कश्मीर 2ः कश्मीर जाने के लिए हिम्मत नहीं, अलग नजरिए की जरूरत है

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(ये इस यात्रा का दूसरा भाग है, इससे पहले का विवरण यहां पढ़ें)

फैज, जिसे हमारे दोस्त ने भेजा था। उसकी गाड़ी से हमने जॉस्टल (जहां हम रुकने वाले थे) तक का सफर पूरा किया। इस दौरान गाड़ी और शहर दोनों में एक जैसी शांति थी। गाड़ी के अंदर की शांति को मैं, मेरी दोस्त अपनी बक-बक से और फैज कश्मीरी गाने से खत्म करने की कोशिश कर रहे थे। शहर में हर जगह शांति थी। हर दस कदम के बाद सीआरपीएफ के जवान मौजूद थे। कुछ छोटे-छोटे बच्चे स्कूल बस के इंतजार में सड़क के किनारे खड़े थे। दूर तक फैला नीला आसमान, डल झील का किनारा, कश्मीरी गाना, अंदर-बाहर की शांति के साथ मैं अपने अंदर के उत्साह को उस चुप्पी के साथ जोड़ना चाह रही थी।

फैज ने हमें जॉस्टल छोड़ा। इस वायदे के साथ कि जल्दी तैयार हो जाओ, फिर हम घूमने निकलेंगे। मैं और मेरी दोस्त 2-3 रातों से ठीक से सो नहीं पाए थे इसलिए हमने सोचा कि पहले सोना है। लेकिन जॉस्टल पहुंचने का बाद हमारा इरादा बदल गया था। एक तो कश्मीर, ऊपर से खूबसूरत से लोकेशन पर सुंदर जॉस्टल। दोनों की खूबसूरती निहारते हुए हमने स्पीकर पर गाने बजाकर खूब डांस किया और फिर तैयार हो गए फैज के साथ श्रीनगर देखने के लिए।

श्रीनगर का लाल चौक

वायदे के मुताबिक फैज हमें लेने जॉस्टल पहुंच चुका था। सबसे पहले हम लाल चौक पहुंचे। लाल चौक इसलिए कि मेरा जन्मदिन था और मुझे वहां लाल चौक के घंटा घर पर केक काटने का मन था। अपनी ये इच्छा जैसी ही फैज को बताई तो उसने कहा, क्यों झंडा नहीं फहराना वहां! मैंने ना कहते हुए अपनी तरफ से सवाल दागा। तुमने (बॉन्डिंग इतनी अच्छी थी कि आधे दिन में ही आप से तुम पर आ गए थे) ऐसा क्यों कहा? फैज का जवाब था, इंडिया से लोग यहां आकर झंडा फहराकर अपनी देशभक्ति दिखाना चाहते हैं।

बातों से पता चला कि देश के दूसरे हिस्से से आए लोगों की घंटा घर पर झंडा फहराने वाली हरकत को यहां के लोगों को चिढ़ाने के लिए करते हैं। हाल ही में किसी ने घंटा घर पर झंडा फहराने की कोशिश की थी। जिसकी पहले तो सीआरपीएफ वालों ने जमकर खबर ली थी, फिर वहां की लोकल पुलिस ने। सीआरपीएफ और लोकल पुलिस इस बात का पूरा ध्यान रखती है कि किसी भी वजह से वहां का माहौल खराब न हो।

 

एक सच ये भी है कि 15 अगस्त और 26 जनवरी को यहां पर लोग तिरंगा नहीं फहराते हैं क्योंकि उनका मानना है कि अल्लाह से पहले कोई नहीं। लेकिन एक सच ये भी है कि लोग भारत के साथ नहीं आना चाहते तो उन्हें पाकिस्तान भी नहीं चाहिये। उन्हें बस आजाद कश्मीर चाहिए।

बातचीत के दौरान मुझे ये भी पता चला कि आए दिन जो यहां पाकिस्तान जिंदाबाद और आईएसआईएस का झंडा लहराया जाता है, वो सिर्फ चिढ़ाने की खातिर होता है। ना तो यहां के लोग पाकिस्तान जाना चाहते हैं और ना उन लड़कों का आईएसआईएस में कोई दिलचस्पी है। बात इतनी है कि दोस्त का दुश्मन दोस्त होता है। लेकिन मैं और मेरी दोस्त इस लॉजिक से कतई सहमत नहीं थे। हमारा प्वांइट ऑफ व्यू यही था कि जिस समय आप ऐसा कुछ करना शुरू करते हैं आप उसके लिए जिम्मेदार हो जाते हैं। चाहे वो मासूमियत में क्यों ना किया गया हो?

