मज़ार-ए-ग़ालिब: दिल्ली की गलियों में गुमनाम सी हिंदुस्तान के अज़ीम शाइर की आवाज़ें

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मिर्ज़ा के मज़ार पर देरीना हसरत की तस्वीर

कई बार बैठे-बैठे जी में आया कि उर्दू नज़्म के सबसे अहम् शाइर मीराजी की तरह आम की टोकरी लूँ, अच्छी शराब खरीदूँ और मिर्ज़ा से मिल आऊँ; कि देखो मिर्ज़ा क्या लाया हूँ । लेकिन मुझ बद-बख़्त से हो नहीं पाया, शायद इस बात का ख़ौफ़ था कि लोग ख़ब्ती और दीवाना कह कर मारेंगे।

साहित्य-वाहित्य को किनारे रख कर सोचता हूँ तो ग़ालिब मेरे ज़ेहन में यूँ दस्तक देते हैं कि हमारे गली-मोहल्ले वाले प्रेम पत्र के हर शेर के शाइर यही होते थे। ‘ख़त लिखता हूँ ख़ून से स्याही न समझना’ से लेकर तकिया, चादर और मेन गेट के डिज़ाइनर पर्दे तक की शेर-ओ-शाइरी को हम इन्हीं का लिखा समझते थे।

यूँ कह लीजिए कि ‘ग़ालिब-ए-ख़स्ता’ के बग़ैर हमारी महबूबा भी नहीं मानती थी। उस वक़्त तो कभी ख़याल नहीं आया, आता भी कैसे कि शायद हमें यही लगता रहा हो कि; होगा कोई ग़ालिब जो दिन भर हमारे लिए शेर कहता है। आख़िर क्यों तमाम उल्टे-सीधे शेर इनके नाम से लिखे जाते थे? शायद शाइर का मतलब ही ग़ालिब होता हो। कमाल की बात है कि आज भी ये धारणा किसी न किसी अर्थ में मौजूद है। ज़रा सी तुक-बंदी की जुरअत कीजिए सामने वाला कह देगा; बड़का ग़ालिब बन रहे हो बे।

ग़ालिब की मज़ार की चारदीवारी पर अंकित जानकारियां

इधर उधर की क्या बात करें ग़ालिब के सिलसिले में मिसाल की इंतिहा ही देख लीजिए, अब्दुर्रहमान बिजनौरी ने लिख दिया कि; ‘हिन्दुस्तान की इल्हामी [Revelatory] किताबें दो हैं मुक़द्दस [पवित्र] वेद और दीवान-ए-ग़ालिब’। ये वक्तव्य तर्क संगत नहीं लगने के बावजूद आज भी ग़ालिब के लिए मशहूर-तरीन ‘मुहावरा’ है।

कुल मिलाकर ग़ालिब गाँव की गलियों से किताबों की सियाही तक हमें हैरान करते रहे। स्वाभाविक है कि ऐसे ग़ालिब से मिलने की तमन्ना कहीं दिल में बेताब थी। अजीब बात है कि दिल्ली में हम ने बहुत कुछ किया, कहाँ-कहाँ नहीं गए, लेकिन जाने क्यों ग़ालिब हमारे लिए आहिस्ता-आहिस्ता गंभीर होते चले गए।

मैं पहली बार दिल्ली 12-13 बरस पहले आया था, और अब दिल्ली ही दुनिया है। इन तमाम बरसों में जाने कितनी बार महबूब-ए-इलाही यानि हजरत निज़ामुद्दीन औलिया की बस्ती में जाना हुआ। वलियों की इस बस्ती में हमारी एक एक पसंदीदा जगह बन गई थी, वहीँ बैठ कर हम पेट के अरमान निकाल लेते थे। उसी जगह नाक की सीध में ग़ालिब आराम फ़रमा रहे हैं। हालाँकि मै ने कभी इन दोस्तों के सामने इज़हार नहीं किया लेकिन दिल के किसी कोने में ये तमन्ना बेताब रहती थी कि एक बार ग़ालिब से मिल आऊँ।

