पचास-पार महिला की इस रोमांचक पहाड़ी यात्रा के सामने युवा घुमक्कड़ी फेल है

0
1683
views

मैं अपने जीवन के पचास से ज्यादा बसंत देख चुकी हूं, लेकिन अब तक पहाड़ों पर जमी बर्फ को करीब से कभी नहीं देखा था। मेरी बेटी ने दफ्तर से लंबी छुट्टियां ली थीं। उसने मुझसे बोला, मैं हिमाचल प्रदेश की एक अनप्लान्ड ट्रिप करने वाली हूं, आपको चलना हो तो बोलो। उसकी ये बातें सुनकर मुझे रोमांच तो हुआ, लेकिन इन बच्चों की कूद-फांद वाली यात्राओं में मैं कैसे खुद को संभालूंगी, ये सोच ठिठक गई। बेटी ने बोला, अरे मैं अकेले जा रही, आपकी सहूलियत का पूरा ख्याल रखा जाएगा, चलिए आपको सफेद पहाड़-बर्फीली नदियां दिखाकर लाएंगे। मैंने भी हिम्मत जुटाई, बैग पैक हो गया। हिमाचल प्रदेश में किधर जाना था, कहां से शुरुआत करनी थी, कुछ पक्का नहीं किया गया। बस हम दोनों मां-बेटी निकल पड़े।

दिल्ली से ट्रेन पकड़कर कालका पहुंचे। कालका, हरियाणा का एक छोटा सा कस्बा है, जोकि हिमाचल प्रदेश की सीमा से सटा है। ये वही कालका है, जहां शिमला तक की टॉय ट्रेन चलती है। कालका में प्रसिद्ध प्राचीन काली मंदिर में भंडारे का प्रसाद पाकर आगे का प्लान बनने लगा। शिमला या सोलन, दोनों में से कहां। बस ली सोलन की, लेकिन रास्ते में प्लान बदल गया, आगे शिमला तक की टिकट कटा ली गई। शिमला पहुंचते-पहुंचते रात हो गई।

चूंकि ये मई का महीना था तो टूरिस्टों की बाढ़ आई हुई थी वहां। सारे होटल, धर्मशाला, सराय भरी हुई थीं। बेटी काफी देर तक सस्ते और अच्छे होटल के लिए दौड़-भाग करती रही। फिर हारकर हमने थोड़ा नीचे जाकर जमीन से दो फ्लोर नीचे वाला कमरा ले ही लिया। उधर ऑक्सीजन की बड़ी कमी थी। मेरी रात किसी तरह गुजरी। सुबह जब नाश्ता करने ऊपर आए तो तबीयत बिगड़ गई। सांस ऊपर-नीचे होने लगी। बीपी लो होने लगा। पास में ही एक गुरुद्वारा था, उन्नीसवीं शताब्दी का बना हुआ। काफी हवादार था, खूब विशाल। अंदर अरदास चल रही थी, वहीं जाकर बैठ गई मैं। बेटी दवा लेने बाहर निकल आई। जब वो वापस लौटी तब तक मैं काफी प्रसन्नचित्त हो चुकी थी। पता चला कि गुरुद्वारा में ही ठहरने की व्यवस्था भी है। बहुत ही कम दाम में बेहतरीन कमरा मिल गया हमें वहां। खूब बड़ी सी खिड़की थी, जिससे नीले आसमान के नीचे खुला और धुला सा पूरा शहर नजर आ रहा था। ये वाला दिन तो आराम करने में निकल गया।

