शांति और कला दोनों का आनंद चाहते हैं तो जरूर आएं खजुराहो

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रात आठ बजकर दस मिनट की ट्रेन थी। हम तीनों मतलब रविंदर, वीर बहादुर और मेरे में तय ये हुआ कि सीधा स्टेशन पर मुलाकात होगी। मेरी और रविंदर की मुलाकात केंद्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन के अंदर तय हुई क्योंकि हम दोनों मेट्रो का सफर करके निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुंचते हैं और वीर बहादुर सीधा ऑफिस से ऑटो लेकर आता है।

ट्रेन अपने समय पर चल दी। रविंदर घर से आलू की सब्जी अचार और पूड़ियां बनवा कर लाया था। दबाकर खाया गया। स्वादिष्ट भोजन और ऊपर से घूमने जाने की खुशी। मजा दोगुना हो गया। मथुरा तक यूं ही खाते पीते और मस्ती करते रहे। उसके बाद नींद ने कब अपनी बाहों में समेट लिया पता ही नहीं चला।

खजुराहो जाने को एकदम तैयार

दिल्ली से छोटा पर सफाई में आगे खजुराहो

सुबह  सात बजे ट्रेन खजुराहो पहुंची। खजुराहो स्टेशन छोटा सा है। पर साफ-सफाई और सुंदरता के मामले में दिल्ली से बहुत बड़ा। खजुराहो रेलवे स्टेशन से खजुराहो जहां वेस्टन ग्रुप ऑफ टेम्पल हैं की दूरी 8 किमी है। पहले मैंने यह सोचा था की यहीं स्टेशन पर फ्रेश होकर सीधा घूमने चला जाए। पर मेरे दोनों साथी बोले की रूम ले लिया जाय कहीं। मैंने कहा सोच लो थोड़ी देर। तब तक मैं कुछ फोटो ले लेता हूं।

साफ सुथरा खजुराहो

खैर फोटोग्राफी के बाद भी फैसला कमरा लेने का हुआ। स्टेशन से बाहर निकले भी न थे की एक ऑटो वाले भाई साहब मिल गए। पूछने लगे, चलना है क्या। मैं थोड़ा संकोच में था कि टूरिस्ट्स वाला इलाका है जाने क्या पैसे मांग ले। अभी उस से बात हो ही रही थी कि एक होटल वाला भी आ गया। हमें लगा कोई एजेंट होगा होटल का।

सस्ता, अति सस्ता खजुराहो

खैर ऑटो वाले भाई जिनका नाम शैलेन्द्र था ने तीन जनों के साठ रुपए मांगे आठ किमी की दूरी के। कमाल है यार..इतना सस्ता तो दिल्ली में भी नहीं। ऑटो में हम तीन जनों के अलावा वो होटल वाला भी बैठ गया।
पूरे रास्ते बोलता रहा की होटल देख लो। न पसंद आये तो कोई बात नहीं। खैर साहब होटल के बाहर ऑटो रुका। कमरा देखा, अच्छा खासा बड़ा था। बिस्तर और टॉयलेट भी साफ-सुथरे थे। 600 रूपए में बात तय हुई। हमने सामान पटका और अपने-अपने कोने पकड़ लिए। धीरे धीरे नहाने धोने का कार्यक्रम बना। नहा-धोकर लगा की कमरा ठीक ही लिया।

मात्र सत्तर रुपए में हेडफोन वाला गाइड

9:30 के करीब बाहर निकले खजुराहो के पश्चिमी भाग वाले मंदिर होटल से 2 मिनट की पैदल दूरी पर थे। हम वहाँ पहुँचे। 10 रुपए प्रति जन के हिसाब से टिकट्स लीं। प्रवेश किया। बाईं तरफ से मंदिर देखने शुरू किये। अभी पहला मंदिर ही देखा जो की वराह अवतार का था, कि हमें समझ आ गया की यार गाइड होना चाहिए कोई जो इनके बारे में बताता रहे।

हमें पता चला कि स्वचालित ऑडियो उपकरण मिल जाता है यहां। यदि आप गाइड न करना चाहें। उस ऑडियो उपकरण की भाषा जो आप चुनना चाहें वो रख लें और जिस स्थान पर जाए वहा की संख्या पर उपकरण के पटल जोकि स्पर्श यानी टच स्क्रीन सुविधा वाला था बस टच करते ही उस स्थान के बारे में बताना शुरू कर देता था, पोज, रिपीट, फॉरवर्ड भी और कीमत मात्र 70 रुपए। हमनें तीन लेने की सोची पर दो ही मिले क्योंकि तीसरे का हेडफोन खराब था। वैसे अच्छा हुआ, 2 ही मिले।

