कश्मीर 9ः कश्मीर को अलविदा कहना, दुनिया के कठिनतम कामों में से एक है

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(ये इस यात्रा की नौवीं किश्त है, पहले के भाग यहां पढ़ें)

अगले दिन हम साउथ कश्मीर के लिए निकल गए। कश्मीर का हर रास्ता आपको अपनी खूबसूरती से चौंकाता है। हर एरिया अगर अपने साथ खतरा लिए हुए है तो खूबसूरती का भी कोई तोड़ नहीं है। हमें पहले अंतननाग जाना था। अंतननाग जिसे वहां के लोकल इस्लामाबाद कहते हैं या फिर अंतनाग। वहां भी हमें एक नई दोस्त से मिलना था। उनके घर पहुंचकर हमनें उन्हें लिया और पहलगाम के लिए निकल गए।

पहलगाम का पूरा रास्ता इतना सुंदर है कि आप हर जगह रुककर उस जगह को अपने जेहन में कैद करना चाहते हैं। हरा और नीला रंग लिए बहता पानी, पानी का शोर, नीला आसामान और उस आसामन को छूता हुआ सफेद पर्वत। रंगों का इतना सुंदर मेल देखकर एक पल आपको अपनी आंखों पर यकीन नहीं होगा। लेकिन ये सब सच था। पहलगाम की खूबसूरती को घंटों निहारने के बाद हम मार्तंड सन टेंपल देखने निकल गए।

मार्तंड सन टेंपल

इस टेंपल को आपने शाहिद कपूर की फिल्म ‘हैदर’ के गाने बिस्मिल्ल में देखा होगा। ये जगह भी कमाल की खूबसूरत है। जगह से भी ज्यादा सुंदर वहां तक पहुंचने का रास्ता है। पहाड़ों के बीच जिंग-जैग करता रास्ता, सड़क के दोनों तरफ चिनार के पेड़ जो कि अपने पीले पत्तों के साथ गजब की खूबसूरती समेटे हुए थे।

मार्तंड सन टेंपल

पहलगाम से लौटकर हमने अपने नई कश्मीरी दोस्त के घर खाना खाया। फिर से वहीं पैटर्न दस्तरखान बिछाना, आपका हाथ धुलाना, फिर आपके सामने नॉनवेज-वेज बेहतरीन डिश पेश करना। कश्मीर के लोग बेहद इत्मीनान से खाना खिलाते हैं। पहली बार में ही आपका प्लेट इतना भर जाता है कि मेरे जैसे कम खाने वाले लोग दोबारा कुछ लेने की हालात में नहीं होते हैं।

लेकिन उसके बाद भी कहा जाता है, आप खुद से ले लो वरना हमारे यहां जबरदस्ती भी खिलाया जाता है। ये चीज लगभग हर घर में हमारे साथ हुई। कश्मीर के लोग खाने में मिर्च का भरपूर इस्तेमाल करते हैं लेकिन मेरी दोस्त मिर्च बहुत कम खाती है तो इस बात का भी ख्याल रखा गया था।

शाम ‘चाय जाय’ के पास

शाम में अंतननाग से लौटकर हमने श्रीनगर के मशहूर ‘चाय जाय’ कैफे में जाने का सोचा। वहां जाकर हम सबको कुछ समय साथ बिताना था क्योंकि अगली सुबह हमें दिल्ली के लिए रवाना होना था। इन छह दिनों में हमें हर जगह इतना प्यार मिला था कि अब हम कश्मीर में और रुकना चाहते थे। हर एक बीतते दिन के साथ एक-दूसरे से कहते थे, यार हमें यहां से नहीं जाना। अभी लौटे भी नहीं थे कि फिर से वापस आने की प्लानिंग करने लगे थे।

‘चाय जाय’ कैफे पहुंचकर मैं बिल्कुल शांत हो चुकी थी। बस दिमाग में चल रहा था कि कल सुबह ये जगह हमसे छूटने वाली है। फैज और अब्दुल्ला मेरी ओर देख कर कह रहे थे, अरे अभी तो पूरी रात है। पर मैं कुछ भी बोलना नहीं चाहती थी। क्योंकि मुझे पता था कि मैं रो पडूंगी। गला भरा हुआ था, आंखों में आंसू थे क्योंकि मैं उन्हें बाहर नहीं आने देना चाहती थी। नजर नीचे झुकाए जमीन को तब तक देखती रही जब तक कि आंसू रुक ना जाएं।

कश्मीर! याद रहोगे तुम

मैं उन लोगों के लिए रो रही थी, जिन्हें छह दिन पहले तक जानती तक नहीं थीं। ये उनकी अच्छाई और मेहमान नवाजी थी, जिसने हमें इस कदर खुद से जोड़ा लिया था। ऐसा लगा रहा था कि सालों से जानते हैं एक-दूसरे को। खैर, अपनी भावनाओं के समेटते हुए मैं होटल पहुंची और गैलरी में पड़ी कश्मीर की एक-एक फोटो को देख उन सारे पलों को याद किया। कब आंख लगी, पता ही नहीं चला।

सुबह के अलार्म के साथ नींद खुली, हम तैयार हुए। फिर से वायदे के मुताबिक फैज हमें लेने आए थे। लेकिन इस बार कहीं घूमने के लिए नहीं, बल्कि अलविदा कहने के लिए। उन्होंने हम दोनों को जम्मू जाने वाली गाड़ी में बिठाया। गाड़ी में बैठाने से पहले हमने एक-दूसरे के गले लगकर उनसे दिल्ली आने का वादा लिया और हमने श्रीनगर वापस आने का वादा किया। ये भी कि कोई कहीं भी रहे एक-दूसरे से बात करते रहेंगे और अपना ख्याल रखेंगे। जम्मू की गाड़ी में बैठने का बाद मैं टिकट बुक कराने से लेकर आखिर दिन तक हर चीज को फिर से याद करने लगी।

(इति कश्मीर यात्रा)


कश्मीर की अपनी इस यात्रा के बारे में हमें लिखकर भेज रही हैं भारती द्विवेदी। भारती दिल्ली में पत्रकार हैं। मूलतः बिहार की हैं। इनकी शान में दोस्त लोग इन्हें ‘मनमौजी बिहारन’ कहकर पुकारते हैं। तेजस्वी नयनों की मालकिन हैं, मुंहफट हैं, बेबाक हैं और बहुत ही ज्यादा प्यारी हैं, दरवाजे पर लटके विंडचाइम की माफिक। ये लिखने पर हमें इनकी तरफ से उलाहना आएंगी लेकिन एक अभिनेत्री हैं, तापसी पन्नू। उनकी शक्ल हूबहू भारती से मिलती है।


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