मुक्तेश्वर: ये पहली नजर का प्यार जैसा है

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‘ये हसीं वादियां ये खुला आसमां.. आ गए हम कहां ऐ मेरे साथिया..’ हमने अक्सर ये गाना सुना और गुनगुनाया है। पर क्या कभी किसी जगह के नजारों को देखकर एकाएक मुंह से ये गाना निकलता है? जरूर निकलता है जनाब, अमूमन जब आप किसी ऐसी जगह पर जाओ, जहां दूर-दूर तक हरियाली, गगन चुम्बी पहाड़ हों। कल-कल करते झरने, जिनका स्वर कानों को और दिल को सुकून देता है। सफेद और चमकीले बादलों से घिरा आसमान, बुरांश के फूलों से खिले जंगल, जो बचपन की यादों में खो जाने पर मजबूर कर देते हैं। सेब और खुमानी के बागान।

पत्थरों के बड़े-बड़े ऐसे चट्टान मानो कि पाषाणकाल से यहां पर अभी तक कोई उत्खनन न हुआ हो। मंदिरो की घंटियों के स्वरों से गूंजता वायुमंडल। मासूम भोले गांव वाले, बच्चों की मीठी मुस्कान। उनकी बातें, उनका दुलार, जो एक निर्मम इंसान को भी कविहृदय बन जाने पर मजबूर हो कर देता है।

कुमाऊं की पहाड़ियों में बसा मुक्तेश्वर उत्तराखंड का एक खूबसूरत हिल स्टेशन है। दिल्ली से करीब 350 किलोमीटर, नैनीताल से 46 किलोमीटर की दूरी पर बसे मुक्तेश्वर के लिए बस या ट्रेन से जाया जा सकता है। ट्रेन काठगोदाम तक होगी, जहां से आपको टैक्सी करनी पड़ेगी। मुक्तेश्वर में आपको मुक्तेश्वर मंदिर, चौली की जाली, आई वी आर आई व सूर्योदय के अप्रतिम नजारे देखने को मिलते हैं ।

मुक्तेश्वर का इलाका आते ही यहां हमें देवदार, बंज, खारसु, तिलोंज, काफल, सेब, पाइन, यूटीस और मेहल के सुंदर और घने आरक्षित वन देखने को मिलते हैं। इन पेड़ों के अलावा जंगली फल जामुन, हिसालु, काफल और किल्मोड़ा भी यहां मौजूद है जो कि गर्मियों में खूब पकते हैं।

सर्दियों में बर्फ से ढके मुक्तेश्वर धाम में बिल्कुल कैलाश पर्वत की तरह अनुभव होता है। रास्ते में सतबुंगा भी देख सकते हैं। यहां पर एक खूबसूरत गार्डेन है, जिसे देवबन ऑरचेर्ड के नाम से भी जाना जाता है। यहां पर सेब की कई किस्में उगाई गई हैं। इस बागान में सेब के अलावा खुमानी, आड़ू, नाशपाती, प्लम, काकू, अखरोट, बादाम और कीवी के लगभग 2200 पेड़ है ।

बहुत कम जगह ऐसी होती हैं, जहां से लौटकर आपको बस वहीं का ख्याल आता है, वहीं के चित्र दिमाग में बार-बार आते रहते हैं। यूं कहिए कि बस प्यार हो जाता है ऐसी जगह से। और मुक्तेश्वर उनमें से एक ऐसी ही जगह है।


अपनी सुंदर सी यात्रा का ब्यौरा हमें लिख भेजा है सुमन जोशी ने। सुमन का जन्म उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की सोर घाटी इलाके में हुआ था और अभी वो नैनीताल की वादियों में रहती हैं। वो अभी कुमाऊं विश्वविद्यालय से इतिहास में पीएचडी कर रही हैं। अपने बारे में थोड़ा और बताते हुए सुमन कहती हैं, मुझे घूमने, लिखने, पेन्टिंग और फोटोग्रेफी करने का बहुत शौक है। मुझे अपनी संस्कृति से बेहद प्यार है और उसे विलुप्त होने से बचाना चाहती हूं। साथ ही यथासंभव समाज-सेवा करना चाहती हूं।


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