बिहार के इस महल की बर्बादी रोककर हम अब भी असभ्य होने से बच सकते हैं

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राजनगर कैंपस के बाहर दरभंगा राज का प्राचीन सचिवालय भवन

26 जनवरी का नेशनल हॉलीडे था और 28 संडे था। शनिवार को छुट्टी लेने से तीन दिन का प्रोग्राम बनाया जा सकता था। बहुत दिनों से सपरिवार कहीं गये नहीं थे। सोचा बनारस पास है, घूम आते हैं। पटना से बनारस पांच-छह घंटे का रास्ता है। ट्रेन से जायेंगे, ट्रेन से लौट आयेंगे। मगर जब ट्रेन के बारे में पता करने लगे तो समझ आया कि अपने टाइम टेबल में तो ट्रेन ही नहीं हैं। हैं भी तो खाली नहीं हैं। दो दिन कोशिश की मगर नाकामी हाथ आयी। फिर ख्याल आया, क्यों न मधुबनी घूम आया जाए।

क्यों चाह कर भी याद नहीं करना चाहते लोग इस शहर को

जब मैंने कार के ड्राइवर से कहा कि मधुबनी हमारा घर नहीं है, हम तो वहां घूमने जा रहे हैं। तो नालंदा जिले के बाशिंदा हमारे ड्राइवर ने मेरी बात खत्म होने से पहले ही पलट कर जवाब दिया, मधुबनी में क्या है घूमने के लिए? उसका जवाब बहुत सहज था। देश को छोड़िये, बिहार सरकार के टूरिस्ट मैप पर भी मधुबनी का कोई जिक्र नहीं है। खुद मधुबनी जिले का वेबसाइट नहीं बताता है कि उनके जिले में भी कोई घूमने आ सकता है। मधुबनी जिले के लोग भी हैरत में पड़ जाते हैं, जब कोई कहता है कि उनके यहां कोई घूमने जा रहा है। हमारे ड्राइवर साहब जो अपनी स्विफ्ट डिजायर कार से पूरे बिहार में घूमते रहे हैं, की यह टिप्पणी बहुत सहज थी। यह तो मेरी खुशनसीबी थी कि पत्नी उपमा और बच्चे इस बात से मुत्मइन थे कि मैं उन्हें ले जा रहा हूं तो कोई ठीक जगह ही होगी।

एक प्रिय दोस्त, जिसने कराया मधुबनी से रू-ब-रू

मधुबनी घूमने का ख्याल सबसे पहले मेरे दिमाग में तब आया, जब मेरे एक जानने वाले सुशांत भास्कर पटना मेरे घर आये थे। सुशांत जी पेशे से शिक्षक और शौक से इतिहासकार हैं। उन्होंने दरभंगा के आसपास के इलाके की बुद्ध मूर्तियों पर शोध किया है और खूब मोटी किताब लिखी है। वे एक और वजह से मेरे मित्र हैं, क्योंकि मेरे स्कूल के आर्ट शिक्षक आरपी गुप्ता बाद में ट्रांसफर होकर उनके स्कूल में पढ़ाने चले गये थे। आर्ट टीचर का हाल ही में निधन हुआ है। हम दोनों के बीच की वे कड़ी थे। अब यह कड़ी कई दूसरी वजहों से है।

सुशांत भास्कर ने एक विदेशी शोधार्थी को दरभंगा-मधुबनी के इलाके में घुमाया था, वह यहां घूमकर काफी खुश हुआ था। इधर पत्रकार कुमुद सिंह लगातार दरभंगा-मधुबनी के धरोहरों के बारे में सोशल मीडिया पर लिखती रही थीं। राजनगर के भग्न राजमहल की तस्वीरें देख कर मैं चमत्कृत होता था। फिर वहां के गांवों का जिक्र पढ़ता रहता था। मिथिला पेंटिग जो एक कला के तौर पर पूरी दुनिया में सराही जा रही है और अच्छे-अच्छे ड्राइंग रूम की शोभा बन रही है, का केंद्र भी मधुबनी ही है। फिर दरभंगा राज के किले और भवन तो हैं ही।

यहां से काफी नजदीक है सीता जी का मंदिर

पहले मेरे मन में था कि दो दिन के लिए जाऊंगा, राजनगर का भग्न किला, मिथिला पेंटिंग का गढ़ माना जाने वाला जितवारपुर गांव और दरभंगा के राजमहल देखते हुए लौट आउंगा। तीन दिन-दो रात का यह टूरिज्म पैकेज नहीं बन सकता। मगर जब मैंने प्रभात खबर के अपने स्थानीय साथी रमण से बात की तो उन्होंने कहा, आप मधुबनी आयेंगे और जनकपुर नहीं जायेंगे तो कैसे होगा। जनकपुर, नेपाल में एक शहर है, जहां सीता माता का मंदिर है। कहते हैं राम और सीता का विवाह वहीं हुआ था। किंवदंती जो हो, मगर मंदिर का जो आर्किटेक्ट है वह भव्यता लिये हुए है, वह मुझे लंबे समय से आकर्षित करता रहा है। मैंने पूछा कितनी दूर है तो उन्होंने कहा 52 किमी। मैंने ओके कर दिया और इस तरह तीन दिन-दो रात का पैकेज बन गया।

