हजारीबाग का वो सफर जिसमें दिल कह उठा शुक्रिया जिंदगी, शुक्रिया दोस्तों!

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यूपी-बिहार की पैसेंजर ट्रेनों में एक साथ कई मोर्चे पर युद्ध करना होता है। पटना में गया वाली ट्रेन जैसे ही रुकी, मुझे आपातकालीन खिड़की के पास सीट खाली दिखाई दी। मैंने कंधे से बैग उतार कर ऊपर की रेक में घुसाया और बैठने के लिए झुका तो पाया कि एक पल पहले जो सीट खाली थी उस पर एक महाशय बैठे हुए हैं। सहसा यकीन नहीं हुआ। मुझे लगा कि गलती से मैंने भाई साहब को न देखा हो। फकत आंखों को यकीन दिलाने के लिए मैंने उनसे पूछा, भाई साहब! आप एकदम अचानक से सीट पर कैसे प्रकट हो गए?

भाई साहब ने विश्व विजेता मुस्कान के साथ आपातकालीन खिड़की की ओर इशारा करते हुए कहा – ‘हम अक्सर ट्रेन में इसी खिड़की की तरफ़ से ही घुसते हैं’।  मैंने आपातकालीन खिड़की का इससे बेहतर इस्तेमाल पहले नहीं देखा था। मन ही मन भाई साहब के टैलेंट को नमन किया और सामने की सीट पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद यात्रियों की भीड़ और सीटों की उपलब्धता में सामंजस्य स्थापित होने के बाद ट्रेन ने सरकना शुरू किया। आखिरकार लगभग तीन घंटे बाद सहयात्रियों के कन्धों के अनचाहे दबाव और कानों पर गिरतीं सांस्कृतिक लाठियों से लड़ते-झगड़ते उतरने का समय आया।

गया स्टेशन से बाहर आकर हम हजारीबाग जाने के लिए बस स्टेशन पर पहुंचे। गया का बस स्टेशन मेरे द्वारा देखे गए अब तक के ऐतिहासिक इमारतों में अद्वितीय है। लगभग मर चुके पीले रंग की पियरी में कराहते इस भवन को देख कर लगता है कि अंग्रेजों ने इसे जैसे ही रंगवाना शुरू किया होगा वैसे ही उन्हें भारत छोड़ना पड़ा। अपनी दीवारों पर जगह-जगह उग आए पीपल के पौधों को धारण किए यह भवन अपने सरकारी होने के भार को ज़्यादा दिन सहन नहीं कर पाएगा।

यहां टिकट, काउंटर पर नहीं पेड़ पर मिलते हैं

खैर! हमने एक कंडक्टर जैसी वेशभूषा वाले सज्जन से पूछा कि सर हजारीबाग के लिए बस कब है?
उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा – वो सामने दुनिया भर की बसें तो खड़ी हैं। मैंने कहा, नहीं सर! सरकारी बस कब है? उन्होंने बताया कि सरकारी बस एक ही है सुबह चली गई। जाना है तो प्राइवेट बस से ही जाइए।
मैंने सरकारी और निजी क्षेत्र के इस अद्भुत सामंजस्य को भी नमन किया। और अब हम उस बस के आसपास चक्कर काटने लगे,जिसे दुल्हन की तरह सजाया गया था और उसके माथे पर मोटे-मोटे अक्षरों से लिखा था ‘गया-हजारीबाग सुपरफास्ट एक्सप्रेस मेल’। तभी बगल में खड़े आचार्य जी ने खुफिया खबर सुनाई कि इस बस का टिकट उस पेड़ की आड़ में मिल रहा है। रुकिए मैं लेकर आता हूं।

मेरे लिए यह नई बात थी। हमारे यहां आप बस की खाली सीट पर बैठ जाइए समयानुसार कंडक्टर आपके पास आकर खुद टिकट दे जाएगा। लेकिन गया में आधी सीटें फोन पर बुक होतीं हैं और बची-खुची बहुत गंभीर सिफारिशों पर। थोड़ी देर बाद आचार्य जी ने आकर बताया कि सारी सीटें बुक हो गई है खड़े होकर जाने की भी सुविधा नहीं है।  हालांकि हम थोड़े परेशान तो हुए कि अगर समय से बस नहीं मिली हजारीबाग पहुंचने में रात हो जाएगी और कोई होटल भी नहीं मिलेगा। लेकिन फिर भी मैंने आचार्य जी से कहा कि अच्छा आप परेशान न होइए कोई उपाय बनेगा अभी।

