमपोरा से तंगमर्ग के लिए लोकल बस ली गई। तंगमर्ग से सूमो करना होता है गुलमर्ग जाने के लिए।

यहां से शुरू हुआ असली कश्मीर-दर्शन। गांवों में आर्मी की मौजूदगी घटती जा रही थी । गांव-गांव से होते हुए बस आगे बढ़ रही थी और अब आर्मी नहीं दिख रही थी। गांवों में ठंड ज्यादा थी। क्रिकेट को लेकर इतना प्यार! कुछ-कुछ किलोमीटर पर बच्चे क्रिकेट खेलते दिख रहे थे। एक और खास बात नोटिस की, वहां गांवों से गुजरते हुए जितनी भी ऐड होर्डिंग्स दिखीं, उनपर विराट कोहली और धोनी जैसे स्टार नहीं बल्कि बेहद स्थानीय क्रिकेट स्टार्स की तस्वीरें थी। यानी कई नए हीरो दिखे और पता चला कि वहां उन खिलाड़ियों को कैसे सम्मान देते हैं।

आर्मी नहीं दिख रही थी अब लेकिन इंटरनेट पर वायरल हुईं कई तस्वीरें, जिनमें आर्मी को ‘इंडियन डॉग्स गो बैक’ के साथ नवाजा गया था, मैंने उनमें से दो-चार जगहें देखीं। पहचाना कि ये तो मैं देख चुकी हूं। ‘UNREST KASHMIR’ से सम्बंधित लिखे गए कई आर्टिकल्स में इन्हीं तस्वीरों का इस्तेमाल किया जाता है। फिर तो दीवारों पर लिखे ऐसे स्लोगन्स गुलमर्ग तक मेरी आंखों के सामने से लगातार गुजरते रहे।

मुझे डर लगा। बस की उस भीड़ में मैंने खुद को ‘हिंदुस्तानी’ महसूस किया। उसके बाद जिस भी मकान के कांच मुझे टूटे हुए दिखे, मुझे सिर्फ पत्थरबाजी याद आई। उनके टूटने की असल वजह चाहे जो भी रही हो। कई गांव-बादीपोरा, हयातपोरा, कुंजर कई गांवों को मैंने पार किया। सवारियों को चढ़ते-उतरते देखा। बस की भीड़ में बिना हिजाब की बाहरी लड़की को सब घूर रहे थे। बस जहां-जहां रुकती, वहां भी लोगों की नजरें वैसे ही घूरतीं। बस काफी धीरे चल रही थी वहां। हरियाणा रोडवेज से टक्कर लेने में सौ साल लग जाए उन्हें।गुलमर्ग पहुंचने के बाद लगा कि तन-मन के लिए प्रकृति से ज्यादा हीलिंग कैपेसिटी किसी और के पास नहीं है। स्नोफॉल हो रहा था। इस से ज्यादा खूबसूरती शायद ही मेरी आंखों में समा पाए। नजरों की औकात बढ़ गई गुलमर्ग देख कर। सर्दियों में श्रीनगर थोड़ा रूखा-रूखा सा लगा था। वहां से 2 घन्टे लगे गुलमर्ग आने में। पहुंच कर लगा कि अगर यहां मर भी गयी न तो अफसोस नहीं रहेगा कि किसी ने आखिरी इच्छा क्यों नहीं पूछी। एक भैया स्लेज लिए पीछे-पीछे घूम रहे थे। पूछते हैं, मैडम कोई मर्द नहीं है साथ में? हमने बोला, नहीं।
वो बोले, चलो 200 रुपये देना, हम आपको स्लेज पर गुलमर्ग घुमाते हैं। हमने जवाब दिया, भैया हमें छोड़ दो हम खुद घूम लेंगे। अकेले घूमना था इसलिए अकेले ही आए हैं। स्लेज वाले ने पलटकर जवाब दिया, बहन! आप परेशान क्यों हो रहे हो। विश्वास करो, अच्छे से घुमाएंगे। ‘आपके’ हिंदुस्तान में परेशान करते होंगे लड़के, ‘हमारे’ कश्मीर में नहीं। मैंने ये सुनते ही रिएक्शन देखने के लिए बोला कि कश्मीर ऑफिशियली अभी भारत का हिस्सा है। ‘भारत माता की जय’ बोलते हैं यहां के जवान। वो स्लेज वाले भैया ‘पाकिस्तान माता की जय’. ‘फक ऑफ भारत माता’ बोलते हुए स्लेज पर फिसलते निकल गए। मुझे इसके बाद सिर्फ हंसी आती रही।

