मुंबई जा कर लोकल ट्रेन में सफर नहीं किया तो क्या किया

1
1623
views

मुंबई क्या है? भागता हुआ शहर या सपनों के लिए भागता हुआ शहर। क्योंकि इस शहर में हर कोई अपने सपनों को पूरा करने के लिए आता है। भागते हुए शहर में सपनों के मुसाफिरो को उनकी मंजिलों तक पहुंचाती है मुंबई लोकल। ये भी भागती है पर ये अलग बात है कि इसकी कोई मंजिल नहीं होती। ये आपकी अच्छी साथी बन कर आपकी मदद करती है।

मुंबई में लोग आस-पास के इलाके से 2 घंटे या उससे भी ज्यादा का सफर तय कर के आते हैं। लोग यहां देश के अलग-अलग राज्यों से भी आते है। अगर आप मुंबई घूम चुके हैं और आपने लोकल में चढ़ना नहीं सीखा तो दरअसल आपने मुंबई से जाते-जाते कुछ नहीं सीखा।

भीड़भाड़ वाली जगह में  खड़े रहकर अखबार पढ़ना भी एक हुनर है

तो चलिए जानते हैं कि मुंबई लोकल में चढ़ते कैसे हैं

सबसे पहले आपको फुर्तीलाऔर चुस्त दोनों होना चाहिए। अगर आप में ये खूबी नहीं हैं तो आप ये भूल जाओ की आप लोकल में चढ़ भी पाओगे। जो आप चढ़ गए तो आपको लगेगा कि आपने सर्जिकल स्ट्राइक जैसी सफलता पा ली है। यहां पर तो बूढ़े-बुजुर्ग भी एक दम दगड़ाक घोड़े के तरह होते हैं।

मुंबई लोकल में सीट पाने का दो ही तरीका है एक तो आपको मीडियम से थोड़े धीमे चलती लोकल को झपट्टा मार पकड़ लें या फिर जिस स्टेशन से ट्रेन छूटने वाली है वहां से ट्रेन पकड़ लें। अगर आपसे ये भी नहीं हो पाता है तो आपको ट्रेन के अंदर घुसने के बाद दो सीटों के बीच मे बचे हुए जगह में लाइन लगाना होगा ताकि अगर कोई उठे तो आपका नंबर लग सके।

इतना आसान नहीं लोकल ट्रेन में चढ़ना..खुद चढ़ पाओ तो बताना

मुंबई लोकल और बैग को आगे टांगने की निंजा टेक्नीक

लोकल ट्रेन को लेकर बहुत बातें सीखना जरूरी है जैसे कि ट्रेन में चढ़ते वक्त बैग को आगे क्यों टांग जाता है। मैंने लोकल लोगों से सुना है कि बैग आगे टांगने से आप ट्रेन में आसानी से चढ़ सकते हो। इसकी दूसरी वजह ये भी है कि ट्रेन में भीड़ एक साथ चढ़ती है, ऐसे में अगर आपने अपना बैग आपने पीछे टांग रखा है तो कोई न कोई आपको पीछे खींच लेगा फिर आपकी सारी मेहनत बेकार। बैग के साथ-साथ आपको अपने वॉलेट और मोबाइल का भी ख्याल रखना होता है वरना जेबकतरों का शिकार हो सकते हैं। बेहतर यही है कि लोकल में चढ़ते वक्त अपने मोबाइल और वॉलेट को बैग में डाल लें। ये बातें जनहित में जारी है।

मुंबई लोकल के हर डिब्बे में एक परिवार होता है

मुंबई जैसे भागते शहर में उससे भी ज्यादा तेज भागते लोकल ट्रेन में एक परिवार को जन्मे देखना यकीन नहीं होता है लेकिन आंखों को जरूर सुकून दे जाता है। यू तो मुंबई की लोकल ट्रेन मुंबई के लोगो का जनजीवन है लेकिन फिर भी इन ही ट्रेनों में हर रोज एक नया परिवार जन्म लेता है।

मुंबई लोकल में 12 डिब्बे होते है कभीकभार 15 डिब्बे भी हो जाते है। अगर आप मुंबई लोकल में नए हो तो आपको हर एक डिब्बे में कुछ लोगों का ग्रुप दिखेगा जिसमें हर जाति धर्म और रंग रूप के लोग होते हैं। इनमें कोई सीनियर या जूनियर नहीं होता है और ना ही कोई लीडर होता है। और यकीन मानो तो उन सभी का वो परिवार है क्योंकि ग्रुप का हर मेंबर हर दिन के हिसाब से बाकी मेंबर्स के लिए वड़ा पाव, समोसा, इडली ऐसी कोई खाने का चीज लाता है। इतना ही नहीं, ये लोग फिल्मी जोक मार कर हंसी के ठहाके भी लगाते हैं। ग्रुप में हर मेंबर्स को सम्मान दिया जाता हैं। दशहरा, ईद जैसे और भी त्यौहार ये ग्रुप लोकल ट्रेन में ही मनाते है। इस हिसाब से ये ग्रुप घर से निकलने के बाद ट्रेन में बनने वाले परिवार है।

अब आप सोच रहे होंगे कि ये ग्रुप्स बनते कैसे हैं?