और मैं ढूंढते-ढूंढते उस बस के ड्राइवर साहब के पास पहुंचा और कहा कि – ड्राइवर साहब! सीट दिलवाइए हम भी स्टाफ ही हैं। ड्राइवर साहब ने एक नज़र ऊपर से नीचे तक मुझे देखा। इधर लगातार यात्रा के युद्धों से हम ड्राइवर-कंडक्टर से भी ज्यादा हसीन दिख रहे थे। अचानक ड्राइवर साहब ने कहा, देखिए! ‘साजन’ तो भर गई है ‘पायल’ दो घंटे बाद है उसी से आ जाइए। मैंने थकी हुई बसों की भीड़ में देखा एक बस के पीछे मटमैले लेकिन स्टाइलिश अक्षरों में लिखा था ‘साजन’ और दूसरी बस जिस पर ‘पायल’ लिखा था वो अभी एकदम जाने के मूड में नहीं दिख रही थी। लेकिन मेरे एक दो बार और कहने पर उन्होंने मुझे ‘साजन’ के केबिन में ही जगह दी।

गया से हज़ारीबाग का रास्ता ऊंच-नीचा है। बस के शीशे पर छाई ग़र्द के बीच पहाड़ों की झलक देखना अच्छा लगता था। लगभग हर पहाड़ी पर सबसे ऊपर मंदिर और मंदिर के लिए जाते हुए नागिन की तरह टेढ़े-मेढ़े रास्ते। जंगलों से लकड़ी काट कर ला रही औरतों की एकाध कतारें,उनकी कमर से चिपके दुधमुंहे बच्चे, और उनके सिर पर लकड़ी के बोझ का वज़न। मानों प्रकृति ने स्त्री को कुछ अधिक वज़न ढोने के लिए अभिशप्त कर दिया हो। धीरे-धीरे शाम का अंधेरा छाता जा रहा था और अंधेरे में हज़ारीबाग हमारे नज़दीक आता जा रहा था।

पंडित जी के ने तो बस कर ही दिया था धर्म भ्रष्ट

जब हम हज़ारीबाग बस स्टेशन पर उतरे तो शाम के सात बज रहे थे। शहर अंधकार से लड़ने के लिए रोड लाइट्स लगा कर तैयार था और इधर हमने रात भर रुकने के लिए होटल ढूंढना शुरू किया। लगभग दस होटल्स के चक्कर काट लेने के बाद पता चला कि हमने तो बहुत देर कर दी। लोगों ने सुबह से ही कमरे बुक करा लिए हैं। कुछ होटल वालों ने हाॅल में गद्दे बिछा रखे थे और एक तकिए के साथ एक कंबल का किराया चार सौ रुपए। हमने कुछ जगहों पर इस अवसर का भी लाभ उठाना चाहा लेकिन हमारे पहुँचते-पहुँचते वहाँ भी रिक्त स्थान की पूर्ति हो चुकी थी।

हम लोगों से होटल्स का पता पूछते, लोग भी इतने सज्जन थे कि कई सारे होटल्स का एड्रेस बताते-समझाते। कुछ लोग तो थोड़ी दूर तक साथ भी आए और खुद ही हम लोगों के लिए निवेदन किया। लेकिन उनकी भी मज़बूरी थी। एक ही दिन हज़ारों अभ्यर्थियों के आ जाने से कोई भी शहर व्यवस्थित नहीं रह सकता।
लगभग ढाई घंटे इस कोने से उस कोने घूमने के बाद जब पैरों ने शरीर को लगभग जवाब देते हुए कहा कि – तुमको और चलना हो तो चल लो, अब चलना हमारे बस की बात नहीं है। तब तय हुआ कि पहले खाना खाया जाए। हम फिर बस स्टेशन आए और कुछ खाने-पीने के लिए नज़र दौड़ाई। हर दुकान के बोर्ड पर तली हुई मछलियों के मसालेदार चित्रों को देखते-देखते इतना तो पता चल ही गया कि आज की रात भोजन भी नहीं मिलने वाला।

