मशहूर हिल स्टेशनों पर क्यों नहीं जाना चाहिए?

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लैंसडाउन शहर के बीचोबीच बने ताल में जब हम बोटिंग करने लगे तो हमारे एक साथी ने गंभीर सी मुख मुद्रा बनाकर कहा कि गलती हो गई, बाद में बताऊंगी। कुरेदने पर बताया कि मुझे ऐसा भान हो रहा है कि इस ताल में मिलिट्री बैरकों और घरों के सीवर खुलते हैं। पानी था भी बहुत गंदा। हो सकता है कि सीवर खुलता ना हो, वहम हो मन का, पर मन में बात बैठ गई। हमने नियत समय से ज्यादा देर तक बोटिंग की। ऐसा लगा कि कर्मचारी दूसरी बोट से पीछा कर हमें पकड़ने की कोशिश करनेवाले हैं, तब हम बाहर निकले।

बोटिंग चैलेंज में प्रतिद्वंदी को हराने के बाद गर्व भरी मुद्रा

इस बीच हमने अपने दूसरे साथियों के बोट को कई बार सामने से और कई बार पीछे से घेरने की कोशिश भी की। दो तीन बार धक्के भी मार दिये। उन पर हमला करने के चक्कर और अन्य लोगों की बोटें भी धक्का खा ली थीं। एक बोट में गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड बैठे हुए थे। हमने उनको आश्वस्त कराया था कि कुछ नहीं होगा, हम आपकी केयर कर रहे हैं। इसके तुरंत बाद हमने उनकी बोट में धक्का मार दिया था। एक फैमिली बहुत दूर से हमसे बचने की कोशिश करती आ रही थी और अंत में खुद ही उन्होंने धक्का मार दिया।

बोटिंग करना महत्वपूर्ण नहीं था। लैंसडाउन में बोटिंग मायने नहीं रखती है। बोटिंग तो आप कहीं भी कर सकते हैं। पर एक खूबसूरत जगह पर वो काम करना जो आप कहीं भी कर सकते हैं, थोड़ा रोमांचक हो जाता है।

हम जुलाई के महीने में दिल्ली से लैंसडाउन के लिये निकले थे। रात को निकले, सुबह पहुंचे। छह लोग थे। पांच का पहले से तय था, छठे व्यक्ति को हमने मोहपाश में बांधकर नौकरी के कर्तव्यों से विमुख कर दिया था। उस वक्त यही कहा गया कि दोस्ती तो हमेशा रहती है, नौकरी रहे ना रहे। रास्ता सिर्फ एक व्यक्ति को पता था। ड्राइवर को। काबिल दो और लोग बन रहे थे। बाकी लोग बस हूं हां कर रहे थे, परंतु इस भाव से कि कोई ना भी रहता तो हम रास्ता निकाल लेते।

ये मेरी बहुत ही ज्यादा सुंदर फोटो उसी फिजा का असर है.

पांच-छह घंटों का रास्ता था तो लोगों ने गाना, शायरी, चुटकुले शुरू कर दिये। कुछ वक्त बाद जब दो व्यक्तियों ने गाड़ी में ही नाचना शुरू कर दिया तो बाकी लोग प्रकृति का आनंद लेने लगे। दिल्ली से निकलते ही अहसास होने लगा था कि हवा थोड़ी हल्की हो गई है। यूपी में पहुंचने के बाद कुछ खास महसूस नहीं हुआ। ऐसा लगा कि घर जाते वक्त ये सब तो देखते ही हैं। उत्तराखंड पहुंचने के बाद अहसास हुआ कि फिजा कुछ और है

उस वक्त बाबाधाम वाले लोग सक्रिय थे तो कई जगह हमें रास्ता बदलना भी पड़ा था। हमने तय किया कि लौटते वक्त हम भी अपनी गाड़ी पर बाबाधाम का झंडा और डमरु बांध लेंगे तो कोई कुछ नहीं कहेगा और हम भी कांवड़ियों के साथ ही निकल जायेंगे, रास्ता बदलना नहीं पड़ेगा। हमें आश्चर्य ये हो रहा था कि भोर होते ही जनता एकदम से घूमना शुरू कर चुकी थी वहां। मिठाई नमकीन की दुकानें खुल गई थीं। हमने कुछ नहीं खाया, आदत ही नहीं है। चाय पी और गांवों और कस्बों की छोटी छोटी बातों को याद करते हुए रास्ते में आनेवाली हर चीज की बड़ाई करते रहे।