मेरा बेटा नील अभी दस महीने का ही है, इसलिए हमने तय किया कि सार्वजनिक परिवहन का सहारा नहीं लेंगे। कार रिजर्व करके जायेंगे और उसी कार से तीन दिन घूमेंगे और लौट आयेंगे। दस बजे के करीब जब हमारी कार हाजीपुर क्रास करके सराय के पास से गुजर रही थी तो लगा कि गलती हो गयी। भीषण कोहरा, उतनी ही ठंड, खिड़कियां बंद थीं फिर भी हमलोग ठिठुर रहे थे। ड्राइवर बीच-बीच में ब्लोअर चलाता फिर बंद कर देता। भगवानपुर के पास वहां के फेमस दुकान में चाय पीयी और आगे बढ़ गये। मधुबनी पहुंचते-पहुंचते 12:30 बज गये। वहां से राजनगर 12 किमी दूर था।

मगर गलती से ऐसा रास्ता मिल गया, जिसकी सड़कें खस्ताहाल थीं। कूदते-कुदाते राजनगर पहुंचे। और जहां पहुंचे, वह राजनगर परिसर में ही एक कॉलेज था। वह भी एक हेरिटेज बिल्डिंग में ही बना था। देखते ही अफसोस हुआ कि इसी भवन को देखने इतनी दूर से भागे-भागे आये हैं। बेटी तिया तो कार में इतनी देर से बैठी-बैठी इरिटेट हो ही रही थी। हमारे ड्राइवर महोदय ने तिरछी मुस्कान से देखा, मैंने नजरें फेर ली।

नौलक्खा पैलेस का एक भवन अब इतना ही बचा रह गया है

बिहार-झारखंड का नौलक्खा चार्म

हम कार से उतरे और उस भवन का मुआयना करने लगे, सोच रहे थे कि इसमें किधर से घुसा जाए। मगर तभी आसपास के लोगों से बतियाते हुए ड्राइवर सुरेश जी आये और कहने लगे कि नौलक्खा पैलेस पीछे है। यह तो कॉलेज है। बाद में पता चला कि यह राजनगर कैंपस का सचिवालय भवन था, जिसे बाद में एक कॉलेज को दे दिया गया। उसके बाद एक मंदिर और फिर एक गेट के अंदर नौलक्खा पैलेस।

परिसर में स्थित तालाब जो संभवतः रानियों के स्नान के लिए बना था

बिहार-झारखंड के इलाके में कई नौलक्खा मंदिर और नौलक्खा पैलेस मिले हैं। पता नहीं नौलक्खा शब्द का ऐसा क्या चार्म है। राजगीर में जैनियों का एक नौलक्खा मंदिर फेमस है ही। देवघर के पास भी एक नौलक्खा मंदिर है। यहां से जनकपुर, नेपाल के जिस मंदिर में जाने का प्लान था, उसका नाम भी नौलक्खा पैलेस ही है।नौलक्खा का सीधा मतलब है नौ लाख में बना। समझिये उस जमाने में नौ लाख कितनी बड़ी रकम हुआ करती थी। आज तो नौ लाख में दस धूर जमीन भी नहीं मिलती, महल क्या बनेगा।

परिसर के बाहर स्थित दुर्गा मंदिर

कॉलेज से कहीं ज्यादा है यह भवन

दरभंगा राजघराने के एक राजा महाराजा रामेश्वर सिंह ने इस महल को 1905 में बनवाना शुरू किया था। यह जब भी बनकर तैयार हुआ हो, मगर 1934 के भीषण भूकंप में यह महल ध्वस्त हो गया। उसके बाद इसे ठीक नहीं कराया गया। उसी खंडहर में लोग इस महल की भव्यता तलाशते हैं। इसे तंत्र साधना का केंद्र भी कहा जाता है। कहते हैं रामेश्वर सिंह की तंत्र साधना में रुचि थी। इसलिए वहां कई ऐसे मंदिर भी हैं।

बहरहाल जैसे ही हमलोग पीले रंग की दीवार वाले उस कॉलेज से पीछे की तरफ मुडे हम सबों का मन प्रसन्न हो गया। गेरुआ रंग में रंगा इस भवन का पिछवाड़ा बहुत आकर्षक था। हाथी की मूर्तियों वाला दरवाजा था। देख कर मेरे मन को शांति मिली कि किसी गलत जगह पर नहीं आया हूं। और देखा कि उपमा और तिया दोनों खुश हैं।