लेकिन तभी एक लिंक रोड पर थोड़े से उजाले में एक बोर्ड दिखा – ‘मिश्रा जी शुद्ध भोजनालय’। यह बोर्ड देखकर हमें उतनी ही खुशी हुई जितनी खुशी किसी डॉक्टर को मरीज़ देखकर होती है या किसी ट्रैफ़िक पुलिस को बिना हैलमेट लगाए व्यक्ति को देखकर होती है। हम जल्दी से उस शुद्ध भोजनालय के पास पहुँचे और शुद्ध भाव से ही पूछा, पंडी जी! भोजन में क्या-क्या है? पंडित जी ने बताया कि – ‘सब कुछ’ है।
‘सब कुछ’ शब्द पर शायद आचार्य जी को संदेह हो गया उन्होंने पूछा कि नाॅनवेज भी है? पंडी जी ने धीरे से कहा कि – हां वो भी है…। एक आखिरी उम्मीद के दिए को भी बुझता देखकर मैंने आचार्य जी से कहा, चलिए सेव खरीद लेते हैं। आचार्य जी ने गर्वोन्नत होकर कहा, नहीं! अभी घर से लाया हुआ भोजन रखा हुआ है बैग में। अब तो रहा नहीं गया मुझसे और फट ही पड़ा – तो अब तक चुप क्यों थे देवता? आचार्य जी ने कहा कि – वो हम ‘इमर्जेंसी’ के लिए रखे थे न! मैंनें खीझ कर कहा – गुरुदेव! अब इसके बाद जो इमर्जेंसी होगी उसमें तुलसी दल और गंगा जल की जरूरत होती है भोजन की नहीं।

लोगों की कथनी और करनी में होता है बहुत फर्क

पानी की दो बोतलें खरीद लेने के बाद भोजन ग्रहण करने के लिए जगह का चुनाव भी बड़ी समस्या थी। परीक्षार्थियों की भारी भीड़ के कारण कहीं पैर रखने की भी जगह नहीं थी। अचानक मैंने देखा कि बस स्टेशन के बाएं कोने पर एक गैरेज़ रूपी बारामदे में दो अभ्यर्थी अखण्ड सहचर भाव से लिपट कर सोए हुए हैं और उनसे थोड़ी दूरी बना कर एक भिक्षुक महाराज दीन-दुनिया से बेख़बर प्लास्टिक की बोरियों पर चैन की नींद ले रहे हैं। मैंने आचार्य जी से कहा, बैग से चादर निकाल कर बिछाइए यहां। इस तरह हमारे एक साइड में एकाकार हुए विद्यार्थी युगल थे और दूसरी तरफ़ भूत, भविष्य और वर्तमान की चिंता से मुक्त भिक्षुक महाराज।

पहला कौर मुंह में डालते हुए आचार्य जी ने फीकी हंसी हंसते हुए कहा, आज हमारे यह दिन आ गए कि हमें भिखारी के साथ सोना पड़ रहा है! मैंने कुछ कहा तो नहीं। लेकिन मन में जरूर सोचा कि – हम हिंदी वाले लोग कितने कुटिल और छली होते हैं। भिखारियों की दीन-हीन दशा और उनकी फटी बिवाइयों वाले पैर पर कविता-कहानी लिखकर ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी ले लेंगे लेकिन एक रात मजबूरी में अपने ही पात्रों के साथ सोना पड़ जाए तो..। मुझे नागार्जुन की एक और बात याद आई। उन्होंने एक बार अपने बड़े पुत्र शोभाकांत को समझाते हुए कहा था कि “कभी भी अपनी तुलना ऊपरी वर्ग से मत करो। नीचे देखो तब समझ में आएगा कि जीवन क्या है! तुम्हें तो किसी तरह दोनों समय रूखा-सूखा खाना मिल जाता है, अपने आसपास देखो कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें दो – दो दिन तक अन्न देखने तक को नहीं मिलता”।

अमित भईया का आभार

खैर आचार्य जी उधर चादर तान कर सोए और इधर हमने आखिरी कोशिश करते हुए हज़ारीबाग के ही फेसबुक मित्र भाई अमित सिंह जी से कहा कि भैया अपने किसी दोस्त से पूछिए कि शहर से इधर-उधर कोई होटल मिल सकता है क्या? अमित भाई जैसे चौंक पड़े, मेरे शहर में होकर आप होटल में रुकेंगे? मेरे घर जाइए। मैं मम्मी को बता रहा हूँ कि आप वहीं हैं…। मैंने कहना चाहा कि भैया! अभी आप बैंगलोर में हैं न! घर फिर कभी आ जाऊंगा अभी के लिए होटल ही ठीक है। लेकिन उधर से अमित भैया ने कहा कि – अरे माँ तो है न! आप चलिए मैं होल्ड पर ही हूं। मैंने आचार्य प्रवर को जगाया, गुरुदेव चलिए! अमित भैया के घर चलना है।

गुरुदेव अब तक उस परिस्थिति में लेटे-लेटे सांसारिक विषय-वासनाओं से ऊपर उठ चुके थे। उन्होंने चलने की तैयारी की। जूते पहने, चादर बैग में रख ही रहे थे कि थोड़ी दूर पर खड़े दो लड़कों ने कहा, धन्यवाद भैया। मैंने कहा, आप लोग क्यों धन्यवाद दे रहे हैं भाई? दोनों भाइयों ने खुशी से बताया, आप लोग जा रहे हैं न तो इस जगह पर अब हम सोएंगे। मैं हतप्रभ रह गया। जिस जगह पर सोने में हमें अपनी बेइज्जती लग रही थी वो जगह हम ही जैसे लड़कों के लिए इतनी उपयोगी है कि उन्होंने धन्यवाद दिया! अद्भुत है प्रकृति भी हम थाली में जो रोटियां फेंक देते हैं उनसे भी हमारे जैसे ही पेट भरते होंगे यह सोचने की फुरसत कहां है इस फोर जी टाईम में?