उस के बाद भी कई बार कोशिश की, लेकिन ग़ालिब से मुलाक़ात न हो सकी। कभी कहा गया टाइम ख़त्म हो गया है, तो कभी किसी दोस्त ने कहा अगली बार। एक दफ़ा फिर ग़लत वक़्त में पहुँच गया। वही टका सा जवाब मिला, लेकिन मैं वहीँ रुक गया, मानो किसी ने क़दम रोक लिए हों। रुक इस लिए गया कि मिर्ज़ा ने एक जगह हास्य में ही सही अपना कलेजा खोल दिया है कि मैं लम यलिद वलम युलद हूँ [अर्थात ख़ुदा की तरह हूँ, कि मेरी कोई औलाद नहीं है, मेरा कोई बाप नहीं है], लेकिन वहाँ अहाते में इतने बच्चे खेल रहे थे कि मैं बस उन को देखता रह गया। जिस मिर्ज़ा के कोई औलाद नहीं बची उसकी आराम-गाह के पास बच्चे खेल रहे थे। जाने क्यों उस दिन मज़ार की ज़ियारत किए बग़ैर ही लगा कि आज मिर्ज़ा से बहुत देर बातें हुईं।

एक ज़माने में उर्दू आलोचना की अहम् किताब ‘मुक़द्दमा’ और मिर्ज़ा की जीवनी ‘यादगार-ए-ग़ालिब’ लिखने वाले अलताफ़ हुसैन हाली, ग़ालिब की क़ब्र पर फ़ातिहा पढ़ने आते थे और क़ब्र की मिट्टी दुरुस्त किया करते थे। उसी मज़ार-ए-ग़ालिब का बहुत दिनों तक कोई पुर्सान-ए-हाल नहीं था।

‘मज़ार-ए-ग़ालिब’ के कुछ और ज़ाविए

अंग्रेज़ पत्रकार Morton ने इलाहाबाद के अंग्रेज़ी रोज़नामा पायनियर में एक नोट लिख कर लोगों को याद दिलाया कि ग़ालिब की यादगार क़ायम की जाए। इसके बाद कई तरह की सोसाइटी बनाई गई फंड रेजिंग हुई। अपने-अपने वक़्तों में लोगों ने चंदे दिए, मौलाना आज़ाद के 10 रूपए से लेकर सेठ घनश्यामदास, बिरला साहब के 15000 तक की कहानियों में इल्ज़ाम-तराशियों के क़िस्से भी शम्स बदायूनी की किताब ‘मज़ार-ए-ग़ालिब’ में पढ़े जा सकते हैं ।

ख़ैर कहने की हद तक ये बात भी कही गई कि मिर्ज़ा के किसी हिंदू शागिर्द ने उनकी क़ब्र पुख़्ता करवाई थी। ग़ालिब ‘मुसलमानों’ के लिए हमेशा बद-दीन ही रहे, शायद इसलिए भी मुसलमानों ने बहुत कम दिलचस्पी ली। ऐसे में ये पढ़ना अच्छा लगता है कि ग़ालिब के मज़ार के सिलसिले में दिल खोल कर चंदा देने वाले लोग मुसलमान नहीं हैं। इन क़िस्सों को पढ़ कर मिर्ज़ा का कहा ही याद आता है कि;

हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँ न ग़र्क़-ए-दरिया

न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता

‘मज़ार-ए-ग़ालिब’ के बाहर एक कब्र की तस्वीर

मैंने ग़ालिब के मज़ार पर क्या महसूस किया ठीक-ठीक उसकी तज्सीम नहीं कर पा रहा, लेकिन ये ज़रूर लगा कि अगर ग़ालिब इरान या किसी पश्चिमी देश का शाइर होता तो उसकी तमाम यादगारें हमारी आँखों को चौंधिया रही होतीं और मज़ार पर ऐसी वीरानी न टपकती;

कोई वीरानी सी वीरानी है

दश्त को देख के घर याद आया

और आख़िर में साहिर लुधियानवी के लफ़्ज़ों में बस ये कि;

‘गाँधी’ हो कि ‘ग़ालिब’ हो इंसाफ़ की नज़रों में

हम दोनों के क़ातिल हैं दोनों के पुजारी हैं


ये ख़ूबसूरत सा विवरण हम तक फ़ैयाज़ अहमद वजीह की तरफ़ से पहुंचा है। ये उनकी तक़रीर का एक अंश भर है, पूरा ब्लॉग आप यहां पढ़ सकते हैं। फ़ैयाज़ पेशे से पत्रकार एवं अनुवादक हैं। जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से पढ़ चुके हैं। सम-सामायिक और सांस्कृतिक विषयों पर इनकी मुखर आवाज़ ख़ुद को विभिन्न मंचों पर दर्ज़ कराती रहती है। (आमतौर पर हम अपनी वेबसाइट पर मोबाइल फोन पाठकों की सुविधा के लिए नुक़्ते और चंद्रबिंदु का प्रयोग नहीं करते हैं। किंतु इस ब्यौरे की ख़ूबसूरती को देख हमने इसे जस का तस रखना ही उचित समझा।)


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