जिंदगी की धक्कमपेल से ऊब चुके हों तो यहां घूमकर आएं

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पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जाना हुआ। समय था तो मन जिज्ञासु हो उठा। खोजबीन की तो पता चला महज 20 किलोमीटर दूर एनएच27 पर गौतम बुद्ध के परिनिर्वाण का स्थान है। जाने में कोई परेशानी नहीं हुई। बस और टैक्सी हर समय उपलब्ध हैं। पहुंचे तो स्वागत के लिए एक बड़ा सा द्वार तैयार खड़ा था। और अंदर जो दिखा वो तो अप्रत्याशित था। हम मन में किसी प्राचीन खंडहर का चित्र बना कर आए थे पर यहां तो पूरा बौद्ध प्रदेश बसा हुआ था। अलग अलग देशों से बौद्ध श्रद्धालु आए हुए थे। अलग अलग बोली भाषा व्यवहार और बस केंद्र में बुद्ध। ऐसा लगता था जैसे अलग अलग दिशाओं से आई श्रद्धा की नदियों का संगम हो। मैं भी, श्रद्धा तो नहीं, पर अपने कुतूहल का झरना लेकर जरूर पहुंचा था।

प्रवेश द्वार से ही शुरू होकर दूर तक बौद्ध मंदिरों की कतार थी। कोई भी मंदिर बनावट, रंग, रूप में दूसरे के समान नहीं। कई बौद्ध देशों जैसे श्रीलंका, चीन, थाईलैंड ने अपने अपने मंदिर यहां बनवाए हैं और हर मंदिर अपने देश की उत्कृष्ट वास्तुकला का प्रतिनिधित्व करता जान पड़ता है। इन्हें देखकर ऐसा लगता है कि बुद्ध की आध्यात्मिक सुंदरता और इन मंदिरों की भौतिक सुन्दरता के बीच होड़ लगी है।


मंदिरों के अलावा एक संग्रहालय भी है जहां प्राचीन परिनिर्वाण स्तूप के अवशेष, पुरातत्व सर्वेक्षण के नमूने और बुद्ध से जुड़ी जानकारियां उपलब्ध हैं। यहीं पता चला, गौतम बुद्ध वास्तव में 28 वें बुद्ध थे और परिनिर्वाण का मतलब है पुनर्जन्म के बंधन से मुक्ति के लिए निर्वाण प्राप्त मनुष्य की अंतिम मृत्यु। गौतम बुद्ध ने लगभग 480 ई.पू. यहीं शरीर त्याग किया था। संग्रहालय के बाद अगला पड़ाव था बुद्ध का परिनिर्वाण स्थान। इसी स्थान पर एक बहुत प्राचीन मंदिर बना हुआ है जिसको देखकर लगा कि इसकी समय समय पर मरम्मत होती रही है। इस प्रमुख मंदिर के पास ही स्तूप और खंडहर हैं।

प्रमुख मंदिर के गर्भगृह में बुद्ध की लेटी हुई प्रतिमा है सुनहले रंग की। प्रतिमा को छूना मना है। अंदर कुछ बौद्ध भिक्षु थे जिन्होंने बैठने का इशारा किया। गर्भगृह में एक अजीब सी मोहक शान्ति थी। धीरे धीरे मन के सारे उद्वेलित करने वाले भाव, जिज्ञासा, कुतूहल, उत्सुकता सब शांत होते गए और अंत में बस एक ही भाव था संतुष्टि का। ऐसी संतुष्टि जिसका अनुभव पहले कभी नहीं हुआ था।

अगर आप पारंपरिक मंदिरों से ऊब चुके हैं तो एक बार जरूर जाएं। मन की शांति के साथ ही साथ आंखों के लिए भी बहुत कुछ नया है यहां।


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अभिषेक त्रिपाठी कवि हृदय हैं, दिमाग वकीलों वाला है और आत्मा यायावर। अभी जोधपुर के एनएलयू में पढ़ रहे हैं। मौका मिलते ही घूमने निकल जाते हैं। तो पेश है, उनके चश्मे से कुशीपुर की यात्रा।

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