सनातनी अपमान का भीटा

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मित राजपूत, देसी मिजाज के सख्त लौंडे हैं। सख्ती से हमारा मतलब, इनका अपनी तरह के इलाहाबादी अभिजात्यपना से है। इनको इलाहाबाद से बहुत प्रेम है। इनकी फेसबुक प्रोफाइल इलाहाबाद विश्वविद्यालय की फोटुओं से भरी रहती हैं। अभी ये सुना रहे हैं पंचेश्वरों में से एक जागेश्वर की यात्रा-कहानी।


 

मेरे दोस्त अजीत प्रताप सिंह चौहान ने एक दिन मुझसे पंंचेश्वरों; लोधेश्वर, थवईश्वर, तांबेश्वर, जागेश्वर और आधेश्वर में से एक जागेश्वर महादेव के दर्शन करने की इच्छा जताई। शुरुआत में मैंने कुछ आनाकानी की, लेकिन अगले ही पल मैं चलने के लिए हां कर बैठा। एक घंटे के बाद ही हम दुपहिया निकालकर हर हर महादेव कहते हुए जागेश्वर महादेव के दर्शन के लिए निकल पड़े।

खागा से निकल कर हम विजयीपुर के रास्ते जागेश्वर महादेव के धाम जा रहे थे। वास्तव में हम दोनो लोग  बीते तीन-चार महीनों से शोध के सिलसिले में इतने रम गए हैं कि यहां भी जागेश्वर महादेव की ओर बढ़ते समय हममें भक्त कम शोधार्थी और मुसाफिरी का अंदाज ही भरा था।


यह हमारी कोई बड़ी यात्रा नहीं थी, बल्कि यह तो रगड़ती-ठहरती मुसाफिरी थी हमारी, जो रास्ते के पानी से भरे लबालब खेतों का आनन्द भी लेती जा रही थी और कहीं-कहीं ठहर कर गाड़ी रोककर किसी सज्जन से बतियाने और झलने भी लगती थी। वास्तव में यह कोई रोमांचक सफर भी नहीं था जिसमें बड़ी-बड़ी खाइयों से होकर हम गुजर रहे हों। यहां देवदार और चीड़ के वृक्षों की उत्तुंगता भी तो नहीं है और न ही बादलों से घिरे काले, सुनहरे और सफेद पहाड़  हैं। यहां न गर्त है न कगार, इधर झरने भी नहीं हैं और न ही समुद्र की विशालता ही कहीं नज़र आ रही है। इस सफर में रूहानी ठण्ड भी तो नहीं है और न ही यहां सुन्दरवन सा जंगल ही हमें कहीं दिखा। यहां तो सब समतल है, एकदम सपाट। बिल्कुल यथार्थ की तरह।

इस वक्त यहां के मौसम में लड़ाई है। बारिश की आहट है। घाम चटख है। गर्मी की उलझन में जी घबरा रहा है। प्रकृति में भी कोई रोमांस नहीं नजर आ रहा है। काम से भरपूर काममुक्त ओस है, खर हैं, पानी और हवाएं भी। आज इधर प्रकृति बिल्कुल अलग ही मिजाज में है। एकदम चित्रलेखा में वर्णित यथार्थ-प्रकृति की तरह जैसा कि भगवती चरण वर्मा ने अपने उक्त उपन्यास में प्रकृति का वर्णन किया है। प्रकृति अपने वास्तविक स्वरूप में हैं। इसे स्पर्श करके मखमली ओट नहीं मिल रही है, बल्कि यह तो मेरे कोमल हाथों में चुभ सी रही है। पानी और हवाएं मुझे रोमांस से नहीं भर रहे हैं, बल्कि ये तो मन में चिड़चिड़ेपन को और भी बढ़ा रहे हैं।

