सोलो ट्रिप: बड़े शहर में रहने वाली एक छोटे शहर की लड़की जब पहुंची बर्फीले पहाड़ों पर

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हम सब टुकड़ों-टुकड़ों में पूरी जिंदगी जीना चाहते हैं। हर दिन दिमागी जोड़-तोड़ में लगे रहते हैं। एक साथ ही भागना और ठहरना, दोनों चाहते हैं और कोई पूछे तो ये जवानी है दिवानी का डायलॉग फट से सुना देते हैं, मैं उठना चाहता हूं, दौड़ना चाहता हूं, गिरना भी चाहता हूं…बस रुकना नहीं चाहता। लेकिन इस न रुकने के चक्कर में न जाने कितना कुछ छूट जाता है, जिसके बारे में सोचने का मन तो करता है लेकिन खुद को फुर्सत का हवाला देकर तसल्ली कर जाते हैं। हम वीकेंड वाली पीढ़ी के लोग हैं। इस वीकेंड से प्यारा हमारे लिए धरती पर कुछ भी नहीं है और मैं खुद ऐसे ही लाखों लोगों में से एक हूं।

हुआ यूं कि मैं दोस्तों के साथ कुछेक जगह घूमने पहले जा चुकी थी। साल 2017 की एक जनवरी को लाखों लोगों की तरह मैंने भी खुद से वादा किया था कि इस साल अकेले भी दो-तीन दिन के लिए कहीं घूमने जाना है। साल पूरा खत्म हो गया और खुद से किया एक वादा भी पूरा नहीं हो पाया। साल 2018 दस्तक दे चुका था लेकिन हर वर्ष की भांति इस वर्ष, मैंने खुद से कोई वादा नहीं किया। पूरा दिन दफ्तर में कटा और शाम में आकर सो गई। अचानक से घूमने जाने का मन होने लगा, कई दोस्तों से मिन्नतें भी कीं साथ चल लो, लेकिन नौकरी की कुछ तो मजबूरियां रही होंगी वरना यूं ही कोई दोस्त बेवफा नहीं होता। हां, तो फैसला हो गया अगर कोई बेवफा दोस्त साथ नहीं जाएगा तो क्या स्नेहा दिल्ली से बाहर नहीं जाएगी, बिल्कुल जाएगी।

इसी जोश में मैंने मेक माय ट्रिप से मनाली की टिकट बुक कर ली। टिकट बुक करने के बाद सोचा कि रात में काफी कोहरा होता है और ऐसे मौसम में बस से जाना ठीक नहीं। लेकिन पता नहीं कहां से गैंग्स ऑफ वासेपुर का डायलॉग दिमाग में आया, ’एक ही तो जान है अल्लाह ले ले या मोहल्ला ले ले’। बस हो गया काम खत्म। बैग तैयार। बस जूते खरीदना बाकि था क्योंकि मैं बर्फ देखने जा रही थी।समझ रहे हैं न! एक देहाती बिहारन की बर्फ देखने की फैंटेसी।

इसी दौरान अपने एक सीनियर को मैंने बताया कि मैं मनाली जा रही हूं तो उन्होंने अपने दोस्त को देने के लिए एक लैटर दिया। लैटर कुल्लू में देना था और जब संबंधित व्यक्ति से फोन पर बात हुई तो उन्होंने कहा कि सिर्फ मनाली ही क्यों कुल्लू भी घूमा जाए। अब तय हो गया कि मैं कुल्लू में रुकूंगी। गेस्ट हाउस बुक।ऑफिस खत्म होने के बाद विधानसभा मेट्रो स्टेशन से बस लेनी थी। पूरे दिन दिलो-दिमाग पर बर्फ ही छाई रही। शाम में पता चला कि बस एक घंटे देर से आएगी। मैं वहां मेट्रो स्टेशन के बाहर खड़ी सोचने लगी कि यात्रा की शुरुआत ही खराब हो रही है तो न जाने वहां क्या होगा।

