वो मंदिर, जहां का पानी पीकर ठीक हो गया था औरंगजेब का सेनापति

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मध्य प्रदेश हमारे देश का वह भाग है,जहां ऐतिहासिक,धार्मिक, प्राचीन एवं आधुनिक महत्त्व की ऐसी चीज देखने को मिलती हैं कि एक बार वहां जाने के बाद कोई दोबारा न जाना चाहे,ऐसा हो ही नहीं सकता। फिर चाहे वो जबलपुर के आस पास के स्थान हों या खजुराहो के क्षेत्र में फैले भिन्न मंदिर हों। वहां दूर दूर तक फैले हरे भरे खेत यूं ही मन को मोह लेते हैं। यहां के लोगों की आस्था और विश्वास खोखले नहीं होते। कहते है कि यदि आप कुछ पाना चाहते है तो आपको अपने पाने की उत्कट इच्छा पर विश्वास होना चाहिए,तभी वो इच्छा पूरी हो पाती है।

खजुराहो से कोई 95 किलोमीटर दूर स्थित है जटाशंकर। भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में दिल्लारी गांव का वार्ड नंबर 5 है जटाशंकर। धार्मिक और पर्यटन दृष्टि से इस स्थान का बहुत महत्व है और दूर दूर से यहां लोग दर्शन के लिए आते हैं। जटाशंकर पहुंचने के मुख्य साधन प्राइवेट कार और बस हैं। आठ जिलों से बस का कनेक्शन है, जिसमें छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, दमोह और सागर मुख्य हैं।

जटाशंकर स्थान की मुख्य विशेषता यह है कि यहां तीन जल कुण्ड हैं, जिसमें एक ठन्डे पानी का जलकुंड है और दो गर्म पानी के जलकुंड हैं। इन जलकुंड में पानी कहां से आता है, आज तक पता नहीं चल सका है। इनके जल की विशेषता यह है कि इनका जल कभी गन्दा नहीं होता और इसमें ऐसे खनिज पदार्थ मिले हुए हैं कि इसका पानी पीने तथा इसमें स्नान करने से त्वचा संबंधित रोग ठीक हो जाते हैं। इसका प्रमाण न केवल इतिहास में मिलता है वरन वहां आये रोगी स्वयं इसके प्रमाण हैं। कहा जाता है कि यहां के जल की इस विशेषता का पता औरंगजेब के समय में चला था। जब औरंगजेब मंदिर तोड़ते हुए आया तो उसने जटाशंकर के पास ही पड़ाव डाला था। उसके सेनापति को सफेद दाग रोग था, वह भटकते हुए इस जलाशय के पास पहुंचा और इसका पानी पीकर तथा स्नान करने से वह रोगमुक्त हो गया । जटाशंकर के आस पास चौरासी बावड़ी हैं जिनमे से एक है मोनी सैया। यहां का प्राकृतिक सौन्दर्य विशेष रूप से दर्शनीय है।

जटाशंकर से जुडी अनेक किंंवदंतियां प्रचलित हैं। यहां के मैनेजर पद पर आसीन श्री जय प्रकाश खरे ने बताया कि कहा जाता है कि भगवान शिव ने जटेश्वर नामक राक्षस का वध करके इसी स्थान पर समाधि ली थी और जब उन्हें खोजा गया तो उनका शिर भाग जिसमे चंद्रमा भी विद्यमान है, अपने आप ही ऊपर आ गया था और आज तक ये वहां स्थापित है। अमावस्या की रात को यहां बहुत बड़ा मेला लगता है और शंकर जी के शीश पर स्थित चन्द्र दर्शन के लिए लाखों की तादाद में दर्शनार्थी यहां आते हैं क्योंकि अमावस्या की काली रात को चंद्रमा आकाश पर नहीं दिखता पर जटाशंकर में दिखता है ।