देखिए मुंबई लोकल के परिवार का हिस्सा होने के लिए कोई एग्जाम या कोई कास्ट-सर्टिफिकेट देने की जरूरत नहीं है। सिर्फ एक फार्मूला है उसे फॉलो करना होगा। डेली एक ही ट्रेन और एक ही डिब्बा पकड़ना होगा। उसमें भी कल आप जहां खड़े थे उसी जगह खड़ा होना होगा। ये क्रिया आपको लगातार एक हफ्ते तक करनी होगी जिससे आपके आस-पास के लोग आपको पहचानने लगगे फिर आपको खुद ही काका मामा भाई कर के बात करने की कोशिश करनी होगी फिर धीरे धीरे बातों का सिलसिला आगे बढ़ेगा फिर एक दिन आप भी ग्रुप के लिए नाश्ता लेकर आते दिखोगे।

खुद को बिजी रखने का हल ‘भजन कीर्तन’

मुंबई लोकल और भजन

मुंबई लोकल के हर डिब्बे और हर ट्रेन में ये जरूरी नहीं है कि आपको भजन और कीर्तन सुनने को मिलेगा क्योंकि भजन और कीर्तन के बहुत कम ही समूह मुंबई लोकल में सक्रिय है। दरसअल जिस तरह से मुंबई लोकल में परिवार होते है उसी तरह कुछ-कुछ लोकल में आपको भजन कीर्तन वाले ग्रुप भी दिखेंगे। ये भी हमारी और आपकी तरह घर से सुबह दफ्तर जाने के लिए निकलते है।

लेकिन ये आपको ट्रेन में लाइव भजन देखने का मौका देते है। ये 4-5 लोग होते है जो लगातार एक घंटे तक ट्रैन की खिड़की और ताशा बजा कर भजन गाते रहते है। इनकी आवाज बहुत कमाल की होती है हालांकि युवा वर्ग इनसे बहुत खफा होता है। लेकिन वहीं ट्रेन में कुछ यात्री ऐसे भी होते है जो भजन और कीर्तन को सुनना पसंद करते है। ट्रेन में भजन और कीर्तन प्रायः हिंदी और मराठी में होते है।

इसके अलावा मुंबई लोकल में गेट पर खड़े होने के दौरान आपको अपना मोबाइल फोन जेब मे रखना होगा वरना स्टेशन पर झप्पटा मारने वालों की कमी नहीं हैं। आपकी इस असावधानी की वजह से आप दुखी और चोर खुश हो सकता है।

मुंबई लोकल में रोजाना लाखों जंग खाए हुए चेहरे सफर करते हैं जिनके कंधे किसी न किसी जिम्मेदारी से लदे होते है। इसलिए मुंबई लोकल पर लिखी एक छोटी सी कविता के साथ इस चलत मुसाफ़िर को दें इजाजत

एक नीरस वादा रोज निभाता हूं

मैं खुद से ही अपनी इच्छाएं छिपाता हूं

उम्मीदों के आलीशान मकानों को

रोज बनाता हूं पर जिम्मेदारियों की आड़ में लोकल चढ़ उसे ढहाता हूं।

भीड़ चाहे कितनी भी हो

मैं जिम्मेदारी की चादर ओढ़ चढ़ जाता हूं

उसकी मर्जी है वो वक्त से ज्यादा नहीं रुकती

मेरी भी जिद है मैं वक्त से पहले उसका इंतजार करूं

एक नीरस वादा रोज निभाता हूं

मैं खुद से ही अपनी इच्छा छिपाता हूं।


लोकल ट्रेनों और मुंबईकरों के बारे में ये रोचक बातें हमें लिख भेजी हैं सूरज मौर्या ने। सूरज मुंबई में रहते हैं। टीवी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री से हैं। नया-नया लिखना शुरू किया है इसलिए खुद को एक अनगढ़ नौसिखिया लेखक मानते हैं। कहते हैं कि बीते कुछ समय से लिखने का भूत चढ़ गया है और अब इसे उतारना मुश्किल है। इसलिए लिखेंगे खूब लिखेंगे और अच्छा लिखकर दिखाएंगे। 


ये भी पढ़ें:

पैसेंजर ट्रेन में पहली बार यात्रा करने के बाद भारत के बारे में मेरी समझ और बढ़ गई है

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here