रांची के जलप्रात इतने सुंदर कि मेरा मन भी आजाद पंछी हो रहा था

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शहर में जब अपने आप को एक पिंजरे जैसी अनुभूति हुई तो मैंने जंगलों की ओर रुख किया है। शहर में तो अब कहीं हरियाली दिखे तो बस ऐसा लगता है कि चलो कोई तो ऐसा है जो इस वातावरण को संजोना चाहता है। शहरों में जब प्रकृतिप्रेमी इंसानों को घुटन होती है तो उन्हें सपने में भी जल, जंगल और पहाड़ नजर आते हैं। उन्हीं में से एक मैं भी हूं। प्रकृति की अनोखी धरोहरों का कोई भी पर्याय नहीं है। प्रकृति अपनी ओर सबको खींच ही लाती है, उसके पास आने की इच्छा को रोका नहीं जा सकता।

तो कंक्रीट के जंगलों से प्रकृति की गोद तक की मेरी यात्रा शुरू हुई लखनऊ से दिल्ली की ओर। मैं जंगलों को पूजने वालों की भूमि झारखंड जा रहा था। वायुयान से यात्रा जब प्रारंभ हुई तो बादलों के संपर्क में आते ही मन में सवालों का तूफान शुरू हो गया। कैसे दिखते होंगे पहाड़ों के बीच जल प्रपात? आकाश के बीच एक प्रतिबिंब ऐसा भी दिखा बिल्कुल जलप्रपात की तरह।

दिल्ली एयरपोर्ट पर इंतजार का 1 घंटा बीत नहीं रहा था। मन में अशांति थी, मन व्याकुल था। कितने जल्दी मैं उन वादियों को देख कर अपनी आंखों को संतुष्ट कर दूं। कुछ समय पश्चात यात्रा का दूसरा चरण प्रारम्भ हुआ। दिल्ली से झारखंड की राजधानी रांची के लिए।

जलप्रपातों का शहर- रांची

रांची तक का सफर कह रहा था, जल्दी आ जाओ भई, तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं। रांची पहुंचते ही जल प्रपातों के बारे में जानने की इच्छा हुई। मैं इस बात से अनभिज्ञ था की रांची के चारों तरफ ही जल प्रपात अभिवादन के लिए खड़े हुए हैं। जब इस बात की जानकारी हुई तो ऐसा लगा मानों मैंने सभी जलप्रपातों के दर्शन अपने मन की आंखों से कर लिया हो। रात का समय कई बरसों के बराबर लग रहा था। समय जैसे-जैसे बढ़ रहा था मन में उत्सुकता उतनी ही बढ़ती जा रही थी।

आखिरकार सुबह हुई और रांची से जल प्रपात की ओर निकलने की शुरुआत भी। रांची शहर से जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था, ऐसा महसूस हुआ मानो कोई धीरे से कानों में कह कर भाग गया कि यह तो शहर है। थोड़ा आगे आओ, जंगल तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।

हमारी गाड़ी ने रांची शहर को समाप्त किया तो सामने पहाड़ों की सुंदरता हमारा स्वागत कर रही थी। हैं। पहाड़ों की सुंदरता को देखकर अभी मन भरा भी नहीं था तभी घाटियां शुरू हो गईं। उन घाटियों की सुंदरता के आगे पहाड़ों की सुंदरता अब कम लग रही थी। घाटियों के बीच में छोटा सा झरना आया तो मैं खुद को उसका ठंडा पानी पीने से रोक नहीं पाया। उतना मीठा पानी मैंने अभी तक नहीं पिया था।

हुंडरू जल प्रपात

अब हम हुंडरु जल प्रपात के निकट पहुंच चुके थे। अब हमें पैदल चलकर 400 से भी ज्यादा सीढ़ियों से नीचे जलप्रपात के पास पहुंचना था। दिखने में बहुत ही पास दिखने वाला जल प्रपात दूर भाग रहा था। हिम्मत धोखा ना दे इसलिए सुंदर चित्र को संजो रहा था। लंबे सफर के बाद जल प्रपात के पास पहुंचते ही रास्ते की थकान कहां चली गई इसका पता ही नहीं चला।

मेरे सामने खड़ा प्रपात मुझसे कह रहा था, आओ मुझसे बातें करों। मैं तुम्हारे सभी प्रश्नों का उत्तर दूंगा। उसके पास पहुंचकर कर अपने आप को उसके धारा में मैंने खुद को समर्पित कर दिया। जैसे गंगा में डुबकी लगाई जाती है, उसी भांति डुबकी लगनी शुरू हो गई। कब शाम हो गई पता ही नहीं चला। मुझे उन सफेद धाराओं से बात करना बहुत ही अच्छा लग रहा था। उन सुंदर पहाड़ियों के बीच से वापस आना अपने मन की इच्छा को मारने जैसा था। अपने मन को समझाते हुए वहां से वापस लौटा।

अब समय आ गया था उस मन के स्वर्ग को त्याग कर फिर उसी कंकरीट के जंगलों में प्रवेश करने का।


रांची की इस यात्रा का विवरण हमें लिख भेजा है सौरभ राय ने। सौरभ अपने बारे में  बताते हैं कि मुझे यात्रा करना बहुत पसंद है। मैं ज्यादातर यात्रा धार्मिक स्थानों की करता हूं। मुझे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से बहुत ही लगाव है। मेरी शिक्षा समाज कार्य में परास्नातक तक हुई है। सामाजिक एवं धार्मिक कार्यों में रुचि रखता हूं।


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