मेहरानगढ़: जोधपुर की शान में जड़ा एक बेशकीमती नगीना

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वैसे तो दिल्ली से मेहरानगढ़ जाने में (ट्रेन से) 10 से 12 घंटे लगते हैं, लेकिन मुझे मेहरानगढ़ जाने में 4 साल लग गए। मैं तीन साल जयपुर में रहा, इस दरम्यान तकरीबन तीन सौ बार जोधपुर के मेहरानगढ़ जाने का प्लान बना लेकिन वो सिर्फ प्लान ही बन कर रह गया। मेहरानगढ़ के बारे में काफी सुना था, कहा जाता है कि आपने मेहरानगढ़ नहीं देखा तो आप राजस्थान की स्थापत्य कला को नहीं समझ सकते। ऐसी खूबसूरती और बनावट है इस किले कि ठहरकर सोचने पर मजबूर कर दे।
दिल्ली में सितंबर का शानदार महीना था। रात को लगभग नौ बजे दोस्तों के साथ राजस्थान जाने की बातें चल रही थीं, तभी जिक्र आया जोधपुर का। अब जोधपुर की बात होने पर मेहरानगढ़ का जिक्र होना तो लाजिमी था। भले ही हम तीन सौ बार प्लान बनाकर कैंसल कर चुके थे, लेकिन इस बार तो हमें जाना ही था। सोचने के लिए दिमाग को टाइम ही नहीं दिया उसी वक्त उठाया अपना झोला और निकल पड़े, तीन दोस्त। सिर्फ मंजिल का पता था, रास्ते का कुछ नहीं। डीटीसी में बैठ ट्रेन का पता किया, ट्रेन थी रात ग्यारह बजे सराय रोहिल्ला से जोधपुर तक की। दस बज चुके थे, हम दौड़े कि कहीं लेट ना हो जाएं। लेकिन जहां एक और ट्रेन के छूट जाने का डर था वहीं दूसरी ओर भारतीय रेल पर पूरा भरोसा भी था कि टाइम पर आ जाए वो भारतीय रेल नहीं। उस दिन भी ट्रेन तीस मिनट लेट थी। हम सवा ग्यारह पर पंहुचे।
टिकट लेने का टाइम नहीं था, तो बिना टिकट के ही जनरल डिब्बे में बैठ गए। एक सुकून था कि ट्रेन खाली थी, लेकिन दूसरी तरफ टीटी के आने का डर। फिर मन में सोचा, जो होगा सो देखा जाएगा। यहां से शुरू हुआ हमारा शानदार सफर। रात के बारह बजे हम रवाना हुए इस शानदार सफर पर, लेकिन सही मायनों में हमारा सफर शानदार बना सुबह चार बजे के बाद। हल्की सी सर्दी के बीच जोधपुर सुपर फास्ट एक्सप्रेस कभी रेत के टीलों तो कभी लहलहाते हुए खेतों के बीच से गुजर रही थी। उजाड़, बंजर पड़ी, दूर-दूर तक फैली जमीन पर एक छोटी सी झोपड़ी भी किसी आलीशान महल जैसा सुकून देने वाली लग रही थी।
मैं ट्रेन के गेट के पायदान पर आकर बैठ गया। खूबसूरत सफर का आनंद ले रहा था। रेत के टीलों के बीच से उगते हुए सूरज को देखना एक अविस्मरणीय अनुभव था। लेकिन ये सुहाना पल जल्द ही खत्म हो गया जब टीटी ने  आ कर नॉक-नॉक कहा। बिना टिकट के सफर करने का यह पहला अनुभव था और मैं तो भूल ही चुका था कि हमारे पास टिकट नहीं है। टीटी भाईसाहब को झूठी कहानी सुनानी पड़ी। अब सच बताते तो वो जोधपुर नहीं सीधा जेल ले जाने के चक्कर में थे। खैर काफी समझाने के बाद उन्होंने तीन के बजाए एक ही चालान (पर्ची) बनाई।
सुबह करीब हम दस बजे जोधपुर पंहुचे। जोधपुर उतरते ही वहां के नीले आसमान के बजाए हमारी नजर सीधे ऊंची दूर पहाड़ी पर स्थित मेहरानगढ़ पर पड़ी। गजब, शानदार, कमाल। कुछ देर तक मैं बस उसे देखता ही रहा। वहां का रास्ता आपको किसी से पूछने की जरूरत नहीं, बस मेहरानगढ़ को देखते रहिए और चलते जाइए। कुछ दूर पैदल चलने के बाद हमने तांगा (घोड़ा गाड़ी) लिया। खूबसूरत पहाड़ियों के बीच से जोधपुर की शानदार हवेलियों को देखते हुए हम पंहुच गए मेहरानगढ़। ऊंचाई से जोधपुर को देखने पर ऊपर आसमान नीला और नीचे पूरा जोधपुर भी नीला ही नजर आता है, क्योंकि यहां के ज्यादातर घर नीले रंग में रंगे हुए हैं इसीलिए जोधपुर को ‘ब्लू सिटी’ भी कहते हैं।
मैं और मेरे दो हमसफर
एक और चीज और है जो जोधपुर में आपका ध्यान आकर्षित करती है। वो है बेहद ही विशाल और शानदार उम्मेद पैलेस। हरे-भरे जंगलो के बीच से नजर आता ये महल वाकई में दिलकश है। ऊंची पहाड़ी से दूसरी तरफ देखो तो नजर आता है जसवंत थड़ा, जिस तरह से आसमान में चांद के पास का चमकीला तारा उसकी खूबसूरती को बढ़ा देता है, ठीक वैसे ही मेहरानगढ़ के पास ही स्थित जसवंत थड़ा भी मेहरानगढ़ की खूबसूरत में चार चांद लगा रहा था। इधर ही सफेद संगमरमर से बना एक खूबसूरत स्मारक है। यह स्थान जोधपुर राजपरिवार के सदस्यों के दाह संस्कार के लिये सुरक्षित रखा गया है। इस विशाल स्मारक में संगमरमर की कुछ ऐसी शिलाएं भी दीवारों में लगी है जिनसे सूर्य की किरणें आर-पार जाती हैं। स्मारक के पास ही एक छोटी सी झील है जो स्मारक के सौंदर्य को और बढ़ा देती है।
अब बढ़ते हैं मेहरानगढ़ की ओर, इसके नीचे खड़े हो कर देखेंगे तो किले की पूरी लंबाई नाप ही नहीं पाएंगे। एक दम सीधी पहाड़ी पर बने किले के अंदर जाने के लिए कई दरवाजों से हो कर गुजरना पड़ता है। किले के अंदर कई भव्य महल, अद्भुत नक्काशीदार किवाड़, जालीदार खिड़कियां हैं। इनमें से उल्लेखनीय हैं मोती महल, फूल महल, शीश महल, सिलेह खाना, दौलत खाना आदि। इन महलों में भारतीय राजवेशों के साज सामान का विस्मयकारी अद्भूत संग्रह है।

अद्भुत बनावट, कमाल का वास्तुशिल्प

भारत के समृद्धशाली अतीत का प्रतीक राजस्थान के जोधपुर शहर में पंद्रहवी शताब्दी का यह विशालकाय किला, पथरीली चट्टान पहाड़ी पर, मैदान से 125 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। आठ द्वारों व अनगिनत बुरजों से युक्त दस किलोमीटर लंबी ऊंची दीवार से घिरा है। इस किले को देख कर आश्चर्य होता है कि इसे बनाया कैसे गया होगा। यह किला भारत के प्राचीनतम किलों में से एक है।

नक्काशी ऐसी कि आंखें चौंधिया जाएं

शानदार नक्काशी

खड़ी, मयूर के आकार की पहाड़ी पर बने इस किले की नींव का अंदाजा आप लगा ही नहीं सकते। इस पहाड़ी को भोर चिड़िया के नाम से भी जाना जाता था, क्योंकि यहां काफी पक्षी रहते थे। बेहद विशाल यह किला बाहर से अदृश्य, घुमावदार सड़कों से जुड़ा है, जिसके सात (आठवां अदृश्य) द्वार हैं। किले में एक शानदार संग्राहलय है जिसे देखे बिना यहां की यात्रा अधूरी ही है। इस किले का एक हिस्सा संग्रहालय में बदल दिया गया जहां शाही पालकियों का एक बड़ा संग्रह है। इस संग्रहालय में चौदह कमरे हैं जो शाही हथियारों, गहनों, और वेश-भूषाओं से सजे हैं। इसके अलावा, आगंतुक यहां मोती महल, फूल महल, शीशा महल, और झांकी महल को भी देख सकते हैं। इस संग्रहालय को इस प्रकार से व्यवस्थित किया गया है कि बस आप चलते जाइए और चौदह कमरों की सैर आप कब कर लेंगे, ये आपको पता भी वहीं चलेगा। नक्काशीदार खिड़कियों से नीचे झांकने पर बेहद खूबसूरत नजारा देखने को मिलता है, लेकिन ध्यान रखिएगा चक्कर भी आ सकते हैं।

मोती महल

अब आता है मोती महल, जिसे पर्ल पैलेस के नाम से भी जाना जाता है। ये किले का सबसे बड़ा कमरा है। यह महल राजा सूर सिंह द्वारा बनवाया गया था, जहां वे अपनी प्रजा से मिलते थे। यहां पर्यटक ‘श्रीनगर चौकी’, जोधपुर के शाही सिंहासन को भी देख सकते हैं। यहां पांच छिपी बालकनियां हैं, जहां से राजा की पांच रानियां अदालत की कार्यवाही सुनती थीं।

फूल महल

फूल महल मेहरानगढ़ किले के विशालतम कमरों में से एक है। यह महल राजा का निजी कक्ष था। इसे फूलों के पैलेस के रूप में भी जाना जाता है, इसमें एक छत है जिसमें सोने की महीन कारीगरी है। महाराजा अभय सिंह ने अट्ठारहवीं वीं सदी में इस महल का निर्माण करवाया। माना जाता है कि मुगल योद्धा, सरबुलन्द खान पर राजा की जीत के बाद अहमदाबाद से यह सोना लूटा गया था।

शीशा महल

शीशा महल सुंदर शीशे के काम से सजा है। आगंतुक शीशा महल में चित्रित धार्मिक आकृतियों के काम को देख सकते हैं। इसे ‘शीशे के हॉल’ के रूप में भी जाना जाता है। एक तख्त विला, जिसे तख्त सिंह द्वारा बनवाया गया था, उसे भी देखा जा सकता है।

झांकी महल

झांकी महल, जहां से शाही महिलायें आंगन में हो रहे सरकारी कार्यवाही को देखती थीं, एक सुंदर महल है। वर्तमान में, यह महल शाही पालनों का एक विशाल संग्रह है। ये पालने, गिल्ट दर्पण और पक्षियों, हाथियों, और परियों की आकृतियों से सजे हैं।

मेहरानगढ़ घूमने के बाद आप चाहें तो मेहरानगढ़ के परिसर में ही लगी दुकानों से राजस्थानी कपड़ों और गहनों की खरीददारी भी कर सकते हैं। जोधपुर आएं तो यहां के फिणी वाले दूध का आनंद जरूर लें, ये शानदार होता है। जोधपुर के लोग बेहद ही सरल और दोस्ताना स्वभाव के मददगार लोग होते हैं। इनकी बोली में अलग ही मिठास होती है। यहां की जूतियां (मोजड़ी) काफी प्रसिद्ध हैं। जोधपुरी कोट अपनी शान के लिए जाना जाता है।

जाने का मन किसका है, लेकिन लौट आना ही नियति है
अब समय आता है लौटने का। जिस ट्रेन (जोधपुर सुपर फास्ट एक्सप्रेस) से हम यहां दिल्ली से आए थे उसी से लौटने का विचार बना। दोपहर के ढाई बजे समय था उस ट्रेन के छूटने का। इस बार हमने टिकट ली थी। हम वापस लौट आए ढेर सारी खूबसूरत यादों और थोड़ी सी थकान के साथ।

राजस्थान खजाना है, हर लिहाज से। लोक संस्कृति, खान-पान, वेशभूषा, इमारतें, ऐतिहासिक विरासतें, क्या कुछ नहीं है वहां। जोधपुर के इस नायाब किले के बारे में हमें लिख भेजा है राहुल ने। राहुल पत्रकार हैं। अपनी रैतीली मिट्टी से काफी जुड़ाव रखते हैं। मारवाड़ी में क्या सरपट बोलते हैं। बहुत ही नेकदिल इंसान हैं। दोस्तों के लिए तो जान भी हाजिर है। घूमने का ज्यादा मौका निकाल नहीं पाए थे अब तक लेकिन दिल ने कहा बस बहुत हुआ। अब हाल ये है, मौका खुद बनाकर अपना सफरनामा लिखने निकल जाते हैं।


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