झारखंड: जिसे हम अंग्रेजी में ‘रॉ ब्यूटी’ बोलते हैं, उसी का सबसे सुंदर उदाहरण

क्रांतिकारी बिरसा मुंडा की एक काष्ठ प्रतिकृति

मैं एक दिन दिल्ली में अपने ठीहे पर बैठी थी तो एक दोस्त ने पूछा, अब अगला पड़ाव कहां पर। मैंने जवाब दिया, झारखंड। दोस्त ने उपेक्षित सी मुस्कान के साथ कहा, झारखंड में क्या है घूमने को। मैंने कहा, तभी तो जा रहे हैं। मुझे यकीन था कि झारखंड मुझे चौंकाएगा। हालांकि मुझे भी झारखंड को लेकर कोई बड़ी आशा नहीं थी। यहां दिल्ली में बैठे-बैठे झारखंड के बारे में खबरें पढ़ते हुए बस इतना लगता था कि थोड़ा अस्त-व्यस्त होगा सब वहां, जंगल होगें बड़े खूबसूरत लेकिन वो सब काफी अंदर के इलाकों में होते होंगे, वही गरीबी और अव्यवस्था होगी जैसी कि किसी भी कम विकसित राज्य में होती है।

अपने वही पुराने दो छोटे बैग लेकर मैं रांची पहुंच गई एक रात। रांची रेलवे स्टेशन पर एक दोस्त लेने आया था। आमतौर पर मैं अकेले ही ठौर-ठिकाना ढूंढना पसंद करती हूं लेकिन दिल्ली में बैठकर पढ़ी गई खबरों के मद्देनजर एक फीसद वाला डर था मन में। जब हम स्टेशन के बाहर निकले तो यही कोई साढ़े नौ बज रहा होगा। रात के केवल साढ़े नौ बजे ही रांची की सड़कों पर से यातायात गायब था। दोस्त ने बताया कि ये इस शहर की खूबी भी है, खामी भी। यहां सब बड़ा जल्दी सो जाते हैं। वो मुझे रास्ते में आ रही दूकानों, खास जगहों के बारे में बताता जा रहा था। मैं चुपचाप सुन रही थी। अचानक से मैं बोली, यार रांची तो काफी साफ-सुथरा है, आय मीन पटना की तुलना में तो बहुत बहुत बहुत ही ज्यादा। पसंद आ रही मुझे रांची। मेरे दिमाग में तो अलग ही तस्वीर थी।

‘झारखंड तो सुंदरता का पर्यायवाची है यार!’

अगला दिन मेरा रांची के पास के जलप्रपातों के नाम रहा। पता चला कि यहां आस-पास ही अप्रतिम खूबसूरती से भरे ढेरों जलप्रपात हैं। सबसे पहले जोन्हा फॉल्स पहुंचे। 722 सीढ़ियां उतरकर तो बड़े उत्साह में चले गए लेकिन वापस से 722 सीढ़ियों ने सांस फुला दी। इस जगह पर एक ऊंचे से ढाल पर एक स्थानीय नदी की धारा कटकर गिरती है। बारिश की वजह से पानी में भी तेज बहाव था।

वहां से निकलकर हम हुंडरू फॉल गए। ये तो रांची का सबसे ऊंचा और देश का 34वां सबसे ऊंचा जलप्रपात है। यहां से झारखंड की लाइफलाइन स्वर्णरेखा नदी की एक धारा तेज बहाव के साथ नीचे गिरती है। जोन्हा में तो 722 सीढ़ियां ही थीं, यहां थीं पूरी 745 सीढ़ियां। इतनी सीढ़ियां थकान तो बढ़ा रही थीं लेकिन रास्ते में मिल रहे जामुन, भूजा, चाय-कॉफी-पानी से ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही थी। हुंडरू फॉल रांची शहर से 45 किलोमीटर की दूरी पर है।

हुंडरू फॉल

यहां पर तो एक फोटो पॉइंट बनाया गया है। जहां पर खींचकर तुरंत प्रिंट दे देते हैं तस्वीर का। सेल्फी के इस जमाने में लोग अब भी इस परंपरागत तरीके से फोटो खिंचा रहे थे। यहां अच्छी-खासी भीड़ थी। पत्थरों पर चेतावनियां लिखी थीं कि इस जगह से आगे मत जाइए। लेकिन फिर भी कुछ दुस्साहसी पर्यटक आगे बढ़कर नहा रहे थे। ऐसे लोगों पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

