कश्मीर 8: कश्मीर जन्नत है क्योंकि यहां के लोगों में भी खूबसूरती की सेंध है

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(हेडिंग से पता चल रहा कि ये इस यात्रा की आठवीं किश्त है, पहले की यात्रा यहां पढ़ें)

ट्रिप के पांचवे दिन हमें श्रीनगर के लिए निकलना था। बहुत सारा प्यार, मेहमान-नवाजी लेकर हम श्रीनगर के लिए निकल पड़े। सड़क पर गाड़ियां इक्का-दुक्का ही चल रही थीं क्योंकि कश्मीर बंद था। कैब वाले ने हमें लाल चौक उतारा। अहले सुबह वहां सीआरपीएफ के जवान और हथियारों के अलावा कुछ नहीं था। हमने होटल बुक किया और पूरा दिन आराम किया क्योंकि शाम में दोस्तों के साथ कंगना के लिए निकलना था।

कंगना में मेरे दोस्त की दोस्त की शादी थी और वो हमें कश्मीरी शादी दिखाना चाहते थे। हमने भी हामी भर दी थी। शाम पांच-छह बजे के आसपास हम सब कंगना के लिए रवाना हुए। श्रीनगर से बाहर निकलते वक्त अचानक से मुझे खांसी हुई, आंखों में जलन हुई। मैं कुछ समझ पाती उससे पहले स्नेहा भी खांसने लगी। गाड़ी में मौजूद दोस्तों ने फौरन गाड़ी का शीशा ऊपर करते हुए बताया कि थोड़ी देर पहले यहां पत्थरबाजी हुई है, जिसके वजह से टियर गैस छोड़ा गया है।

उन्होंने कहा सोचो हमारा क्या होता है, जब कभी, कहीं भी हमारे घरों में टियर गैस फेंक दिया जाता है। सामने वाला ये भी नहीं देखता कि घर में बच्चे होंगे, कोई बीमार हो सकता है। उनके इस बात का हमारे पास कोई जवाब नहीं था। लेकिन दिमाग में ये जरूर चल रहा था कि पुलिस वालों की भी मजबूरी है। मतलब यहां पर हालात को आप सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट के चश्मे से नहीं देख सकते हैं बल्कि बीच में एक और रंग है।

संवाद की कमी

कश्मीर ट्रिप के दौरान एक बात जो मुझे बहुत अच्छे से समझ आई वो ये थी कि भारत-कश्मीर के लोगों के बीच जो सबसे बड़ी खाई है वो है बातचीत ना हो। जैसे यहां का हर कोई कश्मीरियों को गलत नहीं समझता, ठीक वैसे ही हर कश्मीर भारत को अपना दुश्मन नहीं समझता, यहां के लोगों से नफरत नहीं करता। कश्मीर के लोगों से मिलकर ऐसा लगा कि वो उस प्वाइंट पर हैं, जहां एक बार सामने वाला प्यार से हाथ पकड़ ले तो वो बिखर जाए।

खैर, हम कंगना पहुंचे और वहां भी हमारा खासा ख्याल रख गया। मेहमान-नवाजी का तरीका हर जगह एक ही था, बस हैसियत की हिसाब से चीजें बदलती नजर आईं। कश्मीरी दावत के बारे में बता दूं कि यहां पर एक बड़े से थाल में चार लोगों का खाना एक साथ आता है। चार लोग एक थाल में ही खाते हैं। सबसे पहले मेहमानों को भाता पर मटन की कोई ग्रेवी वाली डिश दी जाती है। फिर एक-एक करके वाजवान की कई डिशें परोसी जाती हैं। यहां पर दावत में साग भी परोसा जाता है। इस साग की खासियत है कि उसे भी मटन या चिकन के सूप से तैयार किया जाता है।


दो-तीन घंटे खातिरदारी का लुफ्त उठाने के बाद हम श्रीनगर वापस लौट आए। श्रीनगर वापस लौटते-लौटते 10-11 बजे चुके थे। शाम में पांच बजे के बाद नहीं निकलने वाली सारी हिदायतें बेमानी लग रही थीं। कश्मीर में हमने हर दिन, रात के 11 बजे तक ट्रैवल किया था तो अब सेफ्टी को लेकर मिलने वाली नसीहतों पर शक सा होने लगा था।


कश्मीर की अपनी इस यात्रा के बारे में हमें लिखकर भेज रही हैं भारती द्विवेदी। भारती दिल्ली में पत्रकार हैं। मूलतः बिहार की हैं। इनकी शान में दोस्त लोग इन्हें ‘मनमौजी बिहारन’ कहकर पुकारते हैं। तेजस्वी नयनों की मालकिन हैं, मुंहफट हैं, बेबाक हैं और बहुत ही ज्यादा प्यारी हैं, दरवाजे पर लटके विंडचाइम की माफिक। ये लिखने पर हमें इनकी तरफ से उलाहना आएंगी लेकिन एक अभिनेत्री हैं, तापसी पन्नू। उनकी शक्ल हूबहू भारती से मिलती है।


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