बिहार का एक गांव जो मिथिला पेंटिंग की आर्ट गैलरी सरीखा है

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जितवारपुर गांव मधुबनी शहर से बिल्कुल सटा हुआ है, बमुश्किल चार किमी की दूरी पर। जनकपुर से मधुबनी लौटते वक्त रास्ते में ही यह गांव पड़ता है। इस गांव की पहचान मिथिला पेंटिंग के आधुनिक गढ़ के रूप में है। मतलब यह कि इसी गांव से सबसे पहले मिथिला पेंटिंग कोहबर की दीवारों से उतरकर कैनवास पर उतरी। आज इस गांव के हर घर में एक कलाकार है। इस अकेले गांव में तीन पद्मश्री हैं, दस से अधिक नेशनल अवार्ड पाने वाले और साठ के करीब कलाकारों को स्टेट अवार्ड मिल चुका है। अक्सर इस गांव में इस कला के देश-विदेश के कद्रदान आते रहते हैं। सरकार ने अब इसे कला ग्राम का दर्जा भी दे रखा है।

जब हम इस गांव की सीमा में पहुंचे तो जो छवि मेरे मन में थी वह कहीं नजर नहीं आयी। मुझे लगता था कि हर दरवाजे पर कोई न कोई व्यक्ति पेंटिंग करता नजर आयेगा। मगर ऐसा कुछ नहीं था। फिर एक दुकान पर जाकर हमने पूछा तो एक लड़की जो दुकान पर बैठी थी ने कहा कि आगे बढ़ेंगे तो एक गली मिलेगी, उस गली में जाइये, वहां हर घर में आपको कलाकार मिलेंगे। प्रभात खबर के हमारे साथी केके पुट्टी जो हमें यह गांव घुमाने वाले थे अभी पहुंचे नहीं थे। तब तक हमने सोचा कि खुद घूमा जाये। सड़क पर ही एक मंदिर के किनारे हमने गाड़ी पार्क की। ड्राइवर साहब वहीं रुक गये और मैं, उपमा (मेरी पत्नी) और तिया (मेरी बेटी) आगे बढ़ चले। उपमा की गोद में नील (मेरा बेटा) भी था।

उस गली में आगे बढ़ने पर एक फूस की झोपड़ी दिखी जिसकी दीवार पर मिथिला पेंटिंग बनी हुई थी, सामने एक फ्लैक्स बैनर लगा था, जिसमें किसी संस्था का नाम था, जो इस चित्रकला को संरक्षित करने का काम कर रही थी। दरवाजे पर एक वृद्ध थे, जिन्होंने हमें देखते ही कहा, पेंटिंग देखबै, जाऊ अंगना जाऊ।

अमूमन किसी गांव में जाने पर सीधे आंगन जाने का आमंत्रण नहीं मिलता है। आंगन में औरतें होती हैं और नवागंतुक से अपेक्षा रखी जाती है कि दरवाजे पर ही रहें। यह अपनी तरह का अनूठा अनुभव था। संभवतः इसलिए भी ऐसा रहा होगा कि लोग अब ऐसे सैलानियों के आदी हो गये होंगे और ये सैलानी कुछ पेंटिंग खरीद भी लेते होंगे। हम आंगन में घुसे तो जमीन पर बैठी एक महिला लकड़ी के ऊंचे पीढ़े पर कैनवास रख कर चित्र बना रही थी। हमारे आने की खबर से उसने घूंघट ले लिया था। बगल में एक रेडियो बज रहा था। एक किशोरी भी थी, जो हमें देखते ही घर में घुसी और कुछ चित्र लेकर आ गयी। उपमा उन चित्रों को देखने लगी। बाद में हमने विनम्रता से मना कर दिया कि हम चित्र नहीं लेंगे।

एक कलाकार के घर के आगे लिखा उसका परिचय और दीवार पर मिथिला चित्रकला

हम उस आंगन से निकले कि हमारे साथी केके पुट्टी जी पहुंच गये। अब उनके मार्गदर्शन में हमारी यात्रा शुरू हो गयी। सबसे पहले वे हमें पद्मश्री सीता देवी के घर ले गये। जिन्हें आधुनिक मिथिला पेंटिंग का आदि कलाकार माना जाता है। वहां भी हम सीधे मिथिलेश जी के बेडरूम में पहुंचा दिये गये, जहां वे बहुत कम रोशनी में सिल्क के कपड़े पर चित्रकारी कर रहे थे।

