कोल्ली मलाई की खूबसूरती देख लोग बोलते हैं, हम व्यर्थ ही विदेश घूमने जाते हैं

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चेन्नई, जिसे चिलचिलाती धूप के कारण बहुत से उत्तर भारतीय रहने और घूमने के लिहाज से ज्यादा महत्व नहीं देते। पर आज मैं आपको साउथ के एक ऐसे पहाड़ी इलाके की सैर पर ले चलूंगा, जहां पहुंचकर आपको लगेगा कहीं उत्तराखंड की पहाड़ियों मे तो नहीं आ गए। यकीन मानिए आपके मुंह से निकल ही जाएगा, ये है साउथ का मसूरी।

मैं उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं और पिछले दो साल से मैं चेन्नई में काम करता हूं। ऑफिस के बाद घूमने के लिए फेमस मरीन बीच और गांधी बीच पर चला जाता हूं। पर मेरा मन कहीं न कहीं कहता है कि चेन्नई इन बीच वाले इलाकों से ज्यादा कुछ है। ऐसा कुछ, जो अभी तक लोगों ने नहीं देखा। तभी ऑफिस से एक दोस्त से पता चला कि चेन्नई से 390 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी है, जिसका नाम है ‘कोल्ली मलाई’। नाम से ही लुभावना है ना। मलाई एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ होता है पहाड़। ज्यादा जानकारी जुटाने पर पता चला कि इसे ‘मौत का पहाड़’ भी कहते हैं। अब तो मेरी जिज्ञासा आसमान छूने लगी। बिना घूमे अब रहा नहीं जा रहा था। अपने ऑफिस की टीम के साथ अगले हफ्ते ही जाने का प्लान तैयार हो गया।

हम 6 लोग ऑफिस से छुट्टी लेकर चेन्नई रेलवे स्टेशन पहुंचे। बहुत ही रोमांचक और विचित्र सफर था। हममें से कई लोगों की टिकट कंफर्म ही नहीं हो पायी थी। गैर हिंदी भाषियों के साथ यह मेरी पहली ट्रिप थी। सुबह 8 बजे हम सेलम जंक्शन पहुंचे। यहां से कोल्ली पहुंचने के लिए हमें 1 घंटे का सफर अभी और तय करना था।

उस सुबह, मौसम का मिजाज रोज से अलग था। तेज गर्मी की जगह हल्की ठंड थी। सेलम शहर से थोड़ी दूर जाते ही हमें कोल्ली पहाड़ की झलक दिखायी दी। ऐसा लगा जैसे पहाड़ ने बादलों की चादर ओढ़ रखी है। कोल्ली के आस-पास लहराते खेत हमारा स्वागत कर रहे थे और थोड़ा पास जाने पर लगा जैसे सूरज हमें बादलों में छुप कर देख रहा हो। ये छुपनछुपाई का खेल चल ही रहा था कि अचानक हमारे हाथों से सामान गायब होने लगा। डरिए मत ये कोई जादू नहीं बंदर है। यहां के बंदर आपको बनारस की याद जरूर दिलाएंगे। हमारे पेट में चूहे फुटबाल खेलने लगे थे। तभी सांभर, रसम और ऑमलेट की खूशबू ने हमारे अंदर जान भर दी। पास ही एक ढाबा था। पेट पूजा कर के हम आगे के सफर के लिए रवाना हुए।

मिड वे पॉइंट: डर और खुशी एक साथ

धीरे-धीरे रोड पतली होती जा रही थी। घने पेड़ों के बीच से धूप छन-छन कर आ रही थी। बीस मिनट की चढ़ाई के बाद हम मिड वे पॉइंट पर पहुंचे। मिड वे से नीचे देखने पर डरावनी खाई थी। नीचे देखने पर मुझे बहुत सारे घुमावदार रास्ते दिखे जो जंगलों के बीच कहीं खो जाते थे। तब मैने जाना इसे माउंटेन ऑफ डेथ क्यों कहा जाता है। फिर भी वहां से सब कुछ इतना सुंदर लग रहा था कि हम खुद को फोटोशूट करने से रोक नहीं पाए।