जब हम लैंसडाउन की तरफ जाने वाली पहाड़ियों पर पहुंचे तो एक जगह रुक गये। वहां पर नदी की एक पतली सी धारा बह रही थी। पानी में कुछ नवयुवक, नवयुवतियां अठखेलियां कर रहे थे। हमने अंदाजा लगाया कि उनमें से सबसे ताकतवर शरीर वाले ने थोड़ा सा और जोर लगाया तो तीन चार नदी में गिरेंगे। गिरते गिरते बचे लोग। तब तक हम लोगों ने अपने जूते उतार दिये थे। पैंट ऊपर चढ़ा ली और हम भी पानी में उतर गये। पानी घुटनों भर ही था। पर पानी की धार अच्छी थी। बीच बीच में कई सारे बड़े पत्थर पड़े हुए थे। जिनपर बैठने का जुगाड़ हो गया था। कोई स्वभाव और अनुभव से बहुत बड़ा घुमक्कड़ नहीं है तो तुरंत ही चीप टाइप के कार्य शुरू हो गये। साथियों के पीछे पत्थर फेंकना, कुत्तों को बिस्कुट का लालच देकर पानी में उतरने के लिए आमंत्रित करना वगैरह वगैरह। कुत्ते जूतों की फिराक में थे। तो जूतों को गाड़ी में छोड़कर आना पड़ा।

फिर दुनिया का सबसे निंदनीय काम शुरू हुआ। सबने फोटो खींची और मन ही मन में तय कर लिया कि इनमें से एक को सोशल मीडिया पर अपलोड करना है। ये चेहरे से पता चल जाता है, इसके लिए विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं है।

ऊपर टपरी पर हम चाय पीने लगे। वहीं पर छोटे से पुल के पास कुछ लोग टहल रहे थे। मालूम हुआ कि वहीं के घर में ये लोग रुके हुए हैं। वहां पर लोग अपने घरों में ही गेस्टहाउस बना लेते हैं। ऑनलाइन इसकी बुकिंग हो जाती है। हमने भी करा रखी थी। जिस व्यक्ति ने कराया था वो आशंकित था कि पता नहीं कैसा होगा। उसने पहले ही कह दिया था कि घूमने आये हैं तो थोड़ा बहुत एडजस्ट किया जा सकता है, मेरा तो वैसे भी आने का मन नहीं था, दोस्तों का साथ मिला तो आ गया। हमने सोचा कि बुरा निकलेगा तब बतायेंगे।

दो साथी टपरी के पास बने मिट्टी के पहाड़ पर चढ़ गये थे। साफ पता चल रहा था कि दोनों को घूमने का कोई अनुभव नहीं है। दोनों ही फिसलन भरी मिट्टी पर चार पांच बार गिरे। हालांकि बाद में कहते रहे कि उसको बचाने के चक्कर में मैं गिर गया। पर हमने जो देखा था उसमें यही पाया कि दो बार गिरने के बाद ये लोग बेशर्म हो गये थे। बाद में गिरने पर ऐसे रिएक्ट कर रहे थे जैसे ये उनके रोज चलने की दिनचर्या का हिस्सा है।

वहां से जब हम निकले तो सीधा अपने गेस्टहाउस पहुंचे। लैंसडाउन शहर वहां से पांच किलोमीटर दूर था। ऐसा कहा गया था। बाद में पता चला कि थोड़ा ज्यादा दूर था। गेस्टहाउस में मस्त चाय मिली। दो बार पी। खाना खाया। हमने तय किया कि घूमने आये हैं तो घूमेंगे। आराम तो कहीं भी कर सकते हैं। फिर हम सब सो गये। उसके बाद जब उठे तो बड़ी व्यग्रता से निकल पड़े घूमने। पहाड़ी से उतर कर आस पास के गांवों में जाने की कोशिश की तो गांववालों ने कहा कि ये अच्छा नहीं लगता है। ना तो हम बहुत पुराने गांववाले हैं जो शहरी लोगों को देखकर चकित होते हैं, ना ही आप लोग बहुत बड़े शहरी हैं जो गांववालों को देखकर चकित होते हैं। बेहतर होगा कि आप लैंसडाउन शहर ही जायें और वहीं की फेमस चीजें देखें।

हमने गांव ऊपर से देखा और तय किया कि अगली बार जब आएंगे तो किसी गांव में ही रुकेंगे। कई दिनों तक। क्योंकि पहाड़ी लाइफ का मजा तो गांवों में ही है। गांववालों ने ये भी बताया कि हमें हर चीज के लिए इतना ऊपर नीचे चढ़ना पड़ता है कि शुगर, ब्लडप्रेशर जैसी बीमारियां होने का सवाल ही नहीं है। जब हमने कहा कि ऊपर नीचे करने में कोई सड़क तो है नहीं, तो उन्होंने कहा कि जरूरत ही क्या है। अच्छी चीज ये थी कि बिजली की दिक्कत नहीं थी।

