खीरगंगा ट्रेक: ऐसी गजब की खूबसूरती कि दिल-दिमाग दोनों चकरा जाए

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पिछले 10-12 दिनों से खीरगंगा ट्रेक पर जाने की चुल्ल मची थी। किसी का साथ न मिल पाने के चक्कर में एक वीकेंड बेकार हो चुका था। इस वीकेंड तय किया कि अकेले ही जाऊंगा। शनिवार की रात को चंडीगढ़ के आईएसबीटी 43 से बस पकड़ी और अगली सुबह नींद खुली तो भुंतर में था। तड़के 4ः30 बजे भुंतर पहुंचा तो पता चला कि हिमाचल तो हाई अलर्ट पर है। दूसरी जगहों की तरह भुंतर से कोसल के रास्ते में लैंडस्लाइड हुई होगी। लेकिन मैंने रुकने के बजाय आगे जाकर देखने को बेहतर समझा।

दुर्गम खीरगंगा

सवेरे 6ः30 पर एक लोकल बस में सवार होकर भुंतर से कसोल के लिए निकल पड़ा। अभी हमारी बस को निकले हुए आधे घंटे ही हुए होंगे कि रास्ते में लैंडस्लाइड मिल गया। पर सच पूछो तो उस लैंडस्लाइड का अपना अलग ही मजा था। बस से बाहर निकला तो गजब का नजारा बिल्कुल मेरे सामने था। पार्वती नदी के उस पार कुछ घर और सामने दूर-दूर तक ऊंचे-ऊंचे पहाड़। रिमझिम सी बारिश भी हो रही थी लेकिन मैं फिर भी कैमरा निकालने से अपने आपको रोक नहीं पाया।

भूस्खलन बहुत बड़ा भी नहीं था तो प्रशासन का इंतजार करने के बजाय सबने मिलकर पत्थर हटाना शुरू कर दिया। मजे की बात ये थी कि इजराइली सहयात्री भी पत्थर हटाने में जुट गए थे। 40-45 मिनट में उस भूस्खलन से निजात मिली। मैं लगभग 9 बजे कसोल पहुंचा। वहां फ्रेश होकर नाश्ता किया। फिर 11 बजे मनिकरण और 1ः30 के आसपास बरशैनी (जोकि बेस है) पहुंचा।

मन मोहे प्रकृति

कसोल से बरशैनी तक का रास्ता तो एक अलग ही लेवल का था। मतलब रोड के दाईं तरफ एकदम खड़ा पहाड़ और बाईं तरफ 40-50 फीट खाई में बहती पार्वती नदी। नदी के उस पार भी खड़े सुन्दर पहाड़। दोपहर के लगभग 2 बजे 13 किलोमीटर लंबी ट्रेकिंग की शुरुआत हुई। पहाड़ के किनारे पगडंडी और पगडंडी के बगल सीधे पार्वती नदी में ले जाती सैकड़ों फीट गहरी खाई। यहां एक तरफ एडवेंचर का लेवल पता चल रहा था। वहीं उन पहाड़ों पर फैली हरियाली और उसके ऊपर कथकली करते बादलों को देखकर मन प्रफुल्लित हुए जा रहा था।

लगभग 3 किलोमीटर चलने पर एक गांव आया, नकथान। पहाड़ों के बीच बसे इस गांव की अलग ही पहचान है। हमने वहां रुककर मैगी खाई। क्योंकि अब तक मुझे तीन और लोगों का साथ मिल चुका था। इसी बीच इंद्रदेव जी ने फिर से बरसना शुरू कर दिया। पर हम नहीं रुके क्योंकि हम पहले से ही 1 घंटे लेट थे।

अब हमारा अगला पड़ाव था रुद्रनाग। इस बीच मिले तमाम झरनों को पार करते हुए 8 किलोमीटर तक की चढ़ाई आराम से पार कर हम रुद्रनाग पहुंच गये। पगडंडियों पर गिरने वाले उन झरनों का बहाव देखकर मजा तो आ ही रहा था। डर भी लग रहा था क्योंकि झरनों को पार करके ही आगे जाना था। फिलहाल सब कुछ ठीक था। बस इंद्रदेव चुप होने का नाम नहीं ले रहे थे।

कठिन चढ़ाई

रुद्रनाग से आगे बढ़े तो हमें पार्वती नदी को पार करना था। अभी तक हम पार्वती नदी के बाईं तरफ चल रहे थे। अब हम उसके दाहिनी तरफ आ गए क्योंकि आगे का रास्ता इसी पार से था। नदी पार करने के बाद हमें पता चला कि असली जंग तो अभी बाकी है। आगे रास्ते पर चलने में हमारी हवा निकलने लगी। कारण था जबरदस्त चढ़ाई। इन सबके बीच नजारे ऐसे थे कि थकान होने के बजाय अंदर खुशी और ऊर्जा की एक खदान महसूस कर रहा था।

पार्वती नदी के बहाव के शोर के अलावा दूर-दूर तक सन्नाटा पसरा हुआ था। घने और निर्जन जंगल की पगडंडियों पर चलना अपने आप में शानदार था। कहीं तो एकदम फिल्मी सेट जैसा लग रहा था। एक लाइन में कहूं तो 100 प्रतिशत प्रकृति की गोद में होना काफी सुखद था। आगे मिलने वाले तमाम छोटे-बड़े झरने अपनी तरफ आकर्षित कर रहे थे, रोक रहे थे कि रुक जाओ कुछ पल के लिए। लेकिन हमारे पास रूकने का समय नहीं था।