अगली ही सुबह हम जल्दी बस पकड़कर निकल गए किसी कम-जानी जगह की खोज में। कहां जाना था, नहीं मालूम था। बस हमें कुफरी ले गई लेकिन वहां इतनी भीड़ देखकर हम वहां से फागू के लिए निकल लिए। फागू बड़ा ही पास है कुफरी से, अगर आपको भी किसी प्रसिद्ध हिलस्टेशन से ज्यादा किसी शांत से पहाड़ी इलाके पर जाकर वहां के लोगों के साथ वक्त बिताने में मजा आता है तो आप फागू आ जाएं। फागू में कई सारे होटल और रिजॉर्ट हैं, आबादी बड़ी कम सी है। हमने यहां खाना खाया, एक बहुत ही प्यारे हिमाचली युगल से खूब सारी बातें की। लेकिन हमें तो फागू में ही रुक तो जाना नहीं था। अभी भी दिल को अपना वांछित स्थान नहीं मिल पाया था, एक ऐसी जगह जहां रोमांच और सुकून दोनों हो और भतेरी भीड़ भी न हो।

हाटू माता का मंदिर

पता चला, वहीं से चालीस किलोमीटर की दूरी पर नारकंडा नाम की एक जगह है। नाम अच्छा सा लगा, हम निकल लिए उधर को। वहां पहुंचकर पता चला कि ये जगह बर्फबारी के वक्त घूमने के लिए ज्यादा मुफीद है। हम मायूस होने ही वाले थे कि पता चला, वहां से तकरीबन पांच-छः किलोमीटर ऊपर एक हाटू माता का मंदिर है। ये मंदिर पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर है, मतलब वहां के आस-पास पहाड़ों में सबसे शिखर पर। हां, ये हुई न रोमांच वाली बात। एक टैक्सी बुक कराई। क्या सीधी चढ़ाई थी, उस पर भी तीखे घुमावदार रास्ते। सेबों के बागीचे हमारे साथ-साथ चल रहे थे। घने जंगलों के बीच में सर्र से भागती हमारी गाड़ी। हर एक मोड़ पर लगता था कि अब नीचे गिर जाएंगे, कलेजा एकदम मुंह को आ जा रहा था, इन सबके बावजूद आनंद बड़ा आ रहा था।

शिखर पर पहुंचकर जो हाटू माता का मंदिर मिला, वो हमारे उत्तर भारत के मंदिरों से काफी अलग था। ऐसा लग रहा था, जैसे किसी तिब्बती मठ से आ गए हैं। लकड़ी से बनी हुई इमारत और उस पर उकेरी गई सुंदर कलाकृतियां। काफी खूबसूरत था सब कुछ, मंदिर भी, सामने के नजारे भी। वहां पर काफी ज्यादा अच्छा लग रहा था। रौमांचक सफर के बाद मंदिर के शांत माहौल में जो सुकून मिल रहा था, वो दैवीय था, अप्रतिम था। खूब सारा वक्त वहां गुजारकर हम नीचे आ गए। वापस बस पकड़कर शिमला पहुंच गए। रात हो गई थी, अगले दिन शिमला शहर घूमने का प्लान बनाकर हम सो गए।

मंडी की एक लोक कलाकार, पारंपरिक पोशाक में

सुबह उठे तो मौसम दिलकश सा था। बारिश हो रही थी, हल्की सी। चारों तरफ मानो और हरियाली हो गई थी। हम सबसे पहले पास के ही एक राम मंदिर में गए। फिर मॉल रोड की राह पकड़ ली। मॉल रोड पहाड़ी शहरों का सबसे मुख्य बाजार होता है। बड़ी चहल पहल थी उधर। हिमाचली पोशकें पहनकर लोग फोटो खिंचवा रहे थे। बीचोबीच खूब बड़ा सा तिरंगा लहरा रहा था। पहाड़ी खानों की स्टाल लगी हुई थीं। और सबसे खूबसूरत चीज जो हमें देखने को मिली वो थी, मंडी जिले से आए कलाकार। मंडी जिले का वार्षिक उत्सव चल रहा था। इन कलाकारों ने क्या सुंदर-सुंदर पोशाकें पहनी हुई थीं। ठेठ संगीत में नजरें जमाकर देखने वाला नृत्य। पहाड़ी लोक संस्कृति की एक अनुपम छटा बिखर गई थी वहां।