देखने में इतना खूबसूरत कि घंटों निहारा जा सके

घंटों बैठ कर निहार सकते हैं यहां की कलाकृति

खैर पश्चिमी भाग वाले मंदिर बहुत सुन्दर हैं और भव्यता देखते ही बनती है। यदि आपको भी कोई ज्ञान न हो शिल्पकला का, जैसे मुझे नहीं था,  तब भी आप घंटों उन मंदिरों पर की गयी नक्काशी और मूर्ति कला को निहार सकते हैं। कौन सा मंदिर कब बना और किसने बनवाया इसकी जानकारी यहां नहीं लिख रहा। वो जानकारी आपको कहीं भी मिल सकती है और मुझे इतना याद भी नहीं रखा जाता।

गर्भगृह में स्थापित मूर्ती पर पड़ता प्रकाश

हर मंदिर की एक खास बात जो मैंने गौर किया वो यह है कि किसी भी मंदिर के मुख्य रूप से जो भी मूर्ति स्थापित है उसपर प्राकृतिक प्रकाश पड़ता रहता है। मने आप प्रवेश करेंगे तो पाएंगे कि पूरे मंदिर में अंधेरा जैसा भी होगा तब भी गर्भगृह में स्थापित मूर्ति पर पूरा उजाला है। जैसे कोई खास उपकरण की सहायता से रोशनी बिखेरी गई है। यह कोई चमत्कार नहीं, निमार्ण का उत्कृष्ट नमूना जानिये। बहुत उच्च स्तर की कारीगरी है।

ऐसा सफर जिसने हमारी कमर तोड़ दी

हम सभी 11 बजे के करीब बाहर निकले। सुबह नाश्ता नहीं किया था। खैर बाहर आकर परांठे खाये। थोड़ा बाजार में घूमे फिर सभी ने मन बनाया की पांडव गुफा प्रपात घूम के आया जाए। ऑटो ड्राईवर शैलेन्द्र को फोन किया। उसने वाटर फॉल तक घुमा के लाने के लिए 600 रूपए बताये। मैंने कहा कि दोस्तों से विचार करके बताता हूं।

एक दो ऑटो वालों से पूछा पर आठ सौ से कम किसी ने नहीं बताया। वापस शैलेन्द्र को फोन किया कि भैया ऑटो लेकर आ जाओ। वो बोला आता हूं। उसको खजुराहो संग्रहालय के सामने बुला लिया। और जब तक वो आये उस समय को हमने म्युजियम देखने में लगाया। हमने टिकट पता करनी चाही तो पता चला कि जो टिकट मंदिरों को देखने के लिए खरीदी थी 10 रुपए हर बन्दे के हिसाब से वही यहां भी काम करेगी।
शुक्र है रविंदर ने वो फेंकी नहीं थी। खैर म्यूजियम ज्यादा बड़ा नहीं था। 10 मिनट में देख डाला।
बाहर आये और शैलेन्द्र ऑटो लेकर इंतजार में था।

हम तीनों ऑटो में बैठ गए और पांडव गुफा प्रपात का सफर शुरू हुआ। हम सभी कहीं न कहीं सोच रहे थे की 600 रूपए बहुत ज्यादा हैं ऑटो के लिये। कम में बात बनती तो ठीक रहता। खैर सफर लंबा था। मुख्य सड़क को नहीं चुना जो की हाईवे था जो पन्ना को जाता है और निर्माण कार्य जोरों शोरों से चालू था पिछले कई सालों से जो आगे भी कई वर्षों तक जारी रहने का अनुमान है। जोरों शोरों को समझिये उस सड़क पर प्रत्येक वाहन को चलने के लिए जोर लगाना पड़ता था। जरुरत से ज्यादा और वाहन कैसा भी हो सड़क पर शोर होना लाजमी हो जाता है।

बड़े बड़े रोड़े डाले हुए हैं उस सड़क पर जिस से चलना या चलाना दोनों ही मुश्किल था। पर ऑटो वाले भैया ने कहीं बीच का रास्ता जो की गाँवों के मध्य से होकर निकालता है को चुना। वैसे तो 35 या 40 किमी का सफर है पर गाँव के बीच बीच से निकलते हुए सफर थोड़ा लंबा हो गया। राजेन्द्र नगर के रास्ते से निकले हम। पांडव फॉल भोजपुर में पड़ता है। वहाँ तक पहुँचने के लिए हमें मुख्य सड़क तक आना पड़ा। जो की पन्ना टाइगर रिजर्व के सामने से निकलती है। उस सड़क पर आने के बाद ही उसके निर्माण के जोरशोर का पता चला और पता चला की ऑटो वाले भैया ने 600 रूपए कम ही मांगे। सड़क खस्ताहाल, उस से बचने के लिए भाई ने गांवों के बीच से निकाला ऑटो। मात्र 4 किमी का सफ़र ही किया था हमने उस जोरशोर वाली सड़क पर और शरीर का बाजा बज गया।