वास्तव में यहां की प्रकृति तो वही अनुभव दे रही है जो सत्य है। मतलब यह सपाट, समतल इलाका हमें यथार्थ बने रहने के लिए प्रेरित-कम-मजबूर कर रहा है। शायद यही कारण है कि इस इलाके के लोगों में भी सपाटपन और साफगोई यहां की इसी प्रकृति की देन है। वैसे प्रकृति को एक ही भाव में महसूस करने की मेरी और भगवती चरण वर्मा की चिति का कारण यह हो सकता है कि हम दोनो ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हॉलैण्ड हाल छात्रावास के अपने-अपने जमाने के अंतःवासी रहे हैं। वहां प्रकृति से साखी होना लगभग हर अंतःवासी का सौभाग्य भी है।

हम विजयीपुर चौराहे पहुंच गए। वहां से बिना रुके ही हमने दाहिने मुड़कर असोथर रोड धर लिया। इस रास्ते पर कहीं रुकने का मन नहीं किया हमारा। सफ़र कुछ खासा लम्बा भी नहीं है, इसके अलावा रुकने पर उमस अपना चरम छूने लगती है। लिहाजा हम चलते ही गए। अगले ही झटके में हम पौन घण्टे का सफ़र तय करके असोथर कस्बे को क्रॉस करने लगे। इसके बाद शुरू हुआ ऊबड़-खाबड़ भरा रास्ता, जो यूपी की योगी सरकार के सड़कों को गड्ढा-मुक्त कर देने के हवाहवाई अरमान जोकि अनुमान ही था शायद, कड़क तमाचा जड़ रहा है। असोथर की सड़कों से ही दे-लबालब कीचड़ है।

हमारी दुपहिया गाड़ी के टायर उससे ऐसे लदे कि जैसे यूपीए-2 पर भ्रष्टाचार आ चिपका हो और यह सब नियति का खेल मान लिया गया हो बिल्कुल इस कीचड़ की तरह जो हमारी गाड़ी के टायरों में आ लपटा है। लेकिन करते भी क्या गाड़ी तो आगे बढ़नी ही है, जागेश्वर धाम की ओर जाने वाली हमारी भी और भ्रष्टाचार से युक्त सरकार का भी; कल भी और आज भी।

म असोथर से गाजीपुर की सड़क पकड़कर आगे बढ़ने लगे। यहां रास्ते के अगल-बगल मौजूद खेतों में धान रोपा जा रहा है। इधर असोथर क्षेत्र के धान की बेड़ के भी दिलचस्प क़िस्से हैं। पहले तो इधर जो किसान अपनी ब्याड़ लेकर गुजरते हम बड़े अचरज से उन्हे रोकते और उनकी ब्याड़ को हैरानी से निहारने लगते, फिर उसके बारे में चर्चा भी करते। हमारी हैरानी को देखकर वो किसान हमसे ज़्यादा अचरज भरी नज़रों से हमें देखते और पूछते कि ‘भइया कउन गांव के अहिव तुम… कहां रहत हो?, हम पर उनका ये संदेह भरी नज़रों से देखकर सवाल उछालना, हमें वहां से फौरन फुर्र काटने को मज़बूर कर देता और हम बाबा जागेश्वर के धाम के और नजदीक पहुंचते जाते।

प्राचीन आकृतियां
पांच श्वरों में एक जागेश्वर

गाजीपुर से तकरीबन सात किलोमीटर पश्चिम चलने पर हमें बाएं हाथ पर सड़क से सौ मीटर से भी कम दूरी पर ही विराजमान दिखे जागेश्वर महादेव। पीले रंग का भव्य शिवाला। शिवाले के द्वार पर टंगीं सैकड़ों घण्टियां और उन घण्टियों पर टिकीं हज़ारों भक्तों की मिन्नतों की गूंज हमें शान्ति स्वर में साफ सुनाई पड़ने लगी। हमने अपनी गाड़ी खड़ी की और कुछ देर रुककर मन्दिर के पास में लगे हैंडपम्प से हाथ-मुंह धुला। हैंडपम्प के बगल में खड़े बेला के पेड़ से भगवान शिव को अर्पण करने के लिए कुछ फूल चुने। मन्दिर के बाहर एक उसके ठीक सामने और दूसरी उसके बिल्कुल बगल में नारियल और प्रसाद की दो दुकाने हैं। मेरी किताब ‘चंपारण सत्याग्रह का गणेश’ में मेरे सह-लेखक अजीत भइया ने शिवालय के बगल वाली दुकान से ही प्रसाद और नारियल ख़रीदा क्योंकि उसका विक्रेता एक नौजवान लड़का है। अजीत भइया को मैने अक्सर नौजवान कमासुतों से ही खरीदारी करते देखा है।