गर्म कुंड में डुबकी

कीचड़, चढ़ाई और लैंडस्लाइड के बीच सबसे बड़ी चुनौती थी कि अंधेरा होने के पहले ट्रैक पूरा करना। ताकि इस जंगल में भटकना न पड़े। जैसे-जैसे हम ऊपर जा रहे थे, सूरज देवता नीचे जा रहे थे। धीरे-धीरे उजाला भी कम होने लगा था और हमारी स्पीड भी। लगभग आधे घंटे तक अंधेरी रात में गिरते-पड़ते आखिरकार हमने 5 घंटे में ये ट्रेक पूरा कर लिया। रात में रुकने और खाने-पीने के इंतजाम के बाद थोड़ी राहत हुई। 5-6 डिग्री सेल्सियस तापमान में बोनफायर के सामने बैठकर अच्छा लग रहा था। अब इंतजार था सुबह होने का।

सुबह होते ही मैं कमरे से बाहर आया तो पूरी घाटी का नजारा देखकर मन गदगद हो उठा। पल भर में मौसम साफ रहता तो पल भर में चारों तरफ धुआं-धुआं हो जाता। इंद्रदेव अब भी क्रीज पर डटे हुए थे। हल्का-फुल्का नाश्ता करने के बाद मैं तैयार था उस कुंड में डुबकी लगाने के लिए, जिसके चर्चे खूब सुन रखे थे। होम स्टे से निकलने के बाद महज 6-7 मिनट में ही हॉट वाटर स्प्रिंग के कुंड के दर्शन हो गए।

पानी इतना गरम था कि चारों तरफ भाप उड़ रहा था। हम जल्दी ही कुंड में उतर गए। मन तो भड़ाक से कूदने का था लेकिन कुंड में कूदना मना है। कुंड में डुबकी लगाई तो मजा ही आ गया। ठंड से कांप रही पूरी घाटी में इतना गरम पानी कहां से आता है ये तो नहीं पता। लेकिन पानी इतना गरम होता है कि शुरू में लगता है कि जल ही जाएंगे। लगभग 20 मिनट तक उस कुंड में यूं ही बैठे रहने पर शरीर का सारा दर्द छू-मन्तर हो गया।

अब समय था वापसी की

इंद्रदेव रात भर अपना जलवा दिखाते रहे। उसी बारिश में उतरना भी शुरू हुआ। समय हो रहा था सबह के 10ः35। इस बार मैं बिल्कुल अकेला था। रास्ता भूल जाने का डर नहीं था लेकिन प्रकृति इम्तिहान लेने आ पहुंची थी। जो लैंडस्लाइड जाते समय आसनी से पार कर गए थे, अब वो 3 गुना बड़ी और गहरी हो गई थी। जाते समय जो झरने मजा दे रहे थे लौटते समय वो हमें अपने साथ पार्वती नदी में ले जाने को आतुर दिख रहे थे। लगभग 3 घंटे में जब ट्रेकिंग पूरी हुई तो याद आया कि उतरते समय मैंने कोई रेस्ट नहीं लिया। 13 किलोमीटर की पैदल पदयात्रा में एक भी जगह न बैठने का अब तक का मेरा सबसे बड़ा रिकॉर्ड है।

अब बरशैनी से मनिकरण होते हुए वापस भुंतर आना था। बरशैनी पहुंचा तो पता चला कि रास्ते में लैंडस्लाइड होने से रोड पूरी तरह ब्लॉक है। साथ में केरल के 3 लड़के भी मिल गए थे। उनकी सबसे बड़ी समस्या थी कि उनको हिंदी नहीं आती थी। भाषा के मामले में मैं उनकी मदद कर रहा था। उनके साथ बात करके लगा कि थोड़ी बहुत अंग्रेजी अपन को भी आती है।

हमने तय किया कि लैंडस्लाइड तक एक कैब से जाएंगे। लैंडस्लाइड को चल कर पार करेंगे फिर दूसरी कैब से आगे जाएंगे। इस बीच जो देखा वो डराने वाला तो था ही और एडवेंचर्स भी था। रह-रह कर ऊपर से चू रहे पत्थरों के बीच हमारी गाड़ी चोरों के माफिक दबे पांव आगे बढ़ रही थी। बचते-बचाते हम मंडी पहुंचे और अगली सुबह हम सब चंडीगढ़।

इस पूरी यात्रा में जो भी देखा और महसूस किया एकदम नया था। खुले पहाड़ों, उनके ऊपर गश्त करते बदलों और पार्वती नदी की कल-कल को महसूस करना। भरभरा कर गिरती चट्टानों और अपने साथ बहा कर ले जाने को आतुर दिखते झरने को पार पाना। इन सब का अनुभव शानदार था। उम्मीद है हिमाचल वापस बुलाएगा।


खीरगंगा की चढ़ाई का बेहतरीन अनुभव हमें लिख भेजा है मनीष साहू ने। मनीष ने इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म में ग्रेजुएशन किया है। पेशे से कंटेंट राइटर और कॉपी एडिटर हैं। मनीष बताते हैं, घुमक्कड़ी के साथ ही फोटोग्राफी में खासी दिलचस्पी रखता हूं। एक दो-महीने काम करने के बाद एक लॉन्ग डिस्टेंस ट्रिप की सख्त जरूरत पड़ती है।


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