जंगल, पहाड़, वॉटरफॉल, बोटिंग और आप

तकरीबन 3 बजे हम कोल्ली हिल के एक छोटे वॉटरफॉल तक पहुंचे। ज्यादा बड़ा नहीं था पर कहते हैं न ‘आगाज ऐसा है तो अंजाम कैसा होगा’। रास्ते में हमें छोटे-छोटे झोपड़े मिलें। उनके साथ ही कुछ क्षेत्रीय औरते खाने के अलग अलग स्टॉल लगाए खड़ी थी। हमारा पेट भरा हुआ था इसलिए हम वॉटरफॉल की ओर बढ़े। 200 मीटर की चढ़ाई के बाद देखा कि झरने के पास लोहे की रॉड लगी हुई थी। जहां खड़े होकर झरने का मजा ले सकते थे। हमारे दिल के अंदर का बच्चा जाग उठा। हमारे बीच शर्त लगी की कौन ज्यादा देर तक झरने के नीचे खड़ा हो सकता है। वो कोई हल्की नहीं, अच्छी खासी मोटी धार थी। पूरा का पूरा पिकनिक स्पॉट है ये जगह। जहां दोस्तों और परिवार वालों के साथ आया जा सकता है। यहां आप कभी बोर नहीं होंगे। अब मुझे ही देख लो मैं दो घंटे से भी ज्यादा से यहां था पर बोरियत को नामों निशान नहीं। चारों ओर पेड़, पहाड़ और जंगल आपको एक अजीब सा सुकून देते हैं।

वहां से निकलते ही बाहर वो आंटी लोग के छोटे से दुकानों से कोयलों और लकड़ी के चूल्हे पर बनाई गई यहां की एक डिश पोरियल के साथ नारियल के मीठी और खट्टी चटनी खाने का मजा ही अलग था। हालांकि मैं ज्यादा उनकी भाषा नहीं समझ रहा था पर मेरे और उनके बीच भावनाओं का एक रिश्ता सा बन गया। मेरे बिना कहे उन्होंने पोरियल के साथ एक मीठी सी चीज खाने को दी। कोई फल था जिसकी कटिंग किसी पेपर की झालर जैसी थी, जिसपर थोडा खटमिट्ठा मसाला भी छिड़का हुआ था। खाने के बाद उसदिन ‘कच्चे आम’ का एक अलग ही स्वाद मिला, जो बहुत बेहतरीन था।

अब शाम के साढ़े पांच बज चुके थे, मुख्य आकाश गंगा का प्लान अगले दिन रखा। वहां से हमने कोल्ली पार्क में फूलों और बोटिंग का लुत्फ लेने के बाद सात बजे डिनर के लिए कस्बे के होटल में डोसा कुत्ठुपरोता का मजा लिया। रात होते-होते मौसम ने यूं करवट ली कि एक पल को लगा, शिमला की हवा चल रही हो। फिर वहां से हम अपने प्रिबुक्द रिसोर्ट पहुंचे।

पि ए रिसॉर्ट

लंबे-लंबे पेड़ो के बीच जंगल में था ये रिसॉर्ट। जब कमरे में गए तो देखा तो वहां न एसी था न पंखा था। पर प्राकृतिक मौसम ने इतनी ठंडक बढ़ा दी थी कि लग ही नही रहा था हम भारत के एक गर्म प्रदेश में हैं। फिर रात ग्यारह बजे रिसॉर्ट का बोनफायर का प्रोग्राम शुरू हुआ। हम तमिल गानों का लुत्फ उठाते हुए अपने ही मन में कल के आकाश गंगा प्लान के बारे में सोचकर आनंदित होने लगे। सब कुछ बहुत ही सुन्दर था। तभी अचानक से मेरे मन में ख्याल आया कि इतनी सुंदर जगह का आनंद बाइक के बिना तो बेकार है।

बाइक सफर और स्वर्ग दर्शन

अगली सुबह 6 बजे बाकी के ट्रेवेलर और मैं अपनी बाइक लेकर तैयार तैयार हो गए। मंजिल है आकाश गंगा। उन संकरे और घुमावदार रास्तों में बाइक चलाने का अपना ही मजा है। अगर आप चेन्नई के आस-पास बाइक ट्रिप पर जाना चाहते हैं तो यहां जरूर जाइये। आपको प्रकितिक सौंदर्य का ऐसा अलौकिक दृश्य देखने को मिलेगा जो शायद ही भूल पाएं। रास्ते में हमें सीढ़ीनुमा खेतों में अपने ही दुनिया में मस्ती करते बच्चे भी मिले। सड़क के बगल-बगल तकरीबन पांच फिट चौड़ी सीढ़ीनुमा नहरें थीं। उनमें भरा पानी इतना साफ था कि आप को जमीन दिख जाए। ऊपर आकाश गंगा की कल-कल आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थी। मन कर रहा था, बाइक उड़ाकर जल्दी से वहां पहुंच जाए। आखिरकार हम पहुंच ही गये आकाशगंगा तक। पर यहां पहुंचकर पता चला कि अभी तो केवल रोमांच की शुरुआत है, असली पिक्चर बाकी है मेरे दोस्त।