खैर, हम दोनो ने जागेश्वर महादेव के अद्भुत शिवालय में प्रवेश किया। नारियल तोड़कर उसके जल से शिवलिंग का हमने अभिषेक किया और फिर क्रमशः रूद्र-सूक्तम और शिवाष्टक का पाठ करके महा-मृत्युञ्जय मन्त्र का उच्चारण करते हुये वहीं आसन जमाकर विराज गये। हमने करीब-करीब चालीस मिनट का समय उस शिवालय के भीतर ही बिताया। शिवालय के भीतर मंत्रों के जाप से निर्गत महानाद जोकि हमारे ही उच्चारण से हुआ था, हमें सुनकर आध्यात्मिकता का बोध हो रहा है। यह नाद वास्तव में शिवालय की बनावट और उसके गुम्बद की कारीगरी की वैज्ञानिकता का कमाल था, अद्भुत था, आनन्ददायी था, शक्तिदाता था।

असोथर के राजा दुनिपत महाराज का दुर्लभ चित्र
राजा असोथर के यहां

जागेश्वर महादेव के दर्शन करके हम वापस असोथर आये। असोथर महाभारत-कालीन अश्वस्थामा की प्रचीन नगरी है। हम यहां असोथर के राजा के महल पहुंचे। आज उनके महल में फिलहाल कोई नहीं था। पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि राजा असोथर के वर्तमान वारिस राजा विश्वेन्द्र पाल सिंह आज कानपुर चले गए हैं। लेकिन हम कुछ देर वहीं रुककर महल की भव्यता निहारने लगे, तभी एक सज्जन वहां पधारे और हमसे हमारे आने का कारण जाना। हमने उन्हे अपना परिचय देते हुए राजा से मिलने की इच्छा जताई। उस भद्र व्यक्ति ने खेद प्रकट करते हुए हमें यह बताया कि राजा साहब तो आज कानपुर में हैं लेकिन कुंवर साहब अपनी हवेली में आज मौजूद हैं।

हमने फौरन ही उस जन से कुंवर तक हमारा संदेशा देने को कहा। अंत में हम राजकुंवर मनोज सिंह के साथ उनकी हवेली के भीतर थे। कुंवर मनोज सिंह के साथ अजीत भइया और मैने घंटे भर बातचीत की। इस बातचीत में उन्होनें असोथर के राजा और अपने पूर्वजों राजा दुनियापत महाराज से लेकर राजा लक्ष्मण प्रसाद तक की ढेरों बातें हमसे साझा की। फिर उसी बीच कुंवर ने हमें जलपान कराया और अपना महल दिखाने लगे।

कुंवर मनोज सिंह हमें बेहद तेजतर्रार और नेक दिल वाले इंसान लगे। वो हमसे फर्राटेदार अंग्रेजी में बात कर रहे थे। उन्होने अपने सभी पूर्वजों की तस्वीरें हमें दिखलाईं और महल के भीतर मौजूद पुराने मन्दिर और कूप के दर्शन भी कराये। राजा असोथर के इस महल से गाजीपुर तक की सुरंग भी महल में मौजूद है। करीब-करीब दो घण्टे से ऊपर का वक्त हमने राजा असोथर के यहां बिताया और फिर हम वापस होने लगे। असोथर से निकलने के बाद दोपहर ढल चुकी थी। सूरज की तपन का तीखापन भी पहले से कमतर हो आया था। लेकिन यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि उमस और फसफसापन भी कुछ कम हुआ था।