फिर रात को हमलोग आस पास की पहाड़ियों पर घूमने निकले। जितना जा सकते थे गये। रात ज्यादा हो गई। कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। तो फिर कुछ लोग चीप हरकतों में संलग्न हो गये। वो देखो भूत, वो देखो बाघ। कोई नहीं डरा। एक दो व्यक्तियों ने मन रखने के लिए डरने की एक्टिंग की, फिर बोर हो गये तो फोन करने की एक्टिंग करने लगे। नेटवर्क नहीं आ रहा था। पर चीप हरकतों वालों ने हिम्मत नहीं हारी। फिर अचानक रोशनी हो गई और ये लोग शर्मिंदा हो गये। हालांकि चेहरे के भाव से ये बताने की कोशिश कर रहे थे कि ऐसा कुछ नहीं है।

अगले दिन हम लोग निकले लैंसडाउन की फेमस जगहों को देखने। लोकल लोगों की बोली में कहें ते टिपिनटॉप और उसके आस पास की चीजें। हमने वहां खडे़ होकर पहाड़ियां देखीं। दो पहाड़ियों को मिलते हुए देखा, कई को बिछड़ते हुए देखा। ये वो जगह थी जहां पर हिमालय और हिमाद्रि के बीच मिलन-बिछड़न होता है। नाम गलत भी हो सकता है। पर ऐसा कुछ होता है। बहुत देर तक तो कुछ दिखाई नहीं दे रहा था क्योंकि बारिश हो गई थी और वातावरण में ओस भर गई थी। पर जब सूरज निकला, तो अंधेरा छंटा। बेहद खूबसूरत था। मन कर रहा था कि पंख लग जाते तो उड़ के खाई से घूम आते। फिर खयाल आया कि पंख रहते तो फिर क्या ही पूछना था। सिर्फ इतना ही थोड़े करते। बहुत कुछ कर लेते। शायद इसी खयाल से बचने के लिए हम पहाड़ों में जाना चाहते हैं। पर ये पीछा नहीं छोड़ते।

हमने सारी फेमस जगहें देखीं, पर आनंद उनमें नहीं था। आनंद आया पहाड़ियों से उतरकर थोड़ा नीचे जाने में। थोड़े से ज्यादा नीचे जाने पर पक्की सड़क का रास्ता निकल आता तो बोरिंग हो जाता। अगर कोई जगह अच्छी लगती और हम उसमें घुसने का प्रयास करते तो पता चलता कि ये किसी का घर है, लोग कुत्ते छोड़ देंगे। हम वापस लौट आते। तो भाई, असली आनंद आंखों का ही है। आंखों से आप जो देख लें, जहां तक देख लें। ठंडक सी लगती है। लगता है कि कुछ देख लिए। कुछ आंखों में भर लिये। ये नहीं पता होता कि क्या भर लिया है। बस लगता है। ये लगने का अहसास ही दिमाग के साथ खेल करता है।

हमने सब देख दाख लेने के बाद यही तय किया कि जब भी जायेंगे तो अब बिना प्लान के जायेंगे और फेमस जगहों पर नहीं जायेंगे। क्योंकि इन जगहों का घोर शहरीकरण हो चुका है और ये जगहें बर्फ और ओस से घिरी दिल्ली की तरह ही लगती हैं। खाना भी बिल्कुल वही मिलता है। पर इन जगहों से इतर इनके आस पास की जगहें जो अनछुई हैं, वो ज्यादा अच्छी लगती हैं। प्राकृतिक लगती हैं। पर ये भी डर लगता है कि हम घूमते घूमते इन जगहों का भी वही हाल ना कर दें।


ये स्टोरी हमें लिख भेजी है ऋषभ श्रीवास्तव ने। श्रीवास्तव एकदम ठस्स आदमी हैं। इंजीनियरिंग की डिग्री है हाथ में और ज्ञान दुनिया जहान का रखते हैं। हंसते कम हैं, मुस्की ज्यादा मारते हैं। कभी मिल जाएंगे तो याज्ञवल्क्य-गार्गी लेवल का शास्त्रार्थ जरूर छेड़ देंगे। घूमना हर किसी की तरह बहुत पसंद तो है मगर आलस के कारण ज्यादा कहीं जा नहीं पाते। किताबों में ही वर्ल्ड टूर करते रहते हैं। बीच में वक्त निकालकर लैंसडाउन घूमने गए थे, लौट कर आए तो आदतन संतुष्ट नहीं दिखे। सबको बोलते फिर रहे हैं कि घूमना हो तो पहाड़ी गांव में घूमो।


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