यात्रा का पड़ाव शुरू

मेट्रो स्टेशन के बाहर ज्यादातर कॉलेज वाले बच्चे हैं जो मनाली घूमने जा रहे हैं। एक नीले रंग की बस आकर खड़ी हुई, मैं टिकट में दिए गए बस नंबर से इसका नंबर मिलाती हूं, नहीं मिलता है। मैं अपने बस के कंडक्टर को फोन करके पूछती हूं कि करीब दो घंटे से यहां खड़ी हूं और अभी तक बस नहीं आई। वह बताता है कि बस मेट्रो स्टेशन के बाहर खड़ी है। मैं उसे डांटती हुई बोलती हूं कि बस का नंबर वह नहीं है जो मैंने बुक किया था। वह बताता है कि बस बदल गई है। मैं दौड़कर बस में जा बैठती हूं।

बैठने के ठीक तुरंत बाद एक औरत मेरे पास आकर कहती है कि उसकी बेटी पहली बार अकेली अपनी बहन के यहां मनाली जा रही है और उसका सीट पीछे में किसी लड़के के बगल में है। मैं कुछ समझ नहीं पाती हूं। वह कहती है कि मेरी बेटी को तुम अपने बगल में बिठा लो। मैं मुड़कर पीछे वाली सीट देखती हूं तो वह लड़का लगभग चीखते हुए कहता है कि क्या मै शक्ल से एब्यूजर लगता हूं? मैं उस औरत से यह कहती हूं कि मुझे नहीं पता कि बगल वाली सीट किसकी है।

फिर बस का कंडक्टर आता है और मुझे कहता है कि आप उसकी चिंता न करें। अब वह लड़की मेरे पास बैठ जाती है। बस खुलने को जैसे होती है वह औरत फिर मेरी ओर मुखातिब होकर कहती है कि यह जल्दी सो जाती है, इसका ध्यान रखना। मुझे अपनी मां की याद हो आती है। शायद वह भी मुझे अकेले भेजते समय यही करती। मैं मुस्कुरा देती हूं।

बस आगे बढ़ती है, मैं खिड़की से बाहर झांकने लगती हूं। यह मेरे मन पसंदीदा कामों में से एक है जिससे मैं ऊबती नहीं। आगे एक छोटी सी बच्ची बैठी हुई है जो बार-बार शीशे पर कोहरे की वजह से जमी हुई पानी से कभी एबीसीडी लिखती है, कभी इधर-उधर रेखाएं बनाने लगती है। मैं उसे ‘हाय’ बोलती हूं और बदले में वह मुझे। पता नहीं नींद कब आ गई। अचानक बगल वाली लड़की मुझे जगाती है। बस चंडीगढ़ पहुंचकर एक ढाबे पर रुकी है। उसे भूख लगी है और वह बस से बाहर जाना चाहती है। वह अपना नाम बताती है और मैं अपना। फिर हम दोनों नीचे उतरते हैं।

चिप्स का पैकेट और कोल्ड ड्रिंक खरीदकर बस में बैठ जाते हैं। चिप्स के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू होता है। वह दार्जिलिंग की रहनेवाली है और उसके पिता सेना के सेवानिवृत सिपाही हैं। वह 10वीं में पढ़ती है और उसे नाचना-गाना बेहद पसंद है। मैं उससे दार्जिलिंग के बारे में पूछने लगती हूं। कुल्लू पहुंचने तक बातों का सिलसिला चलता है और वह मुझे मनाली में घूमाने का वादा कर देती है और अपना नंबर दे देती है। यानी इस शहर में पहुंचने के साथ ही मेरी एक दोस्त बन गई थी।

अजनबी शहर, अपने से लोग

रेस्ट हाउस पहुंचती हूं। कुल्लू में दिल्ली से ज्यादा सर्दी है। नींद नही आ रही थी इसलिए नहाकर तुरंत ही घूमने का सोचती हूं। रेस्ट हाउस वाला चाय दे जाता है। अचानक मुझे उससे डर लगने लगता है। दिमाग में न जाने कितने ख्याल आ जाते हैं। जिन्हें लैटर देना था वह आ जाते हैं और कहते हैं कि यहां मत रुकिए हमारे घर चलिए। मैं थोड़ा हिचकिचाती हूं लेकिन सामान उठाकर चल देती हूं। वह मुझसे पूछते हैं कि आपको स्कूटी चलानी आती है और मैं ना में सिर हिला देती हूं। वह कहते हैं कि लड़कियों को स्कूटी चलाना जरूर सीखना चाहिए और मैं हां कह देती हूं। मैं कुछ भी बोलना नहीं चाहती थी। दरअसल मेरा पूरा ध्यान सड़क के नीचे बह रहे व्यास नदी और आसमान को छू रहे पहाड़ पर था। मेरा दिलोदिमाग नदी की आवाज में कहीं ठहरा हुआ सा था। मैं आधी नींद में, आधी जगी हुई और खोई हुई लड़की थी।