श्रीनगर की खूबसूरती

ढेर सारी गप्पबाजी के साथ ही फैज ने हमें डाउन टाउन, जामिया मस्जिद (जहां हर शुक्रवार पत्थरबाजी होती है) और वहां की फेमस जगहें दिखाई। फिर हम हरि पर्वत घूमने गए। एक ऐसी जगह जहां से पूरा कश्मीर दिखता है। टॉप पर खड़े होने के बाद आपको पूरा श्रीनगर कॉर्सिका जैसा दिखेगा (अगर अपना तमाशा फिल्म देखी है तो कॉर्सिका को देखा होगा)। रंग-बिरंगी सी छतें, दूर तक फैला नीला और सफेद आसमान और पहाड़ की चोटियां।

हमारे पास कैमरा नहीं था और ये बात मेरे दोस्त को पता थी तो उन्होंने फैज को कैमरे के साथ भेजा था। जिसकी वजह हर जगह फैज अपने कैमरे से हमारी तस्वीर उतार रहा था। माफी, फोटो उठा रहे थे (कश्मीर में लोग फोटो खिंचाते नहीं उठाते हैं)। कश्मीर के नौजवान सोशल मीडिया पर फोटो अपलोड नहीं करते बल्कि चढ़ाते हैं।

हरि पर्वत से शहर को निहारने के बाद हम तीनों खाना खाने के लिए वैष्णव ढाबा (क्योंकि मेरी दोस्त वेजिटेरियन हैं) पहुंचे। खाना खाने के दौरान भी हम कुछ कश्मीरी सीखने की कोशिश कर रहे थे। साथ ही हम अपनी शिकायत दर्ज करवा रहे थे कि यार ये कश्मीर के लोग इतना कम क्यों बोलते हैं? मतलब कि आप सामने वाले को पूरी रामायण सुना दें और बिना किसी सवाल-जवाब, आखिरी में बस एक जवाब मिले ‘अच्छा ठीक है’।

थका देने वाला वाकया

खाना खाने के बाद जब हम ढाबा से निकले तो हमारे दोस्त की गाड़ी ट्रैफिक पुलिस वाले लेकर जा चुके थे। फिर आधे दिन से उस गाड़ी को वापस लाने की हमारी जद्दोजहद शुरू हुई। ट्रैफिक पुलिस ऑफिस से लेकर सीआईडी ऑफिस तक हमने खूब चक्कर काटे। मैं दुखी थी कि हमारी वजह से पहले ही बंदे की गाड़ी का चालान काट चुका है और अब गाड़ी ही चली गई। मेरी शक्ल देख फैज हर बार कहते ‘अरे आप क्यों उदास हो? आप दोनों को दुखी देख कर अब मैं भी दुखी हो जाऊंगा। अभी तो लाल चैक पर केक काटना है।’

अब मेरा सारा उत्साह ठंडा पड़ चुका था। जैसे-तैसे चार-पांच घंटे की मशक्कत के बाद हमें हमारी गाड़ी मिली। फिर हम तीनों अपना मूड ठीक करने के लिए एक अच्छे से कैफे पहुंचे। वहां मेरे दोस्त (जिन्होंने हमारी जिम्मेदारी ली थी) भी आ चुके थे। हम चारों ने साथ में कॉफी पी। इधर-उधर की बात की और फिर फैज ने हमें जॉस्टल ड्रॉप किया। इस पूरे एक दिन में हमने कश्मीरी सीखने की बहुत कोशिश की लेकिन ‘शुक्रिया जनाब’ से ज्यादा कुछ हासिल न हुआ।

(ये इस यात्रा का दूसरा भाग है, बाकी की दास्तान यहां पढ़ें)


कश्मीर की अपनी इस यात्रा के बारे में हमें लिखकर भेज रही हैं भारती द्विवेदी। भारती दिल्ली में पत्रकार हैं। मूलतः बिहार की हैं। इनकी शान में दोस्त लोग इन्हें ‘मनमौजी बिहारन’ कहकर पुकारते हैं। तेजस्वी नयनों की मालकिन हैं, मुंहफट हैं, बेबाक हैं और बहुत ही ज्यादा प्यारी हैं, दरवाजे पर लटके विंडचाइम की माफिक। ये लिखने पर हमें इनकी तरफ से उलाहना आएंगी लेकिन एक अभिनेत्री हैं, तापसी पन्नू। उनकी शक्ल हूबहू भारती से मिलती है।


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