यूं तो जटाशंकर सभी दिन दर्शन के लिए खुला रहता है और भक्त सुबह 5 बजे से दोपहर 12 बजे तक दर्शन कर सकते हैं और आधे घंटे के लिए भोग लगाने के लिए पट बंद हो जाते हैं फिर दोपहर 12.30 बजे से रात आठ बजे तक दर्शन किये जा सकते हैं । भोग में यहां कलाकंद लगाया जाता है और कभी राजभोग में खीर और विभिन्न प्रकार के फल भी लगाये जाते हैं । यहां आरती का समय होली से दीपावली तक सुबह 6 से 7 बजे तक और दीपावली से होली तक 7 से 8 बजे तक रहता है। यहां रोज लगभग पंद्रह सौ से दो हजार दर्शनार्थी आते हैं। वार्षिक महोत्सव के रूप में मनाये जाने वाले महाशिवरात्रि और सोमवती अमावस्या के अवसर पर एक लाख से भी अधिक श्रद्धालु आते हैं। इन मौकों पर प्रशासन की तरफ से पुख्ता इंतजाम किये जाते हैं । इस स्थान को पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हुए मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग ने सात करोड़ की सहयोग राशि देकर और भी अधिक खूबसूरत और सुरक्षित बना दिया है।

जटाशंकर में एक ऐसा बैल भी है जिसके तीन सींग और तीन नेत्र हैं, यहां आने से पहले ये बैल क्रोध में आकर उत्पात मचाता था पर अब शांत रहता है, आस्था है कि इसका संबंध भी शिव जी से ही है। लोगों का विश्वास इतना प्रगाढ़ है कि यहां पीढ़ियों से लोग जुड़े हैं। 40 से 50 वर्ष पुराने भक्त भी यहां आते हैं। बाहर से भी आने वाले भक्तों की संख्या देख कर यहां भंडारे की भी व्यवस्था है, जिसका प्रबंध प्रबंधन समिति द्वारा किया जाता है। इस भंडारे की विशेषता यह है कि 20 रुपये का टोकन लेकर व्यक्ति भरपेट खाना खा सकता है।

जटाशंकर में ही कभी कभी एक ऐसी पानी की धारा भी निकलती है, जिसे अश्रुधारा कहा जाता है और जिसका जल आंखों पर लगाने से छोटी बीमारी या कमजोर नजर (नंबर बहुत अधिक न हो) ठीक हो जाती है। जटाशंकर में ध्यानमग्न शंकर भगवान की 45 फीट ऊंची मूर्ति भी है।

पहले जटाशंकर में चट्टान को काटकर सीढियां बनी थीं अब 366 पक्की सीढियां हैं और इन सीढ़ियों को चढ़ ऊपर जाकर राधा कृष्ण का बहुत सुन्दर मंदिर है, जिसे कुख्यात डाकू मूरत सिंह ने बनवाया था। कहा जाता है कि जटाशंकर की प्रसिद्धि के पीछे इस डाकू द्वारा आयोजित रामलीला का बड़ा हाथ था । सन 1966 में डाकू ने अयोध्या से रामलीला बुलवाई थी । इसे देखने के लिए दूर दूर से लोग आये थे और बड़ी भारी भीड़ थी। पुलिस को पता था कि सीता स्वयंवर में पैर पुजायी की रस्म के समय डाकू आएगा इसलिए पुलिस सादे सिविल कपड़ों में घेरा बंदी किये हुई थी। इसी बीच केवल दस सेकंड के लिए लाइट गयी और डाकू मूरत सिंह सीताजी के हाथ में फूल माला देकर चला भी गया और पुलिस कुछ न कर सकी । चूंकि वहां लाखों की संख्या में भक्त मौजूद थे तो जटाशंकर पूरे मध्यप्रदेश और अन्य आस पास के स्थानों पर भी प्रसिद्ध हो गया ।

इस स्थान की यात्रा करने बड़े से बड़े और छोटे से छोटे पद पर बैठे लोग आते हैं। प्रकृति के सौन्दर्य का आनंद भी लेते हैं और पावन तीर्थ का लाभ भी उठाते हैं। इस स्थान पर न कोई बड़ा है न छोटा, ईश्वर के घर में सभी समान हैं।


मध्य प्रदेश के इस कम चर्चित लेकिन अति खूबसूरत स्थान के बारे में ये जानकारियां हमें लिख भेजी है डॉ. सीमा वर्मा ने। सीमा लखनऊ से हैं। खूबसूरत कवयित्री हैं। इनकी कविताओं में मानवीय संबंधों की सरसता झलकती है। देश-दुनिया के मामलों में काफी चैतन्य रहती हैं। तमाम मुद्दों पर बेबाक राय देती हैं। इतने प्यार से बात करती हैं, मानो फूल झड़ रहे हों। लोक संस्कृतियों में जान बसती है। 


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