हम विजयीपुर की तरफ वापस बढ़ चले। रास्ते में कुछ दूर निकलने के बाद बाईं तरफ एक पुराना पक्के जगत का कुआं दिखाई पड़ा। वहां पर कुछ लाल रंग की झण्डियां भी नजर आ रही थीं। कुएं की बाट मन को इतना मोह रही थी कि हमसे रहा न गया। हम रुके और रुककर कुएं को झांकने लगे। आश्चर्य तो यह देखकर था कि चार हाथ नीचे ही कुँए में लबालब पानी भरा है। कुएं के पास की मिट्टी गीली थी। उस इलाके में जगह-जगह ढेरों गहरे बिल बने हुए थे। अजीत भइया ने मुझे बताया कि ये ज़हरीले साँपों के बिल हैं, इसलिए यहां देर तलक रुकना खतरा भरा है। मैंने अजीत भइया की बात मानकर तत्काल वहां से चलने को कहा। हम जैसे ही वहां से निकले मैने पीछे मुड़कर देखा तो दो सांप एक साथ तेजी से ठीक उसी जगह पर रेंगते नज़र आये जहां पर अभी- अभी हम खड़े थे। मैं एकदम से कांप उठा और सोचने लगा कि अगर एक मिनट पहले हम वहां से न निकले होते तो क्या होता।

पुरातत्व विभाग की निकाली हुई मूर्तियां
सनातनी अपमान का भीटा

कुछ दूर और चलने के बाद यानी असोथर से देखें तो तकरीबन 67 किलोमीटर आगे विजयीपुर की ओर बढ़ने पर हमें पता चला कि यहां एक बड़ा पुराना भीटा है और उससे हजारों साल पुरानी मूर्तियां निकलती है। यह जानकर निश्चय ही तत्काल हम तीनों का मन उस भीटे की ओर मुड़ने का हो चला। मेरा, अजीत भइया का और हमारी हीरो- पैशन का। हम दोनों को लेकर पैशन उस भीटें की ओर दाहिने हाथ मुड़ पड़ी।
विजयीपुर रोड से दाहिने हाथ अन्दर घुसने पर लगभग 34 किलोमीटर अन्दर जाने पर पुर बुजुर्ग ग्रामसभा के अंतर्गत बाईं ओर एक बहुत बड़ा करीब 10 से 12 एकड़ में फैला हुआ विशाल टीला अपना सीना चौड़ा किए हुए खड़ा है। यह ‘ससुर खदेरी नं. 2’ नदी के किनारे बसा हुआ एक बहुत बड़ा भीटा है। अच्छे डामर (तारकोल) की सड़क उस भीटे के मध्य में ऊपर बने हुए एक मन्दिर तक जाती है। हम इसी सड़क के सहारे टीले के बीचोबीच पहुंचे।

वहां पहुंचते ही बड़ी फुर्ती के साथ हम दोनों ने ही सबसे पहले मन्दिर के बाएं हाथ पर भगवान श्रीहरि विष्णु के सर्वावतार वाली एक भव्य मूर्ति को देखा। यद्यपि मूर्ति इतनी भव्य थी कि उसकी आभा को देख कोई भी इस ओर खिंचा चला आए, लेकिन वह खण्डित मूर्ति थी जिसका सिर और शरीर के मध्य भाग का पूरा हिस्सा नदारद था। भगवान विष्णु के एक-एक करके सभी अवतारों का व्यक्तिगत खण्डन उस मूर्ति में साफ देखा जा सकता है। इसी के साथ मूर्ति की कारीगरी के बारे में कुछ कहना मतलब कला का अपमान करने जैसा है मेरे लिए। मुझे तो अभी भी उस मूर्ति के आधार में बनी सर्पगांठ हैरान कर रही है। अब तक ऐसी बेजोड़ कारीगरी नहीं देखी थी मैने और न ही अजीत भइया ने।
टीले के मध्य में एक मन्दिर बना है जो आधुनिक है। लेकिन इसके गर्भग्रह में विराजे शिवलिंग की मूर्ति अपने ही समय की है। वहां तीन सन्त मौजूद थे। मैने उनसे उनके ताम्रपात्र में भरे जल को पीने की इच्छा जतायी। जल ग्रहण करने के बादे हमने उन साधुओं से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि यह धाम आज फिलहाल रहिमालेश्वर (रहिमल बाबा) धाम के नाम से प्रचलित है, लेकिन इसके अतीत के बारे में उन्हें कुछ भी नहीं पता था।

