जामा मस्जिद के चारों ओर का इलाका है खाना-प्रेमी लोगों के लिए जन्नत

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जामा मस्जिद भारत की सबसे पुरानी और बड़ी मस्जिदों में से एक है। ये जगह आपको हमेशा लोगों से खचाखच से भरी मिलेगी पर फिर भी यहां आपको अलग सा सुकून महसूस होगा। जमा मस्जिद बहुत ही खूबसूरत है और अपने आस-पास कई रंगों को समेटे हुए है। ये रंग संस्कृति के हैं, विचारों के हैं, अलहदा किस्म के खानों के हैं। ऐसी तमाम दूकानों की भरमार है, जहां ताउम्र याद रह सकने वाला लाजवाब खाना मिलता है। हमने उन्हीं सबके बीच में से कुछ तलाशा है आपके लिए, पढ़िए, खाइए, खिलाइए। आपको भी कोई छुपा हुआ व्यंजन वहां नजर आता है तो हमें जरूर बताइएगा।

निहारी

निहार का अर्थ होता है जिसे निहार (ब्रश करने के तुरंत बाद) खाया जाए। निहारी एक नॉनवेज डिश है। इसके लिए मटन को रात भर पकाया जाता है और सुबह खमीरी रोटियों के साथ परोसा जाता है। तमाम जानकारियों के मुताबिक इस खाने को ईजाद किया था, अवध के नवाब आसफुद्दौला के खानसामों ने। नवाब ने लोगों को नौकरी देने के लिए रात भर मटन पकाने का काम दिया। जब सुबह मीट अच्छे से पक कर नरम हो जाता था तो फजर (अलसुबह) की नमाज के बाद लोगों को परोसा जाता था।

फजर की नमाज और निहारी का नाश्ता

निहारी नाम से भले थोड़ा रॉयल लगता है पर ये आम जनता का खाना है। निहारी में बहुत ज्यादा प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट होता है। इससे उस वक्त के मजदूरों और सैनिक वर्ग के लोगों को दिन भर काम करने की ताकत मिलती थी। अब के जमाने में लोगों को इतनी सुबह उठने की आदत नहीं रही और न ही इतनी मेहनत करने की जद्दोजहद, इसलिए कई दूकानों पर अब ये शाम को भी मिलता है।

पाया

पाया का मतलब होता है पैर। मटन और बफ/बीफ के पैर वाले हिस्से को खूब सारे मसालों के साथ तरीदार बनाया जाता है। ये खाना काफी गर्म होता है और सर्दियों में काफी प्रचलित है। वैसे तो ये डिश मध्य एशिया से आई है लेकिन भारतीय मुस्लमानों के बीच भी खासी मशहूर है। ईद में इसे बड़े चाव से खाया जाता है। मुस्लिम कॉम्युनिटी के साथ ही सभी मांसाहारियों के लिए पाया एक दिलअजीज डिश है। इसमें बहुत ज्यादा मात्रा में प्याज, अदरक और लहसुन का इस्तेमाल किया जाता है।

जामा मस्जिद का मशहूर पाया

वेजिटेरियन न हों परेशान

ये सब पढ़कर वेजिटेरियन लोग दुःखी न हों। आपके लिए भी यहां बहुत कुछ मिल जाएगा, जो समृद्ध नॉन वेज  खानों को सीधी टक्कर देगा। और एक वेजिटेरियन के जामा मस्जिद आने के आपके फैसले पर अफसोस करने से बचा लेगा।

काली जलेबी

नाम से अजीब लग सकती है और कुछ लोगों को देखने में भी। नाम काला इसलिए है क्योंकि ये झक्क काली सी दिखती है। ये खोए से बनाई जाती है और गरम घी के कड़ाहे में जाते ही काली हो जाती है। खाने में इसका स्वाद जलेबी और गुलाबजमुन का फ्यूजन लगता है। यही असली मजा है, स्वाद का ये कॉकटेल। देखने में बिल्कुल अलग और खाने में लाजवाब। ये जलेबी मूलतः मध्यप्रदेश के बुरहानपुर की है, जहां इसे मावा जलेबी नाम से पुकारा जाता है।

पुरानी दिल्ली की काली जलेबी

शीरमाल

शीरमाल एक तरह की मीठी रोटी है, जो मैदा, मेवे, जाफरान, देसी घी और दूध से मिलाकर बनती है। जितना ये देखने में दिलचस्प है, उतना ही खाने में भी स्वादिष्ट है। इससे से ज्यादा लुभावनी है शीरमाल की कहानी। जानाशीन अली हुसैन साल 1830 में नवाब नसरुद्दीन के खानसामा थे। एक दिन नवाब ने उनसे कहा कि हिंदुओं के नजराने में कई चीजें होती हैं, तुम नया क्या लेकर आओगे? नवाब की बात सुनने के बाद जानाशीन अली हुसैन ने ईरान से एक तंदूर मंगाया। यह भारत के इतिहास में पहला तंदूरी आइटम था।

इसका नाम बाकरखानी (बड़ी गोल रोटी) रखा गया। इसे मैदा, मेवे, जाफरान, देसी घी और दूध से मिलाकर बनाया गया था। इस तरह अलग-अलग 8-10 रोटियां बनाकर नवाब के सामने पेश की गईं। नवाब एक-एक टुकड़ा तोड़कर चखते जा रहे थे। जब उन्होंने बाकरखानी को तोड़ा तो उसका ऐसा आकार नजर आया कि देखते ही बोल पड़े, ‘इसे ही बनाओ’। उनके चीरने के कारण इसे ‘चीरमाल’ कहा जाने लगा, जो बाद में ‘शीरमाल’ हो गया।

दूध और घी में लिपटा शीरमाल

ये सारी डिशेज तो ट्रेलर मात्र हैं, आप खुद जाइए जामा मस्जिद वाले इलाके में। और अपनी लबाबदार-लजीज यात्रा का जिक्र हमें लिख भेजिए।

 


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