कुछ युवा वहां पर लोकगीत गा-बजा रहे थे। प्रपात की तेज कल-कल आवाज और चारों तरफ फैली एकदम धुली सी हरियाली नीरस से नीरस इंसान का दिल प्रफुल्लित कर दे। मैं राजधानी रांची से इतना पास ही इतनी सारी खूबसूरती देखकर चकित भी थी और खुश भी। मैं खुश थी कि झारखंड के बारे में बनाई गई मेरी धारणाएं एक-एक करके टूट रही हैं। यहां से निकलकर हम दशम जलप्रपात गए। वो भी बहुत खूबसूरत था। हजारों सीढ़ियां चढ़-उतरकर अब कहीं और जाने की हिम्मत न बची थी। और अब शाम हो चली थी। जंगलों में बसी इन जगहों पर जाने की अनुमति अब नहीं थी।

यूपी के पास ताज है, दिल्ली के पास लालकिला, झारखंड के पास?

प्रपात की सीढ़ियों ने कल जो हाइपर एक्सरसाइज करवा दी थी, उसका प्रतिफल हुआ अगली सुबह देर से जगना। सुबह सोने में निकल गए वक्त का प्रायश्चित रांची के ‘मिनी मरीन ड्राइव’ धुर्वा डैम पहुंचकर खत्म हो गया। विशाल जलराशि को हल्के कत्थई रंग के पत्थरों ने क्या खूबसूरती से बांधकर रखा है। पानी रुका भी है, बह भी रहा है कल-कल-कल-कल। जितना आयतन ये डैम घेर रहा है, उतनी दूर की फिजा ही अलग है। रांची का मौसम वैसे ही बड़ा सुहाना सा रहता है। लेकिन डैम के पास की बात ही अलग है। पानी की गाढ़ी नीलिमा के ऊपर आसमान की कुछ-कुछ फिरोजी वितान। और उस पर अनगढ़ से ये पत्थर। बिल्कुल भी शोर शराबा नहीं।

धुर्वा डैम

काफी देर तक वहीं बैठी रही पानी में पैरों को डालकर। जब वक्त काफी गुजर गया और भूख लग आई तो वहां से उठकर मोहराबादी आ गए, चाय-पानी किया। अब यहां से रांची के राज्य संग्रहालय गई। बढ़िया बनाया है सरकार ने। आदिवासी जनजीवन के बारे अलग-अलग मॉडल्स बनाए गए हैं, पारंपरिक चित्रकारी के कई खूबसूरत नमूने हैं। यहां से जब निकले तो शाम होने वाली थी। तुरंत मुड़ गए पतरातू घाटी तरफ। ये रांची शहर से तकरीबन दस-बारह किलोमीटर दूर है। गोल-गोल चिकने रास्तों से होते हुए हम नीचे उतरते जा रहे थे। बादल और सूरज आपस में लुकाछिपी खेल रहे थे। चलते-चलते हम पतरातू डैम के पास पहुंच गए। सूरज अब ढलने को था। आसमान सूरज के बदलते रंगों से रंगीन हो रहा था। इस बदलाव ने एक पल को नई जगह देखने की मेरी चंचलता को शांत कर दिया। मैं चुप सी बैठ गई और पतरातू में उतरते सूरज के साथ चढ़ रहे जादू में डूब गई।

जब वहां से लौट रहे थे, तब तक मुझे रांची और झारखंड से काफी स्नेह हो चुका था। मैंने वहां के दोस्तों से एक बात छेड़ी, यार झारखंड में पर्यटन को काफी उपेक्षित रखा गया है। मतलब मैं यहां आई हूं, चीजें देख रही हूं तो लग रहा है कि दिल्ली या और किसी जगह पर बैठे लोगों के दिमाग में झारखंड की क्या छवि है और असल में झारखंड तो बिल्कुल ही अलहदा है। चलो मैं तो घुमक्कड़ हूं, मुझे पॉपुलर चीजों से फर्क नहीं पड़ता, मुझे घूमना है, मैं घूमूंगी लेकिन आम जनता को आकर्षित करने के लिए झारखंड के पास क्या है? जैसे यूपी के पास ताजमहल है, दिल्ली के पास इंडिया गेट, लालकिला है, राजस्थान के पास रजवाड़े-किले हैं, झारखंड के पास ऐसा एक क्या है जो उसे रिप्रजेंट करे। मतलब झारखंड के पास इतना कुछ है… इतना… फिर भी लोगों की नजरों में झारखंड मतलब उजाड़, बोगस जगह।