वो 700 सीढ़ियां और पथरीले चट्टान

हम अपने अपने वाहनों से उतरे तो एक चौंकाने वाली सूचना से सामना हुआ, आकाश गंगा तक पहुचने के लिए 700 सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं और फिर उतनी ही सीढ़ियां चढ़कर वापस भी आना होता है। ये सच में रोमांच से भरी खबर थी। पहले वहां स्थित मंदिर में दर्शन कर अपना समान लादा और हम सब चल दिए सीढ़ियों की तरफ। उन हरे-भरे पहाड़ों में इन सीढ़ियों को बनाने वाले का भी जवाब नहीं। बहुत ऊंची-ऊंची सीढियां बनाई थीं। करीब 200 सीढ़ियां उतरते ही मेरे साथी ने कहा, ‘THIS IS WHY IT IS CALLED MOUNTAINS OF DEATH’ (इसीलिए इसे मौत का पहाड़ कहते हैं)।

इस बात पर हंसते और रोमांचित मन को दिलासा देते हुए हम लोग जैसे ही तकरीबन चार-पांच सौ सीढ़ियां उतरे होंगे, सामने एक मनमोहक दृश्य देखते ही आंखे उसपर ही टिक गयी। चार सौ फीट ऊंची पहाड़ी से एक विशाल झरने का उद्गम था। झरने की आवाज कानों में कोई संगीत बजा रही थी। हम और तेजी से नीचे उतरने लगे। सीढ़ियां खत्म होते ही हमे पता चला कि अभी हमारा इम्तिहान खत्म नहीं हुआ है ,आगे 200 मीटर हमे काई लगे गीले चट्टानों और पत्थरों पर चढ़ कर जाना है।

हम सभी धीरे चढ़ते-फिसलते आगे बढ़ते रहे। उस वक्त फील एकदम रोडीज के शो जैसा आ रहा था। कई बार फिसले पर कैमरा को बचाते, खुद को संभालते आगे बढ़ते रहे। जैसे ही सौ-सवा सौ मीटर बचा होगा, पानी की बौछारों से लिपटी हवाएं हमें पूरा ही भिगो गयीं। समझ ही नहीं आया, ये हवा चल रही है या पानी की बूंदे उड़ रही हैं। एकदम स्वर्ग जैसे सफेद हवा को भी हम देख सकते थे, पानी को लिए उड़ रही हवा हमें और रोमांचित कर रही थीं। हम थोडा और आगे बढ़े, चट्टानों को पार कर सामने देखा तो एक विशालकाय पर्वत की चोटी से एकदम सफेद झाग जैसी जल की धाराएं बह रहीं थीं। लगा, मानो पूरी की पूरी गंगा यहीं आ गयी हो। आधे लोग तो उन हवाओ और बौछारों से अपनी आखें भी न खोल पा रहे थे।

जहां ये झरना गिर रहा था, वहां एक विशाल कुंड बना था जिसमे बहाव तेज नहीं था और चट्टानें उस जल को अपने सहारे धीरे-धीरे नीचे की ओर प्रवाहित कर रही थीं। साथ में बगल की चट्टान पर एक ट्री हाउस बना हुआ था। मैं जब गया इस कुंड में रस्सी पकड़ कर तो पानी इतना ठंडा कि मानो हिमालय की किसी बर्फीली नदी में पैर डाल दिया हो। यकीन मानिये आप मसूरी के कैम्पटी फाल को भूल जायंगे यहां आकर। उस दिन हमने पूरे 6 घंटे वहां बिताए। वापस आने का मन ही नहीं था पर फिर 700 सीढ़ियों चढ़कर ऊपर आ ही गये।

और अगली सुबह चेन्नई वापस, पर अभी भी 3 महीने बाद भी, हम सब मन से वहीं हैं।


अपनी घुमक्कड़ी का ये खूबसूरत विवरण हमें लिख भेजा है अर्चित श्रीवास्तव ने। अर्चित पेशे से इंजीनियर हैं। खूब खुशमिजाज हैं। यारों के यार हैं। बड़े-बुजुर्गों के सबसे ज्यादा चहेते हैं। राजनीति में खासी रुचि है। सामाजिक कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। फोटोग्राफी का तगड़ा चस्का है लेकिन अपनी व्यस्त जिंदगी से इस शौक के लिए कम ही वक्त निकाल पाते हैं। घूमते रहते हैं क्योंकि असल प्राणवायु उसी से मिलती है।


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