महरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क में क्या-क्या देखने लायक है?

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कुतुबमीनार कहां है? दिल्ली में। दिल्ली में कहां? महरौली में। महरौली में इस विश्व विख्यात इमारत के अलावा और क्या-क्या है देखने को? नहीं पता।

नहीं पता है तो अब कर लीजिए। जिस इलाके को पुरानी दिल्ली कहा जाता है, उससे पहले ही तुगलकाबाद, लाडो सराय और महरौली जैसे इलाके बसाए गए थे। यह इतिहास में भी दर्ज है। महरौली में मुगल काल और उससे भी पहले का इतिहास दफ्न है। दिल्ली में महरौली सबसे अधिक आकर्षक टूरिस्ट लोकेशन कहलाता है। वैसे तो टूरिस्ट सबसे अधिक कुतुब मीनार को देखने आते है लेकिन यहां पर आसपास इतिहास का अटूट खजाना दबा पड़ा है।

गयासुद्दीन बलबन का मकबरा

महरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क स्थित गयासुद्दीन बलबन का मकबरा खंडहर में तब्दील हो चुका है। मकबरे के संरक्षण की जिम्मेदारी आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के पास है। आर्कियोलॉजिकल पार्क, कुतुबमीनार के पास है। एएसआई के संरक्षण में होने के बावजूद बलबन के मकबरे की हालत बहुत खराब है। कब्र कई जगह से टूट-फूट गई है।

मकबरे के ब्यूटिफिकेशन पर ध्यान नहीं दिया गया है, जिससे बड़ी-बड़ी झाड़ियां भी उग आई हैं। मकबरे के बारे में जानकारी देने के लिए एक इन्फर्मेशन बोर्ड है, जिससे पता चलता है कि यह एएसआई के संरक्षण में है। हालांकि, मकबरे के अवशेष ही बचे हैं, लेकिन उसकी देखरेख को लेकर गंभीरता नहीं दिखती।

बलबन की कब्र पर अरबी या फारसी में कुछ खुदा है, लेकिन एएसआई को अब तक इस बारे में पता नहीं है कि लिखा क्या गया है। एएसआई की कोशिश है कि कब्र पर खुदे वाक्यों को पढ़ा जाए। इसके बाद उसका हिंदी अनुवाद भी मकबरे में लगाने पर विचार किया जा सकता है, ताकि लोगों को इस बारे में पता चल सके।

गयासुद्दीन बलबन गुलाम वंश (1206-1290) का शासक था। दिल्ली सल्तनत पर बलबन ने 1266-1287 तक शासन किया। वह पहले इल्तुतमिश का तुर्क गुलाम था, जो नसीरुद्दीन महमूद के शासनकाल में वजीर था। महमूद की मौत के बाद बलबन जबरन गद्दी पर जा बैठा। फिर बलबन ने 1266 से लेकर 1286 तक शासन किया। 1287 में उसकी मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसका यह मकबरा बनवाया गया।

राजाओं की बावड़ी

इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली में बने हुए लाल किला, कुतुब मीनार, हुमायूं का मकबरा जैसे कई ऐतिहासिक स्थल दुनिया भर में मशहूर हैं, लेकिन कई ऐसी भी विरासतें दिल्ली में आज भी मौजदू हैं, जिनकी जानकारी खुद दिल्ली वालों को भी नहीं है। इनमें से एक है सिंकदर लोदी द्वारा बनाई गई राजाओं की बावड़ी है।

राजाओं की बावड़ी को 1516 में सिकंदर लोदी के शासन में दौलत खान ने बनवाया था। राजाओं की बावड़ी शब्द का मतलब यह बिल्कुल नहीं है यह राजाओं के लिए बनवाई गई थी। बल्कि यह बावड़ी उस वक्त बावड़ी के आस-पास काम करने वालों के लिए बनाई गई थी। राजाओं की बावड़ी के करीब ही एक मस्जिद भी है।

सिकंदर लोदी ने मस्जिद में काम करने वालों और अन्य कुछ के लिए इस बावड़ी में आने जाने और यहां पर काम करना देखभाल करना तय कर रखा था। सिकंदर के काल में यमुना नदी से काफी दूर बसाए गए शहर महरौली में पानी की कमी न हो इसके लिए पानी की बावड़ियां बनाई गई थी जो उस वक्त की दिल्ली शहर के नुमाइंदों को पानी की कमी नहीं होने देती थी।

मेटकाफ फॅाल

छतरीनुमा निर्माण, मेटकाफ फॅाल। जिसे थॉमस मेटकाफ ने ब्रिटिश बाग-बगीचों की तर्ज पर एक ऊंचा टीला बनवाकर उस पर बनवाया थाय थॉमस मेटकाफ मुगल दरबार में ईस्ट इंडिया कंपनी के रेजिडेंट (एजेंट) थे। मुगल सल्तनत उनके इशारों पर चलती थी। बहादुर शाह जफर नाम मात्र के बादशाह हुआ करते थे। इसलिए मेटकाफ स्वयं को मुगल बादशाह जैसे ठाठ-बाट में रहते हुए दिखाना चाहते थे।

मेटकाफ ने मुगलों से महरौली का यह क्षेत्र, जो कुछ इस इलाके में था, जैसे मस्जिद, मकबरे नहर मवेशियां आदि, खरीद लिया और इस इलाके को अपने अनुसार संवारना शुरू किया। बहती छोटी नदियों का रास्ता मोड़ कर रिजवे बनवाया,ऊंचे टीले, बोट हाउस, बाग-बगीचे आदि बनवाये।

मेटकाफ ने अकबर की दाई मां के बेटे कुली खां के मकबरे को अपने निवास में बदल दिया था। इस कोठी में काम करने वाले भारतीय, सही उच्चारण न कर सकने के कारण मेहरौली के मेटकाफ हाउस को “मटका कोठी” कहा करते थे। मेटकाफ इसे नव विवाहित जोड़ो को हनीमून के लिए किराए पर भी दिया करते थे।

मेटकाफ द्वारा मेहरौली के इस क्षेत्र को अपनी आरामगाह के रूप में चुनने के पीछे भी एक मकसद था। दरअसल तत्कालीन मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर, लाल किले से मेहरौली में कुतुब कॅाम्लेक्स के समीप स्थित जफर महल में गर्मियों के मौसम में दो माह व्यतीत करने आते थे साथ ही जहानाबाद ( पुरानी दिल्ली ) के साधन सम्पन्न लोग, गर्मियों में मेहरौली आ जाया करते थे, इन पर नजर रखने के लिए मेटकाफ ने इस क्षेत्र को अपनी आरामगाह के रूप में चुना था।

मेटकाफ का सरकारी निवास पुरानी दिल्ली में “मेटकाफ हाउस” हुआ करता था लेकिन कहा जाता है कि मेटकाफ ने अपनी बेटी के साथ अधिकांश समय यहीं दिलखुशा में बिताया। पुरानी दिल्ली के मेटकाफ हाउस में उनकी पत्नी और बेटा रहा करते थे।

वर्तमान में महरौली के आसपास के गांवों की जमीन पर अनेकों फार्म हाउस बन गए हैं मेटकाफ द्वारा संवर्धित इस क्षेत्र को महरौली का पहला फार्म हाउस भी कहा जा सकता है। यहां मेटकाफ छुट्टियों का आनंद लेने आया करते थे। आज सम्पन्न लोगों के फार्म हाउसों तक आम आदमी का पहुंचाना सम्भव नहीं! लेकिन मेटकाफ के दिलखुशा तक हर कोई बेरोकटोक पहुंच सकता है।

अरावली पर्वतमाला क्षेत्र में स्थित दिल्ली के मेहरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क और इस इलाके के पास की तीन मशहूर बावली हैं:

1.अनंगताल बावली
2.राजों की बावली और
3.गंधक वाली बावली

इनमें से अनंगताल बावली मेहरौली पुरातत्व पार्क के बाहर योगमाया मन्दिर के पास स्थित है।

और क्या-क्या?

रोज गार्डन,खान शाहिद (बलबन का पुत्र) का मकबरा, बलबन के पुत्र खान शाहिद के मकबरे का प्रवेश,कुली खान की कब्र से कुतुबमीनार देखना, कुली खान का मकबरा और पार्क में जगह-जगह बनें गुम्बद भी देखने लायक हैं।


दिल्ली के इस रहस्यमयी कोने के बारे में लिख भेजा है निकिता शेरावत ने। निकिता उत्तराखंड मे कानून की पढ़ाई कर रही हैं। इनका जन्म उत्तरप्रदेश के संभल में छोटे से गांव में हुआ। बचपन गांव में बीता और वहीं से जागा घूमने का कीड़ा। निकिता आगे बताती हैं, कोर्स सही चुन लिया तो डिबेट के बहाने अलग अलग शहर में आना जाना लगा ही रहता है, खासकर दिल्ली। जहां घूमती हूं, उस जगह के अंदर घुस जाती हूं। और जिंदगी ऐसे ही चलती रहे यही तमन्ना है।


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