केके पुट्टी जी उस घर में घरेलू सदस्य की तरह थे। मैंने एक छोटा सा सवाल पूछा और मिथिलेश जी अपनी दादी सीता देवी और आधुनिक मिथिला चित्रकला की कहानी सुनाने लगे कि कैसे अकाल राहत की टीम के तौर पर केंद्र से आये एक अधिकारी की निगाह में यह चित्रकला पड़ी और कैसे वे इसकी तसवीर लेकर पुपुल जयकर और इंदिरा गांधी के पास गये और फिर कैनवास और कलर लेकर आये। कैसे रंग बचाने के लिए गांव की महिलाओं ने काजल, फूलों से बने प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल शुरू किया और फिर प्राकृतिक रंगों से बने चित्र की मांग बढ़ गयी।

एक पद्मश्री कलाकार के घर में बैठा मैं सोच रहा था कि यह घर किसी निम्न मध्यवर्गीय परिवार के घर जैसा है। पक्का मकान जरूर है। मगर घर की व्यवस्था बताती है कि माली हालत बहुत बेहतर नहीं है। मिथिलेश जी ने बताया कि हाल के दिनों में मिथिला पेंटिंग की मांग जरूर बढ़ी है और यह देश-विदेश में फेमस भी हुआ है। मगर कलाकारों के जीवन में बहुत फर्क नहीं आया। बिचौलिये ही असल लाभ कमाते हैं। वे हमसे चार सौ रुपये में जो पेंटिंग खरीदते हैं, उन्हें चार से पांच हजार में बेचते हैं। और आगे विदेशी बाजार में वह कितने में बिकता है पता नहीं।

चाय का आमंत्रण था, मना करके हम आगे बढ़े। पुट्टी जी से मैंने कहा कि पहले हम दलित कलाकारों के टोले में जाएं। क्योंकि इस गांव में दलितों की बड़ी आबादी मिथिला पेंटिंग से जुड़ी है। मैं यह देखना चाहता था कि उनके जीवन में इस कला से क्या बदलाव आया है। सीता देवी के घर से हम निकले तो गांव का असली रूप नजर आने लगा।

अब हर हर की दीवार पर मिथिला पेंटिंग बनी हुई थी। संभवतः ऐसा हाल के दिनों में जिलाधिकारी के कहने पर किया गया होगा। ताकि जितवारपुर एक कलाग्राम दिखे। दीवारों पर बनी चित्रकला स्तरीय और खूबसूरत थी। इन चित्रों को देखते हुए गांव में घूमना एक अाह्लादकारी अनुभव। यह एक अलग तरह की आर्ट गैलरी में होने का अहसास था। कहीं ईंट की दीवार पर चित्र बने थे, तो कहीं मिट्टी की दीवार पर। कहीं बाऊंड्री वाल पर ही चित्र बना लिये गये थे। बिजली के खंभों तक को मिथिला पेंटिंग से रंग दिया गया था।

इसके अलावा हमने यह देखा कि हर दरवाजे पर कलाकारों के नेम प्लेट लगे थे। कोई राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कलाकार था तो कोई राज्य स्तरीय। सीता देवी के अतिरिक्त इस गांव की जगदम्बा देवी और बौआ देवी को पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। बौआ देवी का घर गांव के मोड़ पर ही मुख्य सड़क पर है। दलित बस्ती में प्रवेश करते ही एक दिलचस्प नजारा दिखा। पान की गुमटी पर बैठकर एक सज्जन कैनवास पर चित्रकारी कर रहे थे। मैंने उनकी तसवीर ले ली। वैसे तो हर कदम पर कुछ न कुछ ऐसा दिख रहा था, जो फोटो लेने पर मजबूर कर रहा था। मैं लेता भी चल रहा था।

दलित बस्ती की स्थिति ठीक-ठाक थी। आर्थिक स्थिति में थोड़ा फर्क तो था, मगर अधिक नहीं। घर ठीक-ठाक और व्यवस्थित थे। आगे बढ़ा तो एक जगह काफी भीड़भाड़ दिखी, नजदीक जाने पर दिखा कि दो यूरोपीय मूल की वृद्ध महिलाएं और उनके साथ दो संभ्रांत भारतीय पुरुष कुर्सियों पर बैठे थे। सामने टेबल पर ग्लॉसी पेपर में छपी तसवीरों और प्रिंटेड आलेखों का पुलिंदा था। पुरुष स्थानीय लोगों से मैथिली में बतियाते और उनसे मिले जवाब को अंगरेजी और फ्रेंच में सामने बैठी महिलाओं को बताते।

