यात्रा और कविताएं समानुपाती शब्द ही तो हैं

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मई-जून के महीने में हिमाचल जाने का पहला कारण हर किसी का यही होता है वहां ठंडक होती है। मैं समुद्र तल से 230 मीटर ऊंची तपती दोपहरों वाली जगह से ठंडी 2100 मीटर ऊंचाई वाली जगह पर पहुंच गया था। जैसलमेर से धर्मकोट तक कि यात्रा में पठानकोट तक 24 घंटे की यात्रा ऊंघते हुए बीती। पठानकोट से निकलते-निकलते आंखें खुलनी शुरू हुई जो खोती गई सुंदर कविताओं में। पतली-पतली सड़कें, दोनों तरफ छोटे-छोटे गेहूं के खेत, ऊंचे पहाड़। मैंने बहुत सारी कविताओं को महसूस किया इस यात्रा में।
गेहूं के खिलखिलाते  खेत
इस यात्रा में जो चीज सबसे अच्छी लगी वो थे गेहूं के खेत। छोटे-छोटे खेतों में लहराती गेहूं की बालियां ऐसे लग रही थीं जैसे हवा के गीतों के साथ नाच रही हों। मैं धर्मकोट में जिस कमरे में रुका हुआ था उसके ठीक नीचे एक छोटा सा खेत था, जिसकी बालियां हवा में लहराती रहती थी। मैं सिगरेट पीने बाहर निकलता तो लम्बी देर तक लोहे की जाली पर हाथ टिकाए सुनहरी बालियों को देखता रहता। सीढ़ीदार खेत बहुत छोटे-छोटे होते हैं। मैं रास्ते भर सोचता रहा कि कितने प्यारे हैं ये खेत, मैं भी घर के पास एक ऐसा छोटा सा खेत बना दूंगा जिसमें हमेशा कुछ उगता रहे।
आहा
मैक्लॉडगंज के पास एक छोटी सी झील है, डल झील। धर्मकोट से इस झील तक पैदल रास्ता बहुत सुंदर है। घने पेड़ों के बीच से गुजरते हुए महसूस होता है जैसे आँखें बंद किए चल रहे हों। चारों तरफ शांति और पेड़ों के बीच से आती झींगुरों की आवाजें। इस रास्ते के बीच में एक व्यक्ति ने सावधान करते हुए कहा कि बीच में एक जगह पहाड़ी कुत्ते हैं ध्यान रखना। इन पेड़ों के बीच से गुजरते हुए जो महसूस हुआ वह मंगलेश डबराल की इस कविता से समझा जा सकता है,
कुछ देर बाद
शुरू होगी आवाजें, पहले एक कुत्ता भूंकेगा पास से
कुछ दूर हिनहिनाएगा घोड़ा, बस्ती के पार सियार बोलेंगे
बीच में कहीं होगा झींगुर का बोलना, पत्तों का हिलना
बीच में कहीं होगा, रास्ते पर किसी का अकेले चलना
इन सबसे बाहर, एक बाघ के डुकरने की आवाज़
होगी मेरे गांव में।
मैंने सुना था हिमाचल के रास्ते डरावने हैं। लेकिन मुझे इन रास्तों से गुजरते हुए एक बार भी डर नहीं लगा। छोटे-छोटे रास्ते। उन रास्तों पर से चढ़ती-उतरती गाड़ियां, ढलानों पर पशुओं को हांकती लड़कियां, रास्तों से बहुत नीचे बसे गांव। पहाड़ों पर चढ़ते-उतरते हुए हर बार मुझे आंखों देखी फिल्म याद आती रही। ‘मेरा सत्य वही होगा जिसे मैं महसूस करूंगा’, ’कुछ अनुभव अभी भी बाकि हैं जो कि सिर्फ सपनों में भोगे थे। जैसे कि ये सपना मुझे बार-बार आता था कि मैं हवा में तैर रहा हूं पक्षी के जैसे।’ यहां के लोग भी मुझे किसी कविता से लगे। चुपचाप अपना काम करते हुए। आते-जाते हुए। शायद नई जगह के लोग होने के कारण मुझे ऐसा लग रहा है। सड़क पर गुजरते इस बुजूर्ग की तस्वीर देखिए या खच्चर ले जाते इस आदमी को या फिर इस राहगीर को। मुझे लगा किस से पूछूं कौन से देश से हो।