घंटों बातचीत के बाद उन सन्तों से हमें जो पता चला वह यह है कि यहां पौधा रोपने के लिए भीटे की कुछ मिट्टी हटाने मात्र से ही यहां वाकई पुरानी-पुरानी मूर्तियां निकल आती हैं। मतलब इस टीले पर जहां पर भी खुदाई की जा रही है वहां पर से कोई न कोई प्राचीन छोटी-बड़ी मूर्ति निकल आ रही है। वैसे भी इस भीटे को देखकर ही कोई भी आम जन इसके पुरातन का अन्दाजा आसानी से लगा लेगा। यह सब जानकर और वहां धरी हजारों खण्डित मूर्तियों और भग्नावशेषों को देखकर हम दोनो चकित ही खड़े रहे। पहली बार एक साथ एक ही स्तान पर इतनी ज्यादा संख्या में खण्डित मूर्तियां हम दोनों ने ही पहली दफा अपनी-अपनी नंगी आंखों से देखा था। वास्तव में हम सन्न थे और हारे हुए से भी।

उपेक्षा की शिकार ऐतिहासिक मूर्तियां

उन साधुओं में से एक ने हमें दिखाया कि मन्दिर की बायीं दीवार के एकदम बाट (आधार) पर जहां से शिवलिंग पर जल चढ़ाने के वह निर्गत होता है, एक पत्थर था जोकि उसके बचपन में एकदम छोटा सा ही था। लेकिन आज वह कच्छप के आकार में आधा बाहर निकला हुआ है जोकि धीरे- धीरे इस आकार में आया है। हकीकत में मैने भी इस पत्थर को देखा और उसमें कच्छप के पैरों के स्पष्ट आकारों को भी।
इस जगह का वर्णन कैसे करूं। समझ में नहीं आ रहा है कि यहां की शान्ति का बखान करूं कि यहां के तालाबों और मन्दिर के पीछे से गुजरती ससुर खदेरी नदी के कलरव का। यहां पीपल के तमाम वृक्ष हैं और खूब हरियाली भी। मन्दिर में खड़े होकर चारों दिशाओं में किसी भी तरफ दृष्टिपात कीजिए विस्तार ही विस्तार नज़र आ रहा है जो महानता का स्पष्ट एहसास कराती है। काले-काले पत्थरों की टूटी हुई दिखाई दे रही मूर्तियों के भग्न गूढ़ता का मर्म बताने का प्रयास कर रहे हैं और भयभीत भी कर रहे हैं। यह मंदिर लगभग 1000 वर्ष से भी पुराना है।

अब तक लगभग शाम ढलने लगी थी और उसी के साथ हमारा मन भी। अब हम अपने इतिहास, धर्म और संस्कृति की इतनी क्रूर उपेक्षा के प्रतीकों के चश्मदीद हो चुके हैं। हम अपने पीछे जिस भीटे को छोड़कर चले आ रहे हैं अब दोबारा इसे देखने का मन नहीं हो रहा है। मैं कोसता हूं खुद को कि आखिर कैसे हमारी हीरो-पैशन उस ओर उत्साह से मुड़ चली थी। देखो न, अब तो ये भी अपना पैशन खोकर कैसे हारी और थकी हुई चल रही है। यह जो भीटा अभी तक हमें हैरान कर रहा था अब हारा हुआ महसूस करा रहा है मुझे। यह तो वास्तव में सनातनी अपमान का भीटा सा प्रतीत हो रहा है अब मुझे।

हम विजयीपुर कब पार कर गये पता भी नहीं चला। अब तो सभी मौन हैं- प्रकृति, उमस, हवा, अजीत भइया, मैं और निर्जीव हमारी हीरो-पैशन।

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