गुलमर्ग में आसपास के ग्रामीण ही काम करते हैं। जितने लोगों से बात की चाहे वो गाड़ी वाले हो, स्लेज वाले, बूट वाले सभी के लिए हम इंडियंस और वो ‘कश्मीरी’ और पाकिस्तान समर्थक। नहीं समर्थक भी नहीं, वो खुद को पाकिस्तानी ही मानते हैं। पढ़े-लिखे लोगों से बात करो तो लगेगा, वो सेना से आजादी और समान अधिकार चाहते हैं। लेकिन गांव के लोगों से या कम पढ़े-लिखे लोगों को इस देश का साथ बिल्कुल मंजूर नहीं। एक तरफ गश्त पर लगी आर्मी और दूसरी तरफ ये सब देख-सुनकर मन फीका सा हो गया।

सूरज ढलने से पहले वापस श्रीनगर आना था। उसी शेयरिंग सूमो से वापस जाना था जिससे आये थे। सूमो ड्राइवर हमारे पीछे लगे थे क्योंकि उनको डर था कि हम किसी और गाड़ी से वापस ना जाएं वरना उनकी कमाई पर असर पड़ेगा। इसके बाद का एक्सपीरियंस बेहद बुरा रहा, डरावना सा। हुआ यूं कि गुलमर्ग से तंगमर्ग आने के बाद श्रीनगर के लिए गाड़ी करनी थी। पर 6:30 बजे हम तंगमर्ग पहुंचे। ड्राइवर ने कहा अब वापसी मुश्किल है क्योंकि बस नहीं चलती शाम के बाद। मुझे रेंट पर लिए बूट और ओवरकोट वापस करने थे और अपने शूज और बाकी चीजें वापस लेनी थी।

तंगमर्ग पूरा अंधेरे में डूबा था। गांवों में बिजली की समस्या गहरी है। श्रीनगर कैपिटल होने के बावजूद बिजली समस्या से ग्रस्त है। स्नोफॉल चालू था जो दिन में मन को लुभा रहा था, उस वक्त डरावना लग रहा था। डर लगा कि अनजान जगह फंस गई हूं, जहां के लोगों की सोच भी मिलती-जुलती नहीं है। ड्राइवर ने इस चीज को भांपते हुए अपनी कमाई का बंदोबस्त किया। ट्रिपल पैसे मांगे और गाड़ी बुक कर श्रीनगर चलने के लिए कहा। उस समय मुझे खुद पर जरूरत से ज्यादा बहादुर बनने पर बेहद गुस्सा आया। अफसोस हुआ कि गाड़ी बुक कर के आनी चाहिए थी, लोकल की तरह सफर नहीं करनी चाहिए थी। सन्नाटे वाला अंधेरा बेहद डरावना लग रहा था। तंगमर्ग और आसपास के इलाके में आतंकी गतिविधियां- एनकाउंटर होते हैं।

ड्राइवर जरा ठीक नहीं मालूम हुआ। वो हमें अकेला भी नहीं छोड़ रहा था। हमारी हर एक्टिविटी पर नजर थी उसकी कि हम वापस उसके बिना कैसे जा सकते हैं। पर थोड़ा बोल्ड होकर उसको बोला कि भइया आप जाओ, हमारे दोस्त अपनी गाड़ी लेकर आ रहे हैं। बिना नेटवर्क वाला फोन निकालकर उसके सामने एक्टिंग कर ली कि सच में कोई आ रहा हो पर हलक जो सूख रही थी अंदर ही अंदर। वो समय मैं कभी नहीं भूल सकती। पर अच्छे और बुरे लोग तो हर जगह होते हैं। कश्मीर अलग थोड़े न है।

ड्राइवर से थोड़ा अलग होकर एक जगह से रोशनी आ रही थी, वहां पहुंची। मार्केट था वो। दो-चार दुकानें खुली थी। एक बेकरी शॉप पर पहुंच कर बुझे मन से मदद मांगी। पूरी बात बताई और कहा कि आप बस गाड़ी बता दो, कहां से मिलेगी। हम पैसे दे देंगे उसे ज्यादा पर उस ड्राइवर के साथ नहीं जाएंगे। शॉप ओनर बोला, आप टेंशन मत लो थोड़ा इंतजार करो, गाड़ी बुलवा देते हैं।

इंतजार करते-करते बातचीत हुई। उसे क्रिकेट बहुत पसंद था। पाकिस्तान की टीम फेवरेट है। ये सुनकर मैंने खुद को मन ही मन समझाया, मुझे इसमें भारत-पाकिस्तान घुसेड़ने की जरूरत नहीं। इस बात को मैंने लड़के की खेल भावना से जोड़कर देखने की सलाह खुद को दी। लड़के की असल भावना लड़का ही जाने! उसने अपनी बेकरी शॉप की मशहूर कुकीज खिलाई। फिर अपने स्टाफ को कश्मीरी में कुछ बोल उनके हवाले कर कहीं चला गया। साढ़े आठ बज चुके थे।

