अगर आप तिब्ब्ती खाने के शौकीन हैं तो कनाॅट प्लेस छोड़िए, दिल्ली की इन गलियों में घूमिए

0
1213
views

दिल्ली के विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन से 15-20 मिनट की दूरी पर आईएसबीटी शाहदरा लिंक फ्लाईओवर की मेहराब के नीचे एक बड़ा ही अनजान-सा गेट है। यह गेट आपको ले जाता है एक बड़ी मार्केट मे, जहां छोटी-छोटी गलियों में एक-दूसरे से सटे स्टाल हैं। जो मूर्तियों, कपडे, जूते, पेंटिंग्स और तिब्बती कलाकृतियों से भरे पड़े हैं। आपको यहां ढेर सारे स्टाल, ज्यूलरी, प्रीशियस स्टोन, तिब्बती मसालों की दुकानें भी मिलेंगी। दीवारों पर तिब्बती भाषा में कुछ पोस्टर्स भी मिल जायेंगे। कुछ दूर चलेंगे तो आप एक खुली जगह में खुद को पाएंगे। जो चौक की तरह है, जिनमें मंदिर बने हैं जो बौद्ध धर्म के प्रतीक हैं। यहां दीवारों से लेकर मसालों तक हर चीज में तिब्बती मेल है। इसी मजूमे में हमने कुछ ढ़ूंढ़ा है जो आपको कनाॅट प्लेस से बाहर जाने को मजबूर कर देगा।

इलाका- मजनू का टीला

मजनू का टीला दिल्ली के प्राचीनतम गुरुद्वारों में से एक माना जाता है। यह जगह यमुना नदी के किनारे है। कहा जाता है कि यहां मजनू शाह नाम के एक सूफी संत हुआ करते थे जो फ्री में अपनी नाव से आम लोगों को नदी पार करवाते थे। सिखों के दसवें गुरु नानकदेव से मुलाकात के बाद गुरु नानक ने इस गुरुद्वारे का नाम मजनू शाह के नाम पर ही ‘मजनू का टीला’ रख दिया।

बाजार में रखा एक आभूषण

सन 1900 के आस-पास अंग्रेजो ने यहां मजदूरों को बसाना शुरू कर दिया। जिसे तब लेबर्स कॉलोनी कहा गया। आजादी के बाद यहां नई कॉलोनी बसाई गई जिसे अरुणा विहार नाम दिया गया। 1959-1960 में जब दलाई लामा भारत आये और उनके साथ कई परिवार भी आये। जो अपने साथ वहां का खान-पान, संस्कृति, ओढ़ना-पहनना आदि लाये। इसे तबसे न्यू अरुणा विहार कॉलोनी कहा जाने लगा।

तिब्बती स्ट्रीट फूड की वैरायटी

अगर आप मजनू का टीला घूमने जा रहे हैं तो पहले वहां के बारे में कुछ जान लीजिए। यहां एशियन और ओरिएण्टल कुजीन का काफी कुछ मिलता है। मूलतः नेपाल, तिब्बत से जुड़े कुजीन की भरमार आपको यहां मिल जाएंगी। यहां आपको मिलेगा लेफिन जो कि एक तरह का स्ट्रीट फूड है। यहां कई तरह के मोमोज भी मिलते हैं। जैसे फ्राइड मोमोज, पैन मोमोज, शाया भाले। शाया भाले, उत्तर भारतीय मिठाई गुझिया की तरह के शेप का होता है। अगर आप नूडल्स प्रेमी है तो ये जगह आपके लिए बेस्ट है।

नूडल और सूप के साथ मिलने वाला स्ट्रीट फूड, लेफिन

कोरियन खाने में आपको किमबाप मिलेगा जिसे हम सुशी का स्ट्रीट फूड वर्जन भी कह सकते हैं। यह चावल, सीवीड और सब्जियों से मिलकर बना होता है। कुल मिलाकर अगर आप भारतीय मूल के खाने से हटकर कुछ खाना चाहते हैं और तीन-चार सौ रुपए खर्च करने को तैयार है तो तिब्बती, कोरियन, जापानी खाने के लिए ये जगह जन्नत है।

कॉलोनी लीगल है?

2006 में दिल्ली सरकार ने कहा था कि वह यमुना के किनारे का चौड़ीकरण और सुंदरीकरण करने के लिए इसको तोड़ना चाहते हैं। जिसमें शायद कुछ घर तोड़े भी गए थे लेकिन कोर्ट की रोक के बाद आज यह दिल्ली की उन कॉलोनियों में आती है, जिन्हें अप्रूव किया जाना बाकी है।

तिब्बती मठ के आस-पास सुकून भरे माहौल में चट-पट खाने का अलग ही मजा होता है

अगर आप इस जगह को और एक्सप्लोर करेंगे तो पाएंगे कि यहां चिकन का आचार, भैंसे के मीट का आचार, याक के दूध से बनी चीजें भी मिलेंगी जिन्हें हम आमतौर पर बाजार में या आम किराने की दुकानों पर नही पाते हैं।

तिब्बती कॉलोनी की इन संकरी गलियों में शायद धूप नहीं आती लेकिन फिर भी सूर्य-सा तेज लिए छोटी-छोटी बच्चियों को बेखौफ नाचते देखना मानो दुनिया का सबसे खूबसूरत नाच देखना हो। इलाकें में बने मंदिरों की घंटियों की आवाज सुनना धरती की सबसे मीठी आवाज सुनने जैसा है।

कोरियन डिश: किमबाप

केवल कनॉट प्लेस और दिल्ली हाट को दिल्ली समझने वालों अपना भ्रम तोड़ो। दिल्ली का अलहदा सा रंग देखना है, दिल्ली का सौहार्द देखना है, दिल्ली का बड़ा सा दिल देखना है तो फौरन मजनूं का टीला पहुंचो।


दिल्ली की इस खास जगह के बारे में हमें लिख भेजा है अपूर्वा सिंह ने। अपूर्वा अभी पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही हैं और दिल्ली में रहती हैं। अपने बारे में अपूर्वा बताती हैं, बहुत कुछ सीखना चाहती हूं, शेर की तरह दहाड़ना चाहती हूं, चिड़ियों की तरह बेखौफ उड़ना चाहती हूं, तितलियों की तरह दुनिया का हर फूल सूंघकर उसकी खुशबू और उसके रंगों को महसूस करना चाहती हूं, दुनियां का हर कोना देखना चाहती हूं। 


यह भी पढेंः

दिल में उतर जाते हैं बुंदेलखंडी लोक कलाओं में बसे तमाम रंग

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here