दस मिनट बाद ही हम अमित भैया के बेहद खूबसूरत घर के सामने खड़े थे वहां उनके मम्मी-पापा दोनों खड़े मिले। जैसे ही अंकल जी को पता चला कि हम टीचिंग की परीक्षा देने आए हैं वैसे ही उन्होंने अपने जीवन के शैक्षिक उतार चढ़ावों से हमें लैस करना शुरू कर दिया उधर इन सब बातों से एकदम अलग आंटी को बस एक बात की चिंता कि क्या खाओगे? सुबह से कुछ खाया कि नहीं? चाय पियोगे? ठंड तो नहीं लगी न?
हज़ारीबाग की सुबह बलिया की तरह एक ही बार नहीं होती। वहाँ सूरज पहले पहाड़ और बड़े – बड़े पेड़ों से लड़ता है। पहले गर्मी छाती है चिड़ियों की आवाज़ें थक जाती हैं तब सूरज सिर पर चढ़ आता है कि लो आ गए न!

बलिया की हो या अफ्रीका की, मां मां ही होती है

गरम कंबल की गरमी और पिछली रात की थकान ने शायद परीक्षा और परीक्षार्थी के बीच एक मूक समझौता करा दिया था। लेकिन तभी आंटी ने आवाज दी, पानी गरम हो गया है बेटा नहा लो। हम नहा धोकर तैयार हुए तब तक आंटी ने सत्तू की पूरियां सब्जी और दही नाश्ते की मेज पर रख दिया और कहा कि जल्दी से नाश्ता कर लो। हालांकि सुबह सात बजे नाश्ते की आदत कभी नहीं रही इसलिए मैंने कहा भी – अरे आंटी इसकी एकदम जरूरत नहीं थी। मेरी बात काटते हुए चश्मे के पीछे से आंखें दिखाते हुए कहा उन्होंने – जरूरत कैसे नहीं थी परीक्षा में बैठना है। आंटी ने कहा, “बेटा! अब यह मत सोचना कि चार तरह की सब्जियाँ क्यों नहीं मिलीं, तुम लोगों को भी तो सोचना होगा न कि मां अब बूढ़ी हो गई है”।

पता नहीं इस एक वाक्य में क्या था कि मुझे खाने की थाली धुंधली दिखने लगी। आचार्य जी भी भावुक हो गए।
मुझे याद आया कि ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में ‘दिनकर’ ने भारत की सांस्कृतिक विभिन्नता का वर्णन करते हुए कहा है कि-” कोस कोस पर बदले पानी,चार कोस पर बानी”। मतलब यहां हर एक कोस पर पानी का स्वाद बदल जाता है और हर चार कोस पर बोली बदल जाती है। लेकिन पूरी दुनिया में अगर कोई चीज कभी नहीं बदलती तो मां मातृत्व और ममता। मां चाहे बलिया की हो या गोरखपुर की हज़ारीबाग की हो या अफ्रीका की उसके आवाज में भिन्नता हो सकती है लेकिन मातृत्व में नहीं।

परीक्षा भी संपन्न हो गई। पेपर बहुत अच्छा होने की खुशी ने पिछले दिन के तनाव को दूर करने में काफ़ी मदद की। अब हमारी ट्रेन रात के साढ़े दस बजे हज़ारीबाग रोड रेलवे स्टेशन से थी। मेरा अनुमान था कि रेलवे स्टेशन पास में ही होगा। लेकिन बस स्टेशन पर आकर पता चला कि हज़ारीबाग से हज़ारीबाग रोड रेलवे स्टेशन की दूरी इतनी ज्यादा है कि बस से तीन घंटे लगेंगे। रेलवे स्टेशन पर आकर जैसे जान में जान आई। लगा कि अब हमारी समस्याओं का अंत हो गया। अब तो बस ट्रेन में बैठना है और सुबह पाँच बजे बनारस उतर जाना है। लेकिन हमें क्या पता था कि हज़ारीबाग को हमसे मुहब्बत हो चुकी थी। स्टेशन के प्रतीक्षालय में जब हमने इंतज़ार की लगभग आधी सजा काट ली तो अचानक अनाउंस हुआ कि “धनबाद के रास्ते हजारीबाग गया सासाराम डेहरी आन सोन होते हुए वाराणसी को जाने वाली गंगा – सतलुज एक्सप्रेस आठ घंटे की देरी से आएगी, आपकी असुविधा के लिए हमें खेद है”।

