भारत की दूसरी जन्नत में चलेंगे?

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बात 30 नवंबर 2014 की है, जब पूर्वोत्तर संपर्क क्रांति एक्सप्रेस ट्रेन रात साढ़े 11 बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से खुली तो मेरे मन में बहुत सारे रोमांचकारी दृश्य उभरने लगे। मैं पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय में एम. फिल दाखिले की प्रवेश परीक्षा देने जा रहा था। 3 दिसंबर को लिखित परीक्षा और 4 दिसंबर को साक्षात्कार होना था। जिस दिन परीक्षा की तिथि आई थी उसी दिन से मेरे मन में बार-बार यही बात आती रहती कि कितनी जल्दी मैं शिलांग पहुंत जाऊं। अब मन में तीव्र इच्छा होने लगी वो सब देखने और जानने की जो मैं बचपन से सिर्फ पढ़ता और सुनता आ रहा था। पूर्वोत्तर के विषय में पहले से बस इतना ही जानता था कि वहां सात राज्य हैं, उनकी राजधानी कौन-कौन सी है, और यह भी की दुनिया का सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी (अब मासिनराम) मेघालय राज्य में है, अरुणाचल प्रदेश में सूर्य सबसे पहले निकलता है, असम में ब्रह्मपुत्र नदी बहती है और भारत के पड़ोसी देश चीन, म्यांमार, भूटान और बांग्लादेश नॉर्थ ईस्ट भारत के पड़ोसी है।

मुझे तब एंट्रेंस देने जाने से ज्यादा खुशी इस बात की थी कि विश्व की सर्वाधिक वर्षा जिस स्थान पर होती मैं उस स्थान पर जा रहा हूं। जो बातें कभी अक्षरों और किताब के पन्नों तक सीमित थीं वो अब हकीकत बनने वाली हैं। पहाड़ देखूंगा, बादल देखूंगा, ट्रेन से प्राकृतिक सौन्दर्य का लुफ्त उठाऊंगा और जहां सर्वाधिक वर्षा होती है वहां जाकर नहाऊंगा, ये सारी बातें मेरे मन में बार- बार हलचल पैदा कर रही थीं। रात को 12 बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से ट्रेन थी। रात को ट्रेन में जाते ही सभी यात्रियों की तरह मैं भी सो गया। अगले दिन सुबह जब नींद खुली तो 10 बज चुके थे। मैंने अपने कम्पार्टमेंट के एक यात्री से पूछा ‘भाई कौन सा स्टेशन आने वाला है’, उसने बताया कि कानपुर अभी थोड़ी देर पहले आया था। मैं नीचे आकर बैठ गया और थोड़ी देर बाद एक चाय वाला आया तो उससे चाय लेते हुए पूछा, ‘भाई अब कौन सा स्टेशन आएगा’ उसने बताया ‘इलाहाबाद’। मैंने पूछा ‘राइट टाइम चल रही है क्या’? उसने बताया ‘नहीं 4 घंटे लेट है’। सर्दियों के महीने में तो हम सब जानते ही है, अमूमन सभी ट्रेनें लेट ही रहती हैं। यही हमारी भारतीय रेल की पहचान बन चुकी है।

मैं एक घंटे तक नीचे वाले सीट पर बैठ कर बाहर का नजारा देखता रहा। फिर अचानक से एक यात्री जिसकी नीचे वाली बर्थ थी। उसने पूछा, ‘कहां जाओगे?’ मैंने उन्हें बताया ‘गुवाहाटी’, फिर पूछा किस लिए जा रहे हो? मैंने उन्हें बताया। वो तीन लोग थे। वे भी गुवाहाटी जा रहे थे। वो तीनों असम के रहने वाले थे और दिल्ली में रहते थे। हमारे आलवा उस कम्पार्टमेंट में दो अरुणाचल प्रदेश, एक मणिपुर और असम का ही एक और यात्री था। धीरे- धीरे उन तीन के अलावे बाकी यात्रियों से भी बातचीत होने लगी। तीनों असमिया और एक अरुणाचली, ये चारों लोग ताश खेलने लगे। थोड़ी देर के बाद मैं ब्रश कर के घर से जो खाने का सामान लाया था वो खाया और अपने बर्थ पर जा कर पढ़ने लगा। सोचा थोड़ा बहुत पढ़ भी लूं ,इतनी दूर जा रहा हूं परीक्षा देने अगर पास नहीं हुआ तो घर वाले भी क्या बोलेंगे।

लगभग दो घंटें के बाद मैं नीचे आया और फिर एक कप चाय ली। इलाहाबाद आ चुका था। इधर ताश खूब जम रही थी। मुझसे से भी उनलोगों ने खेलने को कहा पर मैंने मना कर दिया। ताश तो मुझे आती थी लेकिन मैं यह जनता था कि अगर एक बार बैठ गया खेलने तो फिर जल्दी उठ नहीं पाऊंगा। वो खेल रहे थे मैं उन्हें देख कर ही आनंद ले रहा था और साथ में उनसे बातें भी कर रहा था। नॉर्थ ईस्ट और मेघालय से संबन्धित अपनी जिज्ञासाओं को शांत कर रहा था। इन यात्रियों पर मैं अपने प्रश्नों की बौछार किए जा रहा था और वे बहुत धैर्य और सहजता से उनका उत्तर दे रहे थे।

अधिकांश हिन्दी भाषी लोग नॉर्थ ईस्ट के लोगों के संबंध में जो सोचते हैं वे लोग उन से बिलकुल ही अलग थे। वे मुझसