IORA, भरतपुर: घुमक्कड़ों के इंतजार में एक सुंदर सा घर

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IORA तस्वीर 1

“इतना सुंदर, इतना सरल, इतनी सौम्यता, एकसाथ कैसे नजर आ रही है इस गेस्ट हाउस में। डिजाइन और इस सुंदर इंटीरियर के लिए आपने कहां से मदद ली है।”, भरतपुर के उस सुंदर से गेस्टहाउस को मंत्रमुग्ध निहारते हुए मैंने देवेंद्र जी से पूछा। हंसते हुए देवेंद्र जी बोले, “मुझे इतना सब तो नहीं पता मगर हां, मुझे जैसा-जैसा सही लगता गया, मैंने वह करने की कोशिश की है इस गेस्ट हाउस में। मुझे इसे होटल की शक्ल देने का बिल्कुल ही मन नहीं था। मैं हमेशा से चाहता रहा कि यह घर बन जाए और आखिरकार सालों की मेहनत और आप सभी के प्यार की बदौलत बन ही गया।”

इतना कहते हुए देवेंद्र जी ठंडी हो रही चाय की ओर इशारा करते हैं और माफी मांगकर एक कॉल का जवाब देने बाहर चले जाते हैं। इधर, मैं चाय की चुस्की लेते हुए बस इस सुंदर से जगह को निहारे जा रहा हूं। यह कितना सजीव है! कितना जीवंत है! यहां रखी हर एक चीज अपनी जगह उपयोगी और हर दृष्टि से सार्थक दिख रही है। गमले, दीवारें और पर्दों के रंगों के बीच का सामंजस्य देखते ही बनता है। सालों से घनिष्ठ मित्रता रही हो इनमें जैसे।

IORA तस्वीर 3

इतने में दूसरी बार फोन से हुई असुविधा के लिए माफी मांगते हुए देवेन्द्र जी सामने आ बैठते हैं। मेरी जिज्ञासा और बढ़ने लगी है। मैं और जानना चाहता हूं उनके जीवन के बारे में! उनके संघर्ष के बारे में! उनकी रुचियों के बारे में! उनके काम के बारे में और उनके सौम्य मन के बारे में जिसने मुझे यहां आने को मजबूर किया है।

दरअसल, बात यहां से शुरू होती है। हम दोनों पहली बार फेसबुक पर मिले थे। मुझे उनकी वाइल्ड लाईफ फोटोग्राफी प्रभावित करती थी तो उन्हें मेरे द्वारा लिखी गई कुछ कविताएं अपने लिए सटीक बैठती दिखती थीं।

IORA तस्वीर 4

कुछ अनौपचारिक बातों के बाद वह लगे हाथ मुझे भरतपुर (IORA गेस्ट हाउस) आने का न्यौता दे बैठते हैं और मैं हामी भी भर देता हूं। धीरे-धीरे दिन, महीने और साल किस चोर लगी से गुजर जाते हैं, पता ही नहीं चलता। मगर इन सालों के दरमियान देवेन्द्र जी ने मुझे सौ से अधिक बार आने को कहा होगा और पचास से अधिक बार मैंने आने का पूरा भरोसा भी दिया होगा मगर यह संभव एक बार भी नहीं हो पाता है।

इतना होने के बावजूद भी देवेन्द्र जी न्यौता देने से बाज आने वाले नहीं है और मैं; झूठी हामी भरने से! कुछ एक बार हमारी मुलाकात दिल्ली में जरूर हुई मगर वह इतनी भी नहीं कि हम कहीं बैठकर कुछ खा सकें।
मगर इस बार जाना तय है। इसलिए नहीं कि अब समय मिला है बल्कि इसलिए कि देवेन्द्र अब कई बार कहने लगे हैं, “अरे यार यात्री, इतनी बार अगर मोदी को बुलाया होता तो एक बार तो पक्का वह भी आ ही गया होता। आ जाओ यार एक बार!”

IORA तस्वीर 5

चूंकि बात अब मोदी जी तक आन पहुंची है तो मैं अपनी लाज बचा लेना ही उपयुक्त समझता हूं। सो भीम (राजस्थान) से लौटते हुए मैंने तय कर लिया है कि जयपुर से होते हुए इस बार जरूर भरतपुर तक की बस ली जाएगी। भीम से निलकते हुए मैंने उन्हें हवा के रुख का पता दे दिया है।

बस जयपुर उतरते हुए उन्हें कॉल कर कि “बस चार घंटे में पहुंचने वाला हूं।” जयपुर पहुंचते ही मुझे कॉल आता है, “सुनो, बस मत लेना। एक लड़का गया है वह तुम्हें रिसीव कर लेगा। व्हाईट स्विफ्ट गाड़ी है। मैं तुम्हें उसका नंबर भेज रहा हूं। उसको कॉल कर लेना। आओ मिलते हैं।” मगर मैं उन्हें मना कर रहा हूं कि “नहीं, मैं बस से ही आ जाऊंगा।” क्योंकि मैं जानता हूं कि गाड़ी का किराया दो हजार से कतई कम नहीं होगा। जबकि मैं एक सौ पचास रुपए में आराम से बस की मदद से वहां तक पहुंच जाऊंगा।

देवेंद्र जी

जीवन में जब आप अपनी शर्तों पर चल रहे या उड़ रहे होते हैं तो इस तरह के जोड़-गुणा-भाग से आपको हजार बार मिलना होता है क्योंकि गणित में थोड़ी सी गलती आपके महीने भर के व्यवस्था को हिलाकर रख देती है। सड़क पर जीवन जीने (की तरह) वाले प्राणियों के लिए इससे नीचे उतरने की कोई सीढ़ी भी नहीं बचती।

खैर, मेरे लाख मना करने के बावजूद वह कार आती है और मुझे सीधे भरतपुर छोड़कर ही दम लेती है। हल्की सी बुंदा-बांदी और शाम की सुंदरता के बीच भरतपुर में (आयोरा गेस्ट हाउस) पर यह हमारी पहली मुलाकात है जो सालों से पूरी ही नहीं हो पा रही थी। उन्होंने रात का खाना खाने के बाद जो कमरा न. 104 मुझे रुकने के लिए दिया है वह इतना अपना और याराना है कि पूछिए ही मत। उसे लिखा जाना बेईमानी होगी। उसे जी कर ही जाना जा सकता है।

विदेशी पर्यटकों के साथ देवेंद्र जी

एक गहरी नींद के बाद वह सुबह चाय पर मिलते हैं। टोकरी भर बातें होती हैं। वह सब जो सालों से होने को बची रह गई थी। खाने तक लौट आने का वादा लेकर मैं अब फतेहपुरी के लिए निकल गया। तय समय तक फतेहपुर सीकरी से नान खटाई और कई किस्से अपने कंधे पर समेटे मैं आयोरा लौट आता हूं। फिर खाना खाने के बाद हम शाम में शहर को घूमने का मन बनाकर कुछ वक्त के लिए अपनी-अपनी दुनिया में मशगूल हो जाते हैं।

शाम को लोहागढ़ फोर्ट, भरतपुर म्यूजियम, दीग, लक्ष्मण मंदिर, गंगा मंदिर और अप्रवासी चिड़ियों के लिए विश्व प्रसिध्द कोलादेओ नेशनल पार्क का भ्रमण कर आते हैं। साथ में वहां के अतीत और स्थापत्य कला को लेकर देवेन्द्र जी की समझ सुनते ही बनती है।

भरतपुर म्यूजियम के परिसर में मैं

दिल्ली के लिए रवाना होते हुए मैं उन्हें हाथ हिलाते हुए कई-कई बार सोचता हूं कि क्यों? आखिर कोई कैसे बिना किसी स्वार्थ के किसी को इतना प्यार दे सकता है। जबकि मैं तो देवेन्द्र जी के किसी काम नहीं आ सकता। मैं उनकी कोई मदद नहीं कर सकता और ना ही कभी किया है। फिर आखिर क्या चीज है जो उन्होंने इतनी बार मुझे बुलाया और जाने पर इतना प्यार दिया कि मैं अभिभूत हूं। समेट ही नहीं पा रहा हूं। तर्कों से खुद को समझाना चाह रहा हूं। कोई ऊंची दीवार खड़ी कर लेना चाहता हूं ताकि शहरों में रहते हुए सिमटकर वन बीएच के फ्लैट से भी सौ गुणा छोटे हो चुके मन को शर्मिंदा होने से बचा सकूं।

भरतपुर म्यूजियम की एक और तस्वीर

मगर मैं दिल्ली लौट रहा हूं। यह सोचते हुए कि हमारे पास समय ही कहां बचता है किसी के लिए कुछ करने का। शहर का जीवन ही ऐसा है। हम भी तो कितने प्यार से बात करते हैं। सभ्यता और व्यवहार तो हम ही सिखाते हैं। मगर इतने सारे तर्कों के बावजूद मैं खुद को डूब जाने से बचा नहीं पा रहा। आप कितनी बार डूबे हैं। अगर एक भी बार नहीं तो खुद को पहले बैठकर कहीं मन के आईने में अच्छे से देखिए। यह जरूरी है। खैर, आप कब जा रहे हैं IORA और देवेन्द्र जी से मिलने, भरतपुर!


भरतपुर के इस बहुत ही सुंदर से कोने के बारे में हमें लिख भेजा है दीपक यात्री ने। दीपक एक पत्रकार और मूक अभिनय कलाकार हैं। अपने नाटकों और प्रस्तुतियों के साथ दीपक देश भर में भ्रमण करते रहते हैं। साथ ही इनको अलग-अलग जगहों के व्यंजनों और पकवानों को चखते रहने का भी खासा शौक है। क्योंकि इनका मानना है कि किसी भी जगह का खान-पान इस जगह के लिए आपकी पहचान के नए रास्ते खोलता है। दीपक फोटोग्राफी भी बढ़िया करते हैं।


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