बस्तर 9: सुकमा वाले रास्ते में जीरम हत्याकांड से गुजरता वर्तमान और इतिहास

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सुकमा, ये नाम पहली बार तब सुना था। जब 2013 में अचानक से घरों की टीवी स्क्रीन्स पर एक ब्रेकिंग न्यूज फ्लैश करती है। एक बहुत ही बड़ा नक्सली हमला हुआ है। जिसमें छत्तीसगढ़ कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को निशाना बनाया गया है। लोग अपना काम छोड़कर टीवी से चिपक गए थे। थोड़ी ही देर में अपडेट आता है। कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा समेत 28 लोग मारे गए। हमले में गंभीर रूप से घायल वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ला की भी इलाज के दौरान मौत हो गई थी।

जीरम घाटी- एक दर्दनाक इतिहास

सुकमा! नाम से ही दिमाग में एक डर सा बैठ गया था। बाद में अखबारों, पत्रिकाओं में इस हमले की वीभत्सता की डिटेल पढ़ती तो जी खट्ठा हो जाता। कभी सोचा भी नहीं था कि जिस सड़क ये खूनी खेल खेला गया था, वहां से मैं भी गुजरूंगी।

हमारी गाड़ी जीरम घाटी से गुजर रही थी। गोल-गोल घूमते रास्ते और रोशनी भी सही से न पहुंच पाए, ऐसे सघन जंगल। एक तरफ पहाड़ी चट्टान और दूसरी तरफ गहरी होती घाटी। बीच में पतली सी वनवे सड़क। जिसको मरम्मत करके अब चिकना बना दिया गया है। मैं उस जगह के माजी से अंजान हवाओं से बातें कर रही थी। अचानक एकांत को तोड़ते हुए गाड़ी का ड्राइवर बोला। मैडम, ये वही जगह है जहां गोलियां चलीं थीं।

हम भी यहां से गुजरने वाले थे उस दिन। भाग्य अच्छा था कि काम की वजह से रुक गए। आप जो ये पेड़ देख रही हैं। इसी की आड़ लिए हुए सैकड़ों औरतें खड़ी थीं। उन सबके हाथों में कोई न कोई हथियार था। कइयों ने रायफल ले रखी थी, जिनको बंदूकें नहीं मिल पाई थीं। वे अपने घर से लोहे के गंड़ासे, चाकू लेकर आई थीं।

मतलब आप समझिए। आदमी से ज्यादा औरतें थीं उस वक्त। बड़े-बड़े पेड़ रास्ते में गिरा दिए थे ताकि कोई आगे न जा सके। सबके सिर पर जैसे बस काल सवार था। गांव वाले एक रिश्तेदार ने हमको बताया कि जो मर गया था, उसको भी चाकू से मार रहे थे। चारों तरफ बस खून पसरा था।

वो बताए जा रहे थे और मैं हक्की-बक्की सुनी जा रही थी। साफ-सुथरा आसमान, सुंगध लिए माहौल, अब आंखों के सामने से सब धुंधला हो रहा था। इससे पहले मैंने हमले के बारे में जो पढ़-सुन रखा था। उसमें ड्राइवर की आवाज किसी वॉयसओवर की तरह काम कर रही थी। उस हमले की कल्पना करना ही सुन्न कर दे रहा था।

मैं सुन्न हो गई

गाड़ी अपनी गति से आगे बढ़ रही थी और ड्राइवर की किस्सागोई भी। आगे उसने बताया कि लोगों में किस कदर पुलिस और सरकार के खिलाफ गुस्सा था। लोग निर्दोष आदिवासी औरतों और बच्चों की हत्या पर आगबबूले थे। फिर एक क्रांति की आग ने इतना आक्रामक और निष्ठुर रूप ले लिया। ये सब इतना भावुक कर देने वाला था कि मैं अपनी चेतना धीरे-धीरे खो रही थी। मेरे तर्क वाष्प बनकर उड़ रहे थे।

मैं बह रही थी, जिस भी दिशा में ड्राइवर घटना की आपबीती बताता। कांग्रेस नेताओं के काफिले के हमले की बातें सुनकर मुझे नक्सलियों पर गुस्सा आ रहा था। अगले ही पल मारे गए मासूम आदिवासियों के बारे में सोचकर रोना भी।

(सुकमा जिले में हुई घुमक्कड़ी का ब्यौरा यहां पढ़ें)


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