अनोखे खाने, नृत्य, प्राकृतिक नजारों के साथ कब वक्त गुजर गया, पता ही नहीं चला। शाम हो गई थी, हमने टैक्सी लेने की बजाय मॉल रोड से सीधे बस अड्डे जाने वाली सीढ़ियां लीं। बारिश तेज हो गई थी लेकिन मजा बड़ा आ रहा था। बस अड्डे के पास अपने अड्डे यानि कि गुरुद्वार पहुंचकर लंगर छका। मंडी का वो खूबसूरत नृत्य अब तक दिमाग में घूम रहा था, तो निश्चय हुआ कि अब अगला पड़ाव मंडी ही होना चाहिए। रात में ही मंडी के लिए बस ली। मंडी हम तकरीबन रात के ढाई बजे पहुंचे, मैं और मेरी बेटी दोनों ही उनींदे थे। वो बस आगे मनाली जा रही थी, मनाली सुबह पहुंचती, मतलब नींद पूरी हो जानी थी। हमने मंडी का प्लान पोस्टपोन किया और मनाली तक जाने का मन बना लिया।

बस के साथ-साथ वक्त भी आगे बढ़ रहा था। भोर हो गई थी, सूरज अंगड़ाई ले रहा था। बेटी तो एकदम गहरी नींद में थी, मैंने खिड़की से बाहर झांका। आहा! एकदम सफेद, दूध के माफिक, नदी की धारा बही जा रही थी। और अब तो पहाड़ों पर बर्फ भी दिखना शुरू हो गई थी। मेरा सपना पूरा हो रहा था। मनाली बस अड्डे पर बस रुकी। होटल के वही हालात थे, सब भरे हुए। लेकिन अब तक हमें एक अच्छा जुगाड़ पता चल चुका था, पास में गुरुद्वार ढूंढो और वहीं ठहरो। चूंकि इसके बारे में कम लोगों को जानकारी होती है इसलिए भीड़ कम रहती है। हमें वहां भी ठीक-ठाक दाम पर हवादार कमरा मिल गया, गीजर के साथ। खिड़की से ही बर्फीले शिखर वाले पहाड़ नजर आ रहे थे। यहां ठंड काफी ज्यादा थी। रात भर की थकान और सीने की जकड़न ने बिस्तर से चिपके रहने को मजबूर कर दिया। जब देह को थोड़ा आराम मिला तो नीचे उतर आए मनाली की मॉल रोड पर। पहाड़ी हैंडीक्राफ्ट की ढेर सारी दूकानें थीं, शॉल-ऊनी कपड़े और बाकी वही सब, जोकि एक पहाड़ी शहर के बाजार में मिलता है।

अगली सुबह उठकर सीधे पहुंचे हिडिंबा मंदिर पर। किंवदिंतियों के अनुसार, हिडिंबा वहीं हैं जिनसे भीम जंगल में मिले थे। हिडिंबा और भीम के बेटे का नाम घटोत्कच था। ये मंदिर मजबूत लकड़ियों से बना है। दीवारों पर जंगली पशुओं की हड्डियां और सिर टंगे हुए हैं। यहां से निकलकर एक लंबी सीढ़ी से उतरकर हम ओल्ड मनाली की ओर बढ़ गए। यहां आकर पता चला कि उस सफेद सी चमकीली नदी, जो हमें बस के सफर में दिखी थी, का नाम मनालछू है।

छोटे से लकड़ी के पुल को पारकर हम ओल्ड मनाली पहुंच गए। नदी के किनारे ही यहां कई सारे रेस्टोरेंट्स हैं। वहां खाना-पीना करके, नदी के ठंडे पानी से खुद को शीतल करके हम वापस मेन मार्केट में आ गए। यहां से रोहतांग वैली जाने का प्लान था अगले दिन। लेकिन पर्यटकों की भारी भीड़ के चलते हमें बुकिंग नहीं मिली और जो मिलीं भी वो हद से ज्यादा मंहगी थीं। सिर्फ टूरिस्ट बनकर हमें घूमना नहीं था, इसलिए अगले दिन मंडी निकलने का प्लान बनाकर हम सो गए।