तालाब के किनारे बनी इस संरचना से बाहर निकलती तिया

इतिहास यहां शौचालय में बदल गया

उस ध्वस्त भवन का आंगन काफी आकर्षक था, मगर पूरा झाड़ियों से भरा था। सामने कुछ आवारा किस्म के युवक थे जो कुछ विजिटरों को परेशान कर रहे थे। एक महिला और एक पुरुष था। इन युवकों को लग रहा था कि ये दोनों प्रेमी-प्रेमिका हैं और इस खंडहर में प्रेमालाप के लिए जगह तलाश रहे हैं। बहरहाल हमने उधर ध्यान नहीं दिया। उपमा तो बाहर ही रही, मैंने और तिया ने उस भवन के आंगन में धंसने की कोशिश की। मगर एक नहीं दसियों जगह पर मल दिखे और उनसे बचकर अंदर घुसना मुश्किल हो रहा था। फिर भी अंदर गये। आंगन में खंभों पर गोलाकार संरचना बनी थी। संभवतः उसी संरचना पर छत टिकी हो। ऊपर आकाश नजर आ रहा था।

राजनगर सचिवालय का फ्रंट व्यू

हम बाहर आ गये। फिर आगे बढ़े तो एक मंदिर दिखा। वह अपेक्षाकृत ठीक था। मंदिर घूमकर उस भवन की नक्काशी देखकर अच्छा लगा। वहां कुछ तसवीरें खिंचाई, सेल्फी ली और अलग-अलग एंगल से वहां से सचिवालय भवन की तसवीरें लेने की कोशिश की। वहां तिया और उपमा की किलकारियां गूंजने लगी थी।

नौलक्खा पैलेस का मेरा अनुभव

फिर आगे बढ़े तो दरवाजा दिखा जिसके अंदर नौलक्खा पैलेस का कैंपस था। यानी अब तक हमलोग बाहरी सचिवालय और मंदिर में घूम रहे थे। लोहे के दरवाजे को पार कर उस परिसर में घुसे तो बाईं तरफ एक दीवारनुमा महल दिखा और सामने एक और महल। दोनों खंडहर थे मगर उस खंडहर की भी अपनी रौनक थी। कैंपस काफी बड़ा था। गेट से सामने वाले महल तक की दूरी दो सौ मीटर रही होगी। इन दोनों महलों को देखते हुए आगे बढ़े तो एक पोखरा था, जिसके सामने कुछ संरचनाएं थीं, सीढियां थीं और उसके आगे एक मंदिर था। हम तालाब के आसपास घूमे, वहां भी जगह-जगह मल दिखे।

पूरे कैंपस में साफ-सफाई और व्यवस्था का घोर अभाव था। जगह-जगह झाड़ियां उग आयी थीं। यह फिर भी क्षम्य था। सबसे दुखद बात थी कि स्थानीय लोगों ने पूरे परिसर को सार्वजनिक शौचालय बना डाला था। तालाब के पास वाला मंदिर संगमरमर का बना था। वहां जाकर उपमा और तिया काफी खुश हुए। वहां दोनों दौड़ने लगे। मैं मंदिर के आसपास मुआयना करने लगा। कुछ और महल थे, जो बीएसएफ वालों के कब्जे में थे। उधर किसी आम-ओ-खास का जाना मना था। बाद में पता चला कि उधर कुछ अच्छे वाले महल थे। अंदर एक कामाख्या मंदिर भी था। हम वहां भी घूम आये।

पैलेस परिसर के अंदर एक किलानुमा दीवार

पैलेस का मुगल गार्डन

झाड़ियों, कचरों और मलों के बीच खड़ी ध्वस्त इमारत और पूरे राजनगर परिसर को घूमना अपने आप में अद्भुत अनुभव था। लगा यहां आना सार्थक हो गया। परिसर में कई झोपड़ीनुमा दुकानें भी थीं जहां चाय-नाश्ता उपलब्ध था। एक मंदिर के पास हमें कुछ लोग मिले जो शायद शादी तय करने पहुंचे थे। 26 जनवरी की वजह से कुछ आसपास के पर्यटक भी थे जो बाइक के आये हुए थे। अगर इस पूरे परिसर को साफ-सुथरा रखा गया होता और इसे किसी मुगल गार्डेन की शक्ल दी गयी होती तो यह एक अनूठा पर्यटक स्थल होता। मगर यह अभी एक जर्जर महल भर था जो किसी वीराने में खड़ा था। हम वहां डेढ़-दो घंटे रहकर लौट गये। भूख भी लगी हुई थी।

यात्रा की बातें अभी जारी हैं…


अपनी इस फैमिली ट्रिप के बारे में हमें लिख भेजा है ने। पुष्यमित्र वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये इस वृतांत की पहली कड़ी है। फैंसी, ग्लॉसी टाइप की मीडियागिरी से परे पुष्यमित्र जमीनी मुद्दों को बारहा उठाते रहते हैं, तफ्सील से लोगों को बताते रहते हैं। उनकी एक किताब नील का दाग मिटा: चम्पारण 1917 हाल ही में प्रकाशित हुई है। उस वक्त के घटनाक्रमों को बारीकी से उकेरती ये किताबें चहुंओर तारीफें बटोर रही है। इन सब सरगर्मियों के बीच पुष्य प्रेम, कविता, उत्सव के बारे में भी खूब बतियाते हैं।


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