सिचुएशन ऐसी थी कि मुझे डर की वजह से इनपर भी शक होने लगा। पर कोई और चारा नहीं था इनपर विश्वास करने के अलावा। जो होगा देखा जाएगा। दस मिनट बाद शॉप पर एक लड़का आता है, साथ चलने को कहता है। जो होगा देखा जाएगा, ऐसा सोचकर चल देती हूं उसके साथ। थोड़ी दूर पर अंधेरे में कार खड़ी थी। अंदर बैठी तो शॉप ओनर खुद था और शॉप के अंदर दिखने वाला एक और शख्स। ओमर और इश्तिफाक। आगे मुसीबत में ना पडूं, उन्होंने एक सिम कार्ड मेरे फोन में लगा दिया।

गाड़ी चल पड़ी। स्नोफॉल चालू था। पता नहीं रात में कश्मीर घूमना और किस टूरिस्ट को नसीब हुआ हो! उस बुरे ड्राइवर से पीछा छूट चुका था। डर सबको लगता है, गला सबका सूखता है। लड़की के साथ मर्द ना हो तो मुसीबतें खड़ी कर दी जाती हैं। 

गाने, स्नोफॉल, बर्फीले-सुनसान रास्ते, आर्मी चेकपोइंट्स, रात, कश्मीर, बेकरी की मिठास, ओमर और इश्तिफाक। ओमर और इश्तिफाक ने हमें श्रीनगर पहुंचाया। अगले दिन दोबारा मुझे और दोस्त को हयातपोरा अपने घर-गांव आने के लिए कहा और 11 बजे रात को वापस लौट गए। उनकी वजह से मेरे पास नम्बर आ चुका था। फोन चालू हो गया। कश्मीर से पहला स्टेटस पढ़ वहां के कई दोस्तों ने घर आने को कहा।

अगले दिन साकिब ने बचा रह गया श्रीनगर घुमाया। फोटो ‘उठाए’। हां, वहां फोटो खींचते नहीं ‘उठाते’ हैं। आपको यहां बता दूं कि साकिब मजीद कश्मीर का मशहूर फोटोग्राफर है। उसकी खींची हुई एक तस्वीर विस्डेन-एमसीसी फोटो ऑफ दी ईयर का अवॉर्ड जीत चुकी है। साकिब ने हमसे कहा, ‘कोई मसला नहीं है, कोई परेशानी नहीं है। मामा (मां) ने सब्जी पकाई है। आप जाया मत करने दो। घर चलो।’ उसके साथ उसके घर पहुंची। खूबसूरत कालीन-दरी वाला घर। जाते ही उसकी अम्मी ने बिठाते हुए पैरों के बीच कांगड़ी रखी और कंबल चारों ओर लपेटा। केसर वाला कहवा, कश्मीरी ड्राइफ्रूट्स घर पर बने ढेर सारे पकवान सब सामने पेश था। फिर पूरी फैमिली के साथ गप्पें। इश्तिफाक के बुलाने पर भी मैं और दोस्त नहीं जा सके। वो खुद काम खत्म कर रात करीब नौ बजे हमसे मिलने आएं

साकिब की खींची एक फोटो

रात में हम डल झील के बीच नाव से हाऊसबोट पर गए। चारों तरफ पहाड़। अंधेरा, ठंड। साफ आसमान में चमकते तारे और बीच में रोशनी से जगमगाते हाऊसबोट। उस वक्त कश्मीर के ‘माहौल’ का खौफ नहीं था।
डल के हाऊसबोट काफी लग्जरियस होते हैं। कश्मीर को ऐसे ना देख पाती अगर ये प्यारे लोग न मिले होते तो। प्यार, इश्क, दोस्ती, खौफ, खूबसूरती। ओमर, इश्तिफाक, हिलाल, मोसैब, साकिब, फैजान। अफसोस किसी कश्मीरी लड़की से बात नहीं हो पाई। इस बार खूबसूरत कश्मीर देखने गयी थी। अगली बार ‘कश्मीर के विवादित हिस्से’, साउथ कश्मीर, त्राल, शोपियां देखने की इच्छा है। कसम से, इस एक्सपीरियंस से डर निकल चुका है। उम्मीद करती हूं कि ये क्षणिक जोश न हो। अंतिम दिन शाम तक लाल चौक की बेंच पर अकेले बैठ यही सोचती रही। नेकदिल साकिब ने एयर टिकट करवा दी थी। आसमान से ज्यादा खूबसूरत ये जमीनी जन्नत लगता है।


क से कश्मीर की अपनी इस यात्रा के बारे में हमें लिख भेजा है कौशिकी कश्यप ने। कौशिकी पत्रकार हैं। बिजली सरीखी आंखों की स्वामिनी हैं। अपनी इन्हीं नजरों से तमाम मुद्दों पर अपना बेबाक नजरिया रखती हैं। खुद से बेहद प्यार है, अपने उसूलों पर अभिमान है, कविताओं से दिल्लगी है। दिल खोलकर नाचती है, दिल और दिमाग दोनों खोलकर लोगों से खूब सारा बतियाती हैं।


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