अगले दिन हमें निकलते-निकलते दोपहर हो गई। अब मैं इन जवान बच्चों की तरह तो हूं नहीं कि इतना दौड़ने-भागने के बाद भी सब कुछ फुर्ती से कर लूं। इसीलिए कहते हैं, जवानी में खूब घूम लेना चाहिए। खैर, मैं भी इस ट्रिप पर काफी जीवंत महसूस कर रही थी, वरना इतनी सारी दवाइयों, शुगर, बीपी, यूरिक एसिड के घटते-बढ़ते स्तरों ने एकदम निष्क्रिय बना दिया है। अच्छा तो, मंडी की बस कुल्लू बस स्टॉप से मिलने वाली थी। कुल्लू पहुंचे तब तक शाम हो चुकी थी, मनालछू ने भी साथ छोड़ दिया था। चाय पीकर अगली बस में बैठ गए।

ब्यास नदी

थोड़ी देर बाद ही हम बड़े खतरनाक रास्ते पर आ गए। अब ब्यास नदी ने हमारा साथ पकड़ लिया था। बारिश हो रही थी। ब्यास एक उदास, गहरी, काली नदी है। ऊंची-ऊंची पहाड़ियों की तलहटी में शांति से बहती हुई। बस कभी-कभार किनारे से पां-छः इंच की दूरी तक पहुंच जाती थी। इतनी फिसलन में बस का जरा सा संतुलन बिगड़ा और बस सहित हम सब उस ब्यास की गोद में। रोमांच ने अब डर का स्थान लेना शुरू कर दिया, उस पर भी बस लगातार उछल रही थी। कई किलोमीटर बाद जब थोड़े सीधे रास्ते पर बस पहुंची तो जान में जान आई। मंडी बस स्टॉप पर जब उतरे तो रात हो चुकी थी।

पास ही एक ढाबे पर खाना खाया। पता चला, बगल में पंचायती भवन में किफायती दामों में कमरे मिल जाते हैं। तो हिमाचल प्रदेश में सस्ते और अच्छे में रुकने का एक और विकल्प पता चल गया। पहला गुरुद्वारे, दूसरा ये सरकारी पंचायती भवन। बहुत ही कम दाम में हमें डबल बेड, गीजर, एसी, टीवी सब मिल गया था।जिस ढाबे पर खाना खाया वहां पर मंडी में घूमने लायक अच्छी जगह पूछी तो दूकान वाले ने मुंह बिचका दिया कि यहां तो कुछ भी नहीं है, आप मनाली चले जाओ। अब उसे क्या पता, हम उधर से ही आ रहे हैं। मेरी खोजी और टेक्नो सेवी बेटे ने रात भर में पता किया कि यहां पर कोई सीक्रेट गुफा है। अगली सुबह उसे ही तलाशने का विचार बना हम सो गए।

नाश्ता वगैरह कर लेने के बाद जब स्थानीय लोगों से गुफा के बारे में पूछा तो कुछ ने हमें रेवाल्सर जाने वाली बस पर बैठने को कहा। वहां से भी अब हमें नैणा देवी के मंदिर की ओर जाने वाली बस में बैठना था। बस के कंडक्टर से पता चला कि हां, रास्ते में एक गुफा पड़ती तो है लेकिन वहां पैदल जाना होता, बस नहीं जाती। हमने कहा, चलो कहीं तो पहुंचेंगे। नहीं भी मिली गुफा तो माता के दर्शन हो जाएंगे। लंबे चीड़ के पेड़ों के बीच सरकती बस एक सीधी चढ़ाई पर चढ़ी जा रही थी। तकरीबन तीस किलोमीटर के बाद नैणा देवी का मंदिर आ गया। दर्शन कर, प्रसाद पाकर अब उस गुफा की खोज में निकलना था। बस वाले ने हमें रास्ते में उतार दिया। वहां ढेर सारे बौद्ध झंडे लगे थे, ऊंचे-ऊंचे। कुछ भी लैंडमार्क नहीं था। थोड़ी दूर तो झंडो के सहारे आगे बढ़े, जिसमें शायद बुद्ध के उपदेश लिखे थे। अभी तक हम दोनों के अलावा वहां कोई नहीं था।