एक घर के सामने स्कूटी रुकती है। एक महिला दरवाजा खोलती हैं, मैं नमस्ते कहती हूं और वह बदले में जो बोलती हैं वह भाषा मैं समझ नहीं सकती थी लेकिन मुस्कुराहट आश्वस्त करती है। शब्दों से ज्यादा भाव इंसानी जज्बातों को जोड़ने का काम करते हैं। मैं घर की सजावट देखकर खुश हो जाती हूं। यह बिहार या दिल्ली के घरों से बिल्कुल अलग था। मैं एक कमरे में यानी बैठके में जाती हूं, वहां पहले से एक व्यक्ति बैठा हुआ था। वह इस महिला के पति हैं। यहां इस तरह के कमरे को ट्रुक-ट्रुक कहा जाता है। कमरे के बीचों-बीच चिमनी वाली अंगीठी जल रही है, जो तंदूर जैसी है। मैं उस पर हाथ सेंकने लगती हूं।

कुछ देर बाद खिड़की से बाहर झांकती हूं तो वही फिर व्यास नदी आवाज करते हुए बहती हुई दिखती है। इस शहर में काले कौओं की तादाद अच्छी जान पड़ती है। मछलियां पकड़ने के लिए चिल्ल हवा में करतब करते हुए झट से पानी में मुंह मारते हैं। इसी बीच तब तक चाय बनकर आ जाती है। चाय का स्वाद थोड़ा अलग और अच्छा सा है। कमरे में फिलिप्स की छोटी सी टीवी है, जिस पर जी क्लासिक चैनल लगा हुआ है। पुराने जमाने के गाने चल रहे हैं। मैं सब कुछ भूल चुकी हूं, कहां से आई…कहां जाना है। घंटो यहां बैठती हूं। जल्द ही बातचीत के क्रम में मैं कमरे में बैठे व्यक्ति को अंकल बोलने लगती हूं और वह बिहार के बारे में मुझसे पूछने लगते हैं। तब तक खाना आ जाता है। भूख तो लग ही रही थी और अजनबी शहर में कोई घी लगाकर रोटी दे तो भला कौन कमबख्त छोड़ता है।

इसके बाद मैं कई औरतों के साथ भेखली चली जाती हूं। वहां कोई मंदिर है। इसका नाम मैं भूल गई हूं। बेहद शांति वाली जगह। पहली बार इतने छोटे-छोटे गांव देख रही हूं। कहीं-कहीं बोर्ड पर गांव के लोगीं की जनसंख्या 100-200 लिखी हुई है। इस ऊंचाई से साफ-साफ सफेद पहाड़ दिखता है। इस तरह के सफेद पहाड़ देखने की तमन्ना तब से मन है जब से कक्षा में हिमालय और काराकोरम के बारे में पढ़ाया गया था। मैं पहाड़ को निहारने लगती हूं। तब तक मेरे हाथ में अगरबत्ती थमा दी जाती है। मै कुछ नहीं बोलती। फिर से मेरी मम्मी मुझे याद हो आती है। वह जानती हैं कि मैं पूजा-पाठ नहीं करती फिर भी घर से निकलते समय ‘सिरा’ घर में प्रणाम जरूर कराती हैं। और मैं उन्हें देखकर हंसते हुए हाथ जोड़ लेती हूं। मंदिर के चबूतरे में अच्छी धूप है।

एक झबरा कुत्ता इसी धूप में उलट-पुलट रहा होता है। मैं सोचती हूं यह कुत्ता कितना भाग्यशाली है ठंड में धूप सेंक रहा है, एक मैं हूं जो धूप के लिए भी तरस गई हूं। फिर अपनी ही बात पर सवाल कर उठती हूं। भाग्य क्या होता है? आस-पास बिना पत्तियों के ढेर सारे पेड़ थे। पूछने पर पता चलता है कि यह सेब के पेड़ हैं। ये लोग सेब को सेउ बोलते हैं। मेरी मां भी सेब को सेउ ही बोलती है।