फौजी भाई की वो बात जो सब भारतीयों के लिए थी

दस बजे की ट्रेन सुबह सात बजे आएगी। यह सोच कर ही जैसे धड़कनें ठहर गईं। इसका मतलब यह कि आज की रात हज़ारीबाग रेलवे स्टेशन पर काटनी होगी। मुझे लगता है कि भारतीय रेल विभाग जितनी सुविधा और विनम्रता से हमारी असुविधा के लिए खेद जताता है उतनी विनम्रता किसी भी दूसरे सरकारी विभाग में नहीं होती होगी। बेमन से फेसबुक खोला अचानक नरेन भैया का मैसेज़ दिखा। जिसमें लिखा था – असित भाई हज़ारीबाग में कोई भी बात हो तो बताइएगा। अब बताने के लिए था ही क्या! मैंने उत्तर में लिखा कि नहीं सब ठीक है। रात वाली ट्रेन कल सुबह आएगी। दुआ कीजिएगा कि तब तक जीवित रह जाऊं। मैंने फेसबुक भी बंद किया और आचार्य जी के बगल में लेट गया।

नीचे का ठंडा फर्श हमारी ऊष्मा से गरम हो रहा था और उसकी शीतलता से हम शीतल। तभी मोबाइल बजा। उधर से आवाज आई, असित भाई! मैं सेक्शन इंजीनियर प्रभाष चंद्रा बोल रहा हूँ। अधिकारी आवास खोल दिया गया है आप उसमें चले जाएं। सहसा यकीन नहीं हुआ। कुछ मिनट पहले रेलवे को दी गई छोटी-मोटी गालियों को भारतीय नेताओं की तरह वापस लिया और बगल में लेटे आचार्य जी को जगाया। मैंने नरेन भैया को फोन करके कहा कि भैया इतना इंतज़ाम करने की क्या जरूरत थी आप लोग सीमा पर सारी रात खड़े रहते हैं मैं एक रात प्लेटफॉर्म पर नहीं गुजार सकता! नरेन भैया ने जो कहा वो देश के हर नागरिक के लिए याद रखने की बात है। कहा उन्होंने कि असित भाई! हम सेना के लोग हैं हमारे लिए हमारा सिविलियन फर्स्ट होता है।

मैं नहीं जानता कि मुझे होटल्स तक ले जाने वाले हज़ारीबाग के वो लोग फिर कभी मिलेंगे कि नहीं! मुझे यह भी नहीं पता कि बैंगलोर में कहीं इंजीनियर अमित सिंह भाई से कभी मिलना होगा कि नहीं! जीवन में फिर कभी उस एक रात की माँ से मिल पाऊंगा कि नहीं! देश के किसी सीमा से उल्टे-सीधे पोस्ट लिखने वाले फौजी नरेन भैया और प्रभाष चंद्रा सर से मिलना होगा कि नहीं। मुझे तो इतना भी नहीं पता कि ज़िंदगी की वो दो रातें फिर जीवन में कभी आएंगी या नहीं कि जब हम सड़क के किनारे से उठ कर एयरकंडीशन्स रूम में पहुँचे या प्लेटफॉर्म से उठ कर सीधे अधिकारी आवास तक पहुंच गए। उसके पहले चाहता हूँ कह दूं, शुक्रिया जिंदगी… शुक्रिया दोस्तों!


ये लेख हमें लिख भेजा है असित कुमार ने। असित कुमार मिश्र शिक्षक हैं। उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। यात्राओं से बड़ा डरते हैं। या यूं कह लें कि देश की उस तमाम जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं जो घूमना तो चाहती है लेकिन कम सुविधाओं की वजह से बाहर निकलने में कतराती है। असित सोशल मीडिया पर काफी पढ़े जाते हैं, बेहतरीन लिखते हैं। असित कहते हैं कि हिंदी साहित्य की जितनी भी विधाएं हैं उनमें ‘झूठ-सांच’ कुछ न कुछ लिख ही लूंगा लेकिन यात्रा वृत्तांत में तो कुछ भी नहीं। असित की ये बात उनके इस लिखे में खुद ही गलत साबित हो जाती है। 


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