आगे का रास्ता समझ में नही आ रहा था, नीचे की तरफ खाई जैसा कुछ दिखाई दिया। हम ऊपर वाले रास्ते से आगे बढ़े, वहां गुम्बद जैसा पत्थर था तो सोचा गुफा का रास्ता होगा। लेकिन वह एक मांद सरीखी आकृति थी। कुछ दूर पर किसी जानवर की हड्डियां पड़ी थीं, थोड़ा भय लगा। दूसरी ओर मुड़े तो कुछ झोपड़ियां दिखीं, हिम्मत बढ़ी, आगे बढ़े तो एक बुजुर्ग महिला अपने दरवाजे पर बैठी थीं। उन्हें हिंदी या इंग्लिश कुछ समझ नहीं आ रही थी। शायद उन्हें गुफा शब्द समझ आया, उन्होंने नीचे की ओर संकेत किया। हम दोनों पहले वाले रास्ते पर फिर चल पड़े। मैंने साफ-साफ कह दिया उतना ही नीचे तक जाऊंगी कि फिर वापस आ सकूं लेकिन बेटी अड़ी रही। अन्ततः रास्ता मिल ही गया। एक भिझुणी दिखाई दी, उसने इशारे से गुफा का रास्ता बताया। इन दो के अलावा वहां अभी तक कोई और मनुष्य नहीं दिखा।

गुफा के अंदर विशालकाय प्रतिमा

वो गुफा आठवीं सदी की बनी हुई थी। अंदर बौद्ध गुरु आचार्य पद्मसंभव की कई फुट लंबी प्रतिमा थी। गजब का सन्नाटा था अंदर। बहुत शांति मिल रही थी वहां। गुफा देखने के बाद बाहर आकर बैठ गये । इतनी अच्छी और ताजी हवा कि उठने का बिल्कुल मन नही हो रहा था। आखिरी बस, जोकि तकरीबन चार बजे आती है, उसके निकल जाने का डर था। हुआ भी यही, जब तक सड़क पर जाने का रास्ता मिला, बस जा चुकी थी। अब वापसी का कोई साधन नहीं था। एक दूकानदार के कहने पर सामान ढोने वाली गाड़ी पर चढ़ गये और हिचकोले खाती गाड़ी से सफर तय किया, खड़े होकर।

कसौली में शानदार सूर्यास्त

मंडी बस अड्डे पर पहुंचे, रात हो चुकी थी। सफर की थकान काफी बढ़ चली थी, बेटी की पैर में मोच भी आ गई थी। एक दोस्त के घर एक दिन आराम कर हम कसौली घूमने गए। शांत सी, सुंदर सी जगह है। अब वापस घर की याद सताने लगी थी। वापस की दिल्ली की बस में बैठ गए। इस यात्रा ने मुझे अगले कई महीनों के लिए रीचार्ज कर दिया था। ऐसी ही किसी और रोमांचक यात्रा पर फिर से निकलने के अरमान दिल में हैं।


अपनी इस खूब मजेदार यात्रा के बारे में हमें लिख भेजा है संगीता श्रीवास्तव ने। संगीता चित्रकार हैं। सालों तक संस्कृत शिक्षक की भी भूमिका निभा चुकी हैं। पारिवारिक जिम्मेदारियों में लिपटी किसी भी अन्य महिला की तरह संगीता भी अपनी घुमक्कड़ी के कई सपनों को जी नहीं पाई थीं, अब उम्र के इस पड़ाव में वो जिंदगी को नए नजरिए के साथ जी रही हैं। संगीता गरीब बच्चों के लिए निःशुल्क पाठशाला भी चलाती हैं। खाना पकाना और मेहमानवाजी इनको खासा प्रिय है।


ये भी पढ़ें:

बिना प्लान की हुई ट्रिप जितना मजा कहीं और नहीं

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here