जब समझ आया, झारखंड का दिल यहां के आदिवासी ही हैं

हरियाली ही हरियाली

अगले दिन मैं रांची से जमशेदपुर की ओर निकल गई। पास में ही है रांची से, 130 किलोमीटर। ज्यादा से ज्यादा चार घंटे में पहुंच ही जाएंगे। जमशेदपुर के बारे में मैं नेट पर पढ़ रही थी तो घाटशिला नाम की एक जगह सर्च में आई। मैंने वहां की एक दोस्त से पूछा इसके बारे में। उसने बताया कि झारखंड खान है ऐसी खूबसूरत जगहों का। घाटशिला तो तुम घूम ही लेना, चल पहले तुझे यहां का आदिवासी गांव घुमा लाती हूं। तो प्लान बन गया, हम जमशेदपुर से तकरीबन अस्सी से पचासी किलोमीटर दूर डुमरिया ब्लॉक के लखाईडीह नाम के एक गांव में जाने वाले थे। गाड़ी ले ली गई।

शहर से बाहर निकलते ही रास्ते ने अपना रुख बदल लिया। इमारतों की जगह अब दूर तक फैले जंगलों ने ले ली। हमने गाड़ी का एसी बंद करके खिड़कियां खोल लीं। हम चलते चले जा रहे थे, मैं आंखों में झारखंड भरती जा रही थी। रास्ते में ही जादूगोड़ा पड़ा। वही जीके के क्वेश्चन वाला जादूगोड़ा, जहां पर दुनिया का सबसे मंहगा रेडियोएक्टिव पदार्थ यूरेनियम भरा पड़ा है। मैं वहां जाना चाह रही थी, लेकिन वहां जाती तो वो गांव रह जाता। मैंने गांव चुना। अब हम घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर आ गए थे। कसम से बता रही हूं, इतनी हरी-भरी पहाड़ियों को देखकर लग रहा था कि हम हिमालच या उत्तराखंड के किसी हिलस्टेशन पर जा रहे। अब मुझे झारखंड के पर्यटन मंत्रालय पर थोड़ा और गुस्सा आने लगा। इतनी बढ़िया-बढ़िया जगह हैं यहां और किसी को फिक्र ही नहीं।

गांव का नाम: लाखईडीह, जहां हमने थोड़ी देर के लिए ठहर गए

गांव की सीमा अब शुरू हो गई थी। पानी की समस्या घुसते ही नजर आने लगी। एक तलैया में बारिश का गंदला पानी भरा था। औरतें-बच्चे उसी में नहा रहे थे, कपड़े भी उसी में धुल ले रहे थे। आदिवासी गांव में घर इतने खूबसूरत तरीके से बनाए गए थे कि क्या बताऊं। एकदम साफ-सुथरे, चटख रंगों, कांच के टुकड़े से सजे हुए। कुएं से एक औरत पानी निकाल रही थी। आम, अमरूद से लदे हुए ढेरो पेड़ थे। गांव के प्रधान से हमारी मुलाकात हुई, वो हमें अपने घर ले गए। स्वागत के लिए जब उनके घर के सदस्य ने हमें पानी का गिलास दिया तो मेरी आंखें फटी रह गई। एकदम मटमैला, गंदला पानी था। और वो सारे लोग यही पानी पी रहे थे। इसे चूला पानी बोलते हैं। मतलब पहाड़ी चट्टानों से चूकर जो पानी नीचे आ इकट्ठा होता है, वही पानी पीने को ये लोग मजबूर हैं।

कपड़े साधारण से ही थे लोगों के यहां पर। बोली सांथाली थी शायद, ऐसा वहां हिंदी समझ रहे कुछ लोगों ने बताया। मैंने वहां से एक अमरूद तोड़कर खाया। अमरूद कच्चा था, गले के नीचे आकर अटक गया। सांस लेना दूभर हो गया। हमारा बॉटल वाला पानी गाड़ी में ही रह गया था। वहां की एक महिला ने मुझे पानी पीने को दिया। अंततः मुझे वही गंदला पानी पीना पड़ा। जिसकी वजह से अगले दिन मेरा पेट भी खराब हो गया। आते-आते हमने उनमें से हिंदी समझने वाले एक शख्स को देसी तरीके से बनाए जाने वाले बजरी, बालू और कंकरीट वाले पानी शोधक यंत्र के बारे में बताया। हमने उन्हें समझाया कि इससे पानी की मौजूद मिट्टी और कणों जैसी अशुद्धियां तो निकल ही जाएंगी। तो पानी दिखने में भी साफ लगेगा और कुछ हद तक साफ भी हो जाएगा।

वहां से लौटने के वक्त रास्ते में रांची के दोस्तों से किए गए सवाल का जवाब थोड़ा-थोड़ा मुझे खुद भी मिलने लगा। हमने गांव में खाली सी जगह देखी, ये आदिवासियों का मंदिर था। मैंने पूछा कि इसमें कोई भगवान की मूर्ति नहीं है? तो गांव वालों ने बताया कि प्रकृति ही उनके भगवान हैं। वो पहाड़ो और पेड़ों की ही पूजा करते हैं। आदिवासी समाज प्रकृति से इतना प्यार करता है। यही वजह है कि झारखंड इतना ज्यादा खूबसूरत है। पर्यटकों का तांता लगने पर यहां का भी वही हाल होगा जो कि लोकप्रिय हिलस्टेशनों का हाल होता है। धुआं, भीड़, शोर, गंदगी, प्लास्टिक का अंबार।

टाटा नगरी में और भी है बहुत कुछ

जुबिली पार्क का प्रवेश द्वार

गंदा पानी पीने की वजह से एक दिन तो मैं बीमार बिस्तर पर पड़ी रही। अगले दिन नई ऊर्जा के साथ जमशेदपुर शहर घूमा। यहां प्रख्यात जुबली पार्क है, खूबसूरत डिमना झील है, स्वर्णरेखा और खारखाई नदियों का संगम खारखाई है, दलमा वाइल्डलाइफ सैंक्चुरी है, रूसी मोदी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस है। लेकिन जिस नाम से सबसे ज्यादा ये जगह प्रसिद्ध है, टाटा स्टील के लिए। उस परिसर के अंदर जाने के लिए अनुमति पत्र की जरूरत होती, आम प्रवेश यहां पर निषेध है। तो अनुमति लेने भर का वक्त तो था नहीं। बाहर ही बाहर वहां घूम लिए। जमशेदपुर भी काफी व्यवस्थित और विकसित शहर है।

मेरा तो मन कर रहा था, कम से कम एक महीना यहीं रुक जाएं लेकिन हमेशा अपने मन का कहां होता है। वापस लौटना पड़ा। झारखंड किसी शांत और ठंडे हवा के झोंके की तरह यहां दिल्ली के व्यस्त शेड्यूल में सुकून देने का काम कर रहा है। और जब मैं ये सब बैठकर लिख रही हूं तो दिल कर रहा कि उड़कर फिर से झारखंड के जंगलों और पहाड़ों के बीच में पहुंच जाऊं। आह! अपने मन का कहां हर वक्त होता है।

मैं लौटूंगी जल्द, झारखंड!


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4 COMMENTS

  1. मेम मैं झारखण्ड से हीं हूँ। दिल्ली में पत्रकारिता पढ़ रहा हूँ, आपके द्वारा जिक्र किये लगभग हर जगह का अनुभव है। पर पढ़ने के बाद एक नयापन लगा। धन्यवाद झारखण्ड आने के लिये। दिल्ली में बैठकर झारखण्ड की खूबसूरती का अंदाजा लगाना मुश्किल है। दुबारा आना हुआ तो चतरा स्थित भाद्रकाली मंदिर, तामसिंन, हद-हदवा, बक्सा डेम जैसे जगहों पे भी जायेगा। प्राकृति ने क्या खुबसूरत बनाया है।

  2. प्रज्ञा जी बस जादूकोड़ा को जादूगोड़ा और साथ ही डलमा को दलमा सेंचुरी कर दीजिये। बाक़ी बहुत ही शानदार लिखा है। धन्यवाद !

    • बहुत शुक्रिया, ऋषि। हम ठीक कर रहे हैं।

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