दूर तक ऊंचे-ऊंचे हरे और सफेद पहाड़। ऊपर की चोटियों पर गर्मियों में भी बर्फ दिख रही है। पेड़ों की लम्बी कतारों पर सुबह-शाम सूरज डूबने और उगने के रंग उतरते हैं। किसी कोने में कोई अकेला खड़ा पेड़। शाम को छोटी-छोटी चीजें जब सूरज पीछे चला जाता है तो निखरने लगती हैं। पराशर झील धर्मशाला से छह घंटे की दूरी पर है मंडी के पास। मुझे इस यात्रा में गेहूं के खेतों के बाद अगर कोई जगह सबसे अच्छी लगी तो वो थी इस झील के पास एक पहाड़ी। यहाँ पराशर ऋषि का मंदिर है। इस झील के अंदर एक छोटा बगीचा है जो तैरता रहता है। मंदिर में स्थानीय लोगों की भीड़ थी शायद यहाँ पर्यटक बहुत कम ही आते होंगे। मंदिर के आस पास लकड़ी से बहुत ही सुंदर कमरे बने हुए हैं। झील देखने के बाद पास की एक पहाड़ी पर चढ़े।वहां एक तार थी जिसके दूसरी तरफ छोटा सा कमरा दिख रहा था। वहाँ की हवा ऐसी थी कि बैठे रहें बस हिलें ही नहीं।
लगे हाथ हमने भी फोटो खिंचा ली
दो पहाड़ियों के बीच से आती ठंडी हवा और आसपास दिखते सफेद बर्फ से ढके पहाड़। भेड़ों का हांकता चरवाहा, पहाड़ों के बीच गोते खाते पंछी। मेरे लिए ये जगह बिल्कूल वैसी ही थी कि ’कुछ अनुभव अभी भी बाकी हैं जो कि सिर्फ सपनों में भोगे थे।’ मैं धर्मकोट में रुका था। इसे छोटा इजरायल भी कहते हैं। मैक्लॉडगंज से थोड़ा सा आगे शांत और छोटा सा गांव है। यहां से कांगड़ा वैली और धौलाधर रेंज दिखते हैं। भीड़भाड़ से दूर शांति से रहने के लिए धर्मकोट बहुत ही प्यारी जगह है। मैं मिस्टिक लोटस होटल में ठहरा था और इस होटल में ज्यादातर ऐसे लोग थे जो तीन-चार महीनों के लिए यहां रुकने आए थे। यहां रास्तों में अकेले फिरते हुए ऐसे लगता है जैसे हर चीज कविता कह रही हों।
धूप में बैठ कर थकान उतारते बच्चे

पेड़ों के बीच से रोशनी बिखेरता सूरज, पत्थर पर खिलता अकेला फूल, स्कूल में खेलते हुए थककर सीढ़ियों पर बैठे बच्चे। मैं फिर से इन तस्वीरों को देखता हूं तो ऐसे लगता है जैसे मेरे किसी प्रिय कवि की कविताएं हैं जिन्हें मैं बार-बार पढ़ता हूं। इन सामने घटती कविताओं में सुख है महसूस करने का पास बैठकर।


हिमाचल प्रदेश में महसूस की गई कविताओं के बारे में हूूबहू हमें लिख भेजा है सुमेर सिंह राठौड़ ने। इनका नाम जितना ज्यादा रौबीला है, ये सज्जन उतने ही ज्यादा विनम्र और दिलकश हैं। रेत से प्रेम है, रेगिस्तान में जीवन तलाशते रहते हैं और उसी से जीवंत रहते हैं। दिल किसी कांच सरीखा साफ है। दुनियावी झंझटों से दूर ही रहते हैं। सूरज-चांद के इश्क में डूबे रहते हैं। सोशल मीडिया पर खासे चर्चित हैं। इनकी खींची हुई फोटो देखना, किसी ट्रीट से कम नहीं होता है। 

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