पांडव और प्रपात की असीम शांति, जहां किसी को भी नींद आ जाए

हमें 2 घंटे से ज्यादा लगे पांडव प्रपात पहुंचने में। वहां पहुंच कर टिकट ली। रिजर्व का क्षेत्र होने के नाते उसके रखरखाव के लिए शुल्क लगाया गया है उस क्षेत्र में घूमने के लिए। खैर साहब हम चल पड़े पैदल 600 मीटर के रास्ते पर। ऑटो बाहर ही खड़ा रहा। क्योंकि तिपहिया के 220 रूपए और देने पड़ते।
इसलिए हमने निर्णय किया की पैदल चला जाय जिससे पैसे बचें। दूरी भी 600 मीटर थी बस।
प्रपात और पांडव गुफा तक पहुँचने के लिए 294 के करीब सीढियां हैं। प्रपात की गहराई देख हम थोड़ा संकोच में पड़े की उतर जाएंगे पर वापसी में थक न जाएं ज्यादा। 40 किमी से ज्यादा का सफर ऑटो में करने के बाद हिम्मत थोड़ा सोचने पर मजबूर हो जाती है।

पांडव और प्रपात जाने तक का सफर

हम प्रपात में उतरे, वहां पहुंचने के बाद मैं बता नहीं सकता की कितनी असीम शांति का अनुभव हुआ।
शब्द नहीं वहां की सुंदरता के बखान का। प्रपात से ज्यादा पानी तो नहीं निकल रहा था पर भव्यता देख अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब पानी अपने पूरे वेग में आता होगा तो कैसा नज़ारा होता होगा।
एक सरोवर ठीक प्रपात के नीचे है, काफी बड़ा। उसका शांत ठहरा पानी ठहरने को मजबूर करता है।

सरोवर के दाहिने तरफ पहाड़ी से पानी झरता रहता है, उनमें कई धार का रूप में भी गिरता है। उस धार में आप बोतल अड़ा दो तो 2 मिनट में भर जाए शुद्ध निर्मल मिनरल का पानी। उसका स्वाद अवर्णनीय है। 50 मीटर के करीब का हिस्सा ऐसा है के नीचे खड़े हो जाने पर सारा भीग जाएं। ठंडा पानी भावों की गर्मी उत्पन्न करने को काफी है। बस उसके नीचे से होकर गुजरने भर से शरीर और मन ताजा हो गए।

हम तीनों दोस्त वहीं बने एक चबूतरे पर आसमान के तरफ आंखें करके लेट गए। ऊपर से बरगद या जाने कौन सी पेड़ की जटाएं लटकी हुई थीं जिनसे पानी टपकता रहता है। थोड़ा उस पानी से बच कर लेटे। ज्यादा देर आंखें खुली न रख पाये। वहां का मनोहर वातावरण और पानी के झरने की मनभावन आवाज ने आंखें बंद कर दीं। उसी अवस्था में बहुत देर तक लेटे रहे। मन ही नहीं था की आंखें खोलें। मन थोड़ी देर के लिए विचारों से भागने लगा। लगा कि जैसे नींद आ जायेगी।

वापस लौटे तो ऑटो वाले भैया मुस्कुराते ही मिले। चेहरे पर कोई तनाव या झल्लाहट नहीं कि गधों कितना समय लगाया। संतुष्टि बड़ी चीज है। चाहते और कहते सब हैं, मिलती किसी किसी को है। हालांकि हासिल खुद ही करना है। दे कोई नहीं सकता। सब बातों व घटनाओं पर हम खुद का नियंत्रण चाहते हैं। यही संतुष्टि की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित होता है।


रणविजय सिंह रवि शर्मीले स्वभाव के लेकिन ठेठ इंसान हैं। बातें करना बड़ा पसंद है। चाय के तो दीवाने हैं। कभी मिलने के लिए बुलाओ तो पहले पूछते है, चाय समोसा है कि नहीं फिर बताएंगे। घूमते खूब हैं, इनकी फेसबुक टाइमलाइन भरी रहती है अलग-अलग जगहों की तस्वीरों से। लेकिन लिखने के मामले में बड़े आलसी हैं। हमसे बोला है कि थोड़ी खिंचाई कर देना कम लिखने के लिए, ताकि हमारे साथ-साथ ऐसे ही और आलसी घुमक्कड़ों की कलम चल पड़े। हमने कहा, बिल्कुल चलेगी। हम सब मिलकर घूमेंगे और खूब लिखेंगे। 


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1 COMMENT

  1. खजुराहो मंदिर तो शानदार शिल्प में बने हुए है।
    यहां की हरियाली मन मोह लेती है।
    जल प्रपात तक मैं नहीं जा पाया था।

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