मगहरः जहां कबीर ने लाया सभी धर्मों को एक जगह

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मेरा शहर या कहूं एक छोटा सा कस्बा मगहर। कबीर का शहर मगहर, साम्प्रदायिक सौहार्द का नगर मगहर, अपना हम सबका प्यारा घर मगहर। तुम्हें पता है मित्र, जब सुबह की बांग देते मुर्गों के बीच हमें अजान, घंट-घडियाल और कबीर के दोहों का मिश्रित धुन सुनाई देता है, मां कसम पूरा दिन बन जाता है। इस बने हुए दिन को मीठा बनाती है कुमार हलवाई की लबालब चासनी से भरी जलेबी,बशर्ते इसके लिए तुम्हे बहुत मशक्कत करनी पड़ सकती है। मित्र,कुमार हलवाई की जलेबी इतनी फेमस है कि भोर से ही लम्बी लाइन लग जाती है। बाकी दिन के इस मीठे आगाज़ को खूबसूरत अंजाम देने के लिए हमारा ‘कबीर चौरा’ है ही।

कबीर चौरा, जहां पर प्रसिद्ध फक्कड़ संत कबीर दास ने निर्वाण प्राप्त किया था। बताते हैं कि कबीर के समय यह मिथक प्रचलित था कि जो बनारस में मरता है वह स्वर्ग को प्राप्त होता है, वहीं जो मगहर में मरता है वह नरक को जाता है। कबीर, जो आडम्बर, पाखंडों और मिथकों को तोड़ने वाले माने जाते थे, ने इस मिथक को भी तोड़ने का संकल्प लिया और अपने जीवन का अंतिम कुछ समय मगहर में ही बिताया।

“क्या काशी क्या उसर मगहर, जो पाई राम बस मोरा,

जो काशी तन तजै कबीरा, रामहि कौन निहोरा।”

आमी नदी

आमी नदी

कबीर-चौरा, आमी नदी के तट पर स्थित एक विशाल सा प्रांगण, जहां पर कबीर दास की गुफा स्थित है। यहाँ एक तरफ शिव मंदिर है तो दूसरी तरफ जामा मस्जिद भी, एक तरफ कबीर की समाधि भी है, तो दूसरी तरफ मजार भी।अपने इन विशिष्ट स्थापत्यों के लिए कबीर-चौरा पूरे क्षेत्र में साम्प्रदायिक सौहार्द का एक अद्भुत प्रतीक माना जाता है।

कबीर की समाधि

आमी नदी के दूसरी तरफ एक भव्य गुरूद्वारा भी है, जिसके कारण पूरा कबीर चौरा प्रांगण सर्वधर्म समभाव का एक संगम स्थल सा प्रतीत होता है। इसके अलावा ‘कबीर उद्यान’ के रंग बिरंगे फूल और फल पर्यटकों को अत्यधिक आकर्षित करते है।

मगहर क्रिकेट टीम

कबीर चौरा धाम

आस-पास कई बड़े मैदान भी हैं, जहा पर शाम आते-आते क्रिकेट और फुटबॉल खेलने वाले खिलाड़ी अपना कौशल दिखाने लगते है। क्रिकेट का गढ़ माने जाने वाले इस देश में फुटबॉल होने के ‘सुखद आश्चर्य’ का अनुभव हमारे नगर में भी मिल जाएगा मित्र।

दिलचस्प बात ये है कि इस खेल (फुटबॉल) के कारण हिन्दू और मुस्लिम युवा एक दूसरे के काफी नजदीक आए हैं और इसी बहाने ही सही एक दूसरे के कौम को जानने-समझने लगे है। इससे पहले इन युवाओं की अलग-अलग क्रिकेट टीमें होती थी और बहुत ही कट्टरता के साथ क्रिकेट खेला जाता था। कई बार तो क्रिकेट टूर्नामेंटों में मार-पीट की नौबत आ जाती थी।

तुम्हें शायद पता हो मित्र इसी कबीर-चौरा प्रांगण में गुलाबी ठण्ड के दिनों में 12 जनवरी से 18 जनवरी के बीच भव्य ‘मगहर-महोत्सव’ का आयोजन भी होता है। ‘खिचड़ी’ के मौके पर लगने वाले इस सरकारी मेले में राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय अनेक कलाकार और कलाकारों का समूह अपना सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करता है। इसमें कव्वाली, कवि-सम्मलेन, आल्हा, बिरहा, सूफी संगीत आदि प्रमुख है। इसके अलावा कुश्ती, दंगल, वालीबाल, खो-खो, क्रिकेट जैसे प्रतियोगिताओं का भी आयोजन होता है, जिससे स्थानीय प्रतिभाएं भी उभर कर सामने आती है।

मगहर महोत्सव

महोत्सव के दृश्य

कस्बे के एक तरफ जहां कबीर-चौरे का शांत इलाका है वहीं दूसरी तरफ कस्बे का शोरगुल वाला इलाका जहां पर काजीपुर चौराहा, मिल चौराहा, शेरपुर चौराहा, गांधी आश्रम चौराहा, बड़ा बाजार, छोटा बाजार, रानी बाजार आदि स्थित है। इन बाजारों में हमारी शामें गुलजार होती हैं और चाट-पकौड़ों, समोसों के संग चटपटी भी। हमारे कस्बे में एक सूती मिल भी हुआ करता था, जिससे क्षेत्र के युवाओं को रोजगार मिल रहा था। हालांकि विभिन्न प्रशासनिक कारणों से वर्तमान में यह मिल बंद पड़ा है।

गाँधी के कुटीर उद्योगों को मूर्त रुप देता कस्बें का गांधी आश्रम पूंजीवाद के इस तेज दौड़ में भी गांधीवाद के धीमेपन को अपने अन्दर जिन्दा रखा है। हालांकि इसके हालात अभी कुछ अच्छे नहीं चल रहें।

गांधी आश्रम

कस्बे के दूसरे छोर पर स्थित सीसा मस्जिद पूरे कस्बे के ओज का प्रतीक है, जो दिन और रात खुद चमकते हुए पूरे कस्बे को भी चमकाती रहती है।

सीस मस्जिद

तो, आना कभी मेरे देस मित्र !


कबीर की नगरी के बारे में हमें लिख भेजा है दया सागर ने। दया पत्रकार हैं। इतिहास के छात्र रह चुके हैं। किताबों के साथ खुद को भी पलटते रहते हैं। कहते हैं कि अभी खुद को तलाश रहे हैं। खोज लेंगे तो बताएंगे कि क्या मिला। कबीर के विचारों से ओतप्रोत रहते हैं। लोगों को प्रेरित करते रहते हैं कि खूब पढ़ो कबीर के बारे में।अपने शहर से बड़ा प्यार है। 


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1 COMMENT

  1. अत्यन्त पसंसानिय पत्रकारिता………भाई दयासागर जी

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