पता चला कि उनमें से एक महिला मिथिला पेंटिंग पर एक किताब लिख रही है, किताब लगभग फाइनल हो चुकी है। किताब का बड़ा हिस्सा उन्होंने इस गांव में रहकर लिखा है। अब इस किताब में जिन लोगों की तस्वीरें छपी हैं उनका नाम सही है या नहीं इसे तय करने, कुल मिलाकर कैप्शन फाइनल करने के लिए आयी हैं।

लोगों से घिरी लेखिका और उसके सहयोगी कैप्शन को अंतिम रूप देते हुए.

हम भारतीय लोग जो घर में बैठकर सारा रिसर्च कर डालते हैं और बड़ी-बड़ी किताबें लिखते हैं। उनके लिए यह समझ में नहीं आने वाली बात थी। आखिर कोई लेखक महज कैप्शन फाइनल करने के लिए चार लोगों की टीम लेकर पेरिस से बिहार के इस गांव में आया है। इस किताब को लिखने में उसने न जाने ऐसी कितनी यात्राएं की होंगी और उनका कितना धन खर्च हुआ होगा। रोली बुक्स से छपने जा रही इस पुस्तक का नाम है, मधुबनी, ट्रेडीशनल वॉल पेंटिंग ऑफ बिहार। और लेखिका का नाम है देइदी वॉन शेवेन।

जर्मन मूल की लेखिका देइदी वॉन शेवेन अपनी किताब का कवर दिखाती हुई

पुट्टी जी ने बताया कि विदेशियों का यहां आना आम बात है और लोग इसके अभ्यस्त हो गये हैं। खास कर जापान से कई लोग आते हैं, वहां मिथिला पेंटिंग का म्यूजियम भी है। एक अमेरिकी कलाप्रेमी ने यहां की पेंटिंग को बेचकर जो पैसा कमाया उससे गांव में एक गेस्ट हाउस बना दिया है। जहां कोई सैलानी ठहर सकता है।

गांव घूमकर हमलोग लौट रहे थे कि पुट्टी जी हमें एक ऐसे कलाकार के पास ले गये जो दिव्यांग था। न ठीक से बोल पाता था और न ही चल पाता था। मगर तस्वीरें काफी अच्छी बनाता था। पुट्टी जी उसकी प्रतिभा के कायल थे। हम उसके आंगन में पहुंचे तो उसकी मां ने हमारे आगे उसके बने चित्रों का ढेर लगा दिया। हम उन चित्रों की खूबसूरती को निहारने लगे। फूस की झोपड़ी, मिट्टी का आंगन और चटाई पर बिखरे उसके चित्र, यह एक ऐसा अनुभव था जो हमेशा के लिए मन की किताब में दर्ज हो जाने वाला था। ऐसा लगता था कि पुरानी सूत की गठरी में हीरा लिपटा हो। मन में एक सवाल जो हमेशा के लिए दर्ज हो गया, कि कला ग्राम बनने और दुनिया भर में मशहूर होने के बाद भी मिथिला पेंटिंग ने इन कलाकारों को वह सब क्यों नहीं दिया जिसके वे हकदार थे।

अपनी मां के साथ बैठा दिव्यांग कलाकार सामने चटाई पर बिखरी उसकी कलाकृतियां

शाम ढलने लगी थी, अब लौट जाना जरूरी था।


अपनी इस फैमिली ट्रिप के बारे में हमें लिख भेजा है पुष्यमित्र ने। ये इस वृतांत की दूसरी कड़ी है। पुष्यमित्र वरिष्ठ पत्रकार हैं। फैंसी, ग्लॉसी टाइप की मीडियागिरी से परे पुष्यमित्र जमीनी मुद्दों को बारहा उठाते रहते हैं, तफ्सील से लोगों को बताते रहते हैं। उनकी एक किताब नील का दाग मिटा: चम्पारण 1917 हाल ही में प्रकाशित हुई है। उस वक्त के घटनाक्रमों को बारीकी से उकेरती ये किताबें चहुंओर तारीफें बटोर रही है। इन सब सरगर्मियों के बीच पुष्य प्रेम, कविता, उत्सव के बारे में भी खूब बतियाते हैं।


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