इसी बीच ये लोग थोड़े परेशान हो जाते हैं। हमारे साथ मंदिर आए आजाद सर फोन पर लाहौल बात कर रहे हैं। पूछने पर पता चलता है कि इनके किसी रिश्तेदार के बच्चे का पैर टूट गया है और वह लाहौल में है। लाहौल से मनाली आने वाले सारे रास्ते इस मौसम में बर्फ की वजह से बंद रहते हैं। मै इन महिलाओं में से एक मेरी उम्र की लड़की नीलम से पूछती हूं कि वहां कोई अस्पताल नहीं है क्या? वह बताती है कि अस्पताल तो है लेकिन काफी बेहतर नहीं। सर (अंकल) मुस्कुराते हुए कहते हैं, यह दिल्ली नहीं है मेरी बच्ची। मैं चुप ही रह जाती हूं। वह आगे कहते हैं कि तुम चिंता मत करो, यह सामान्य बात है, बच्चा इधर आ जाएगा। बस लंबी-चौड़ी जुगत लगानी पड़ेगी।

अब मेरी इस यात्रा में वह बच्चा भी मेरे साथ है। मैं यहां से उतरने के बाद सर के साथ कुल्लू के अस्पताल जाती हूं। बाकी सारे लोग अपने-अपने घर चले जाते हैं। सर को अस्पताल में बच्चे के लिए ऐसे वाहन की व्यवस्था करनी है जो उन कठिन रास्तों से गुजरने में सक्षम हो। इसके अलावा उन्हें अस्पताल में किसी जरूरतमंद व्यक्ति को खून देना है। सर वहां खून देने के बाद डॉक्टर से बात करने लगते हैं। रात होने को है और ठंड से मेरा बुरा हाल हो चला है। मैं हीटर के बगल में जाकर बैठ जाती हूं। डॉक्टर मुस्कुराते हुए कहता है कि तुम भी खून दान कर दो, मैं ‘ना’ में सिर हिलाते हुए कहती हूं कि मैं नहीं दे सकती हूं क्योंकि मेरा वजन मात्र 41-42 किलोग्राम ही है। वह हंसते हुए मुझे ठीक से खाने-पीने की सलाह देने लगते हैं और जूस ऑफर करते हैं।

वहां से मैं सर के मम्मी-पापा से मिलने चली जाती हूं। एक कमरा खुलता है। वहां सर के पापा दरी बनाने का काम कर रहे होते हैं। इनकी मुस्कान काफी प्यारी है। मैं उनके मशीन को हाथों से छूकर देखती हूं और इससे जुड़ी हुई चीजें पूछने लगती हूं। फिर हम दूसरे कमरे में जाते हैं। वहां कई बूढ़ी औरतें पहले से बैठी हुई हैं। यह वही वाला कमरा है जिसे ट्रुक-ट्रुक कहते हैं। कुछ औरतें चरखे पर काम कर रही हैं। मैंने अपने जीवन में पहली बार किसी को चरखे पर काम करते देख रही हूं।

इस कमरे की औरतें काम भर की हिंदी भी नहीं समझती हैं। मैं मुस्कुराती रहती हूं और वह सब भी मुस्कुराती रहती हैं। इस बीच पीतल की थाली आ जाती है। इसमें उबले हुए आलू हैं, थोड़ा लाल दिखने वाला कोई सूखा सा मिश्रण है और एक मोटी सी कुछ अलग प्रकार की रोटी है। आलू खाना शुरू करती हूं तब तक सर आ जाते हैं। वह बताते हैं कि यह आलू लाहौल का खास है और इस खमीर वाली रोटी को लोया कहा जाता है तथा यह सूखा मिश्रण मिर्च और कई चीजों से बना है।

रात में रेस्ट हाउस गई ही नहीं, इन्हीं आरतों के साथ इस ट्रुक-ट्रुक में मुझे जगह मिल गई और मैं सो गई। आंख खुली तो उठकर झट से खिड़की खोल लिया। सामने व्यास नदी। इससे अच्छा कुछ भी नहीं हो सकता है। मैं मनाली जाने लिए थोड़ी ही देर में तैयार हो गई। सामान यहीं छोड़कर निकल गई बर्फ देखने। अब गाड़ी से दिखने वाला सफेद पहाड़ एकदम नजदीक आता हुआ दिख रहा है। इस बीच काले बादल घिरने लगे हैं और यहां के लोगों का कहना है कि बर्फ गिरने से पहले मौसम ऐसा ही हो जाता है। रास्ते में ही मेरे पैर ठंडे पड़ चुके हैं। मुझे विश्वास हो चुका है कि मेरे कपड़े इस ठंड को बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। इतने में गाड़ी रुक जाती है। बाहर झांकने पर पता चलता है कि पुलिस ने गाड़ी रोकी है।

मैं मनाली के बदले सोलांग वैली चली जाती हूं। रास्ते में इतना ट्रैफिक है कि दिल्ली भी फेल। सोलांग पहुंचते-पहुंचते रूई जैसी बर्फ पड़ने लगती है। मुझे खुद पर विश्वास नहीं हो रहा है कि मैं यहां हूं और मेरे बालों पर बर्फ की छोटी-छोटी फाहे हैं। मैं हाथ बढ़ाकर सड़कों की बर्फ छू रही हूं। लोगों को लग सकता है कि यह लड़की बढ़ा-चढ़ाकर बोल रही है। कसम से मुझे ऐसे लोगों की बिल्कुल परवाह नहीं। परवाह तो मुझे बस मेरे बालों पर गिरे बर्फ की है। हाथ आगे करके खड़ी हूं जाती हूं। सोचती हूं कि मेरे आत्मा का जो कुछ भी दरका हुआ है वह बाहर निकल जाए और यहीं जम जाए। मेरे साथ न जाए।मैं खुश हूं…बहुत खुश…इतनी खुशी पहले कभी नहीं हुई। यह पहली बार है जब पिछले एक-दो सालों में मैं अकेले इतनी हंसी हूं। चलते-चलते सोलांग वैली के परती बर्फ मैदान में पहुंचती हूं। जगह-जगह बेस्ट हनीमून डेस्टिनेशन लिखा हुआ है। रोपवे से ऊपर जाती हूं। अब जो कुछ भी सामने है। उसे शब्द क्या ही बयां करेंगे। हाथों में बर्फ के गेंद बनाकर खेलने लगती हूं। कुछ देर के बाद हाथ गायब हो चुका था मेरी चेतना से। शरीर कांप कर शांत हो चुका था। मैं वापस मनाली पहुंच गई और थोड़ी देर घूमने के बाद दिल्ली के लिए बस पकड़ लिया। मैं बस की सीट पर बैठी हुई हूं…बगल वाली सीट खाली है जो दिल्ली आते तक भी खाली ही रहती है।

मैं मेट्रो स्टेशन के एक्सीलेटर पर खड़ी हूं। कुछ याद आता है…। दिल्ली में जब पहली बार मेट्रो में आई थी तो एक्सिलेटर से कितनी डरी हुई थी मैं। मैं कसकर एक्सिलेटर को पकड़कर मुस्कुराने लगती हूं। मुझे अपने आप पर गर्व महसूस हो रहा है, जिसे सिर्फ मैं महसूस कर सकती हूं या वह लड़की महसूस कर सकती है जिसे शीशे के मॉल में जाते हुए डर लगता हो।


कुतूहल से भरपूर ये ब्यौरा हमें लिख भेजा है स्नेहा ने। स्नेहा पत्रकार हैं। तमाम मुद्दों पर बड़ी बेबाकी से मत व्यक्त करती हैं। दोस्तों के मुताबिक, कमजोरी का शिकार हैं। आंखों के नीचे स्याह घेरे हैं, जो संभवतः कविताओं की किताबें घोलकर पी जाने की वजह से हैं। खाना बहुत बढ़िया बनाती हैं। दोस्तियां बड़ी शिद्दत से निभाती हैं। कम बोलती हैं लेकिन जब बोलती हैं तो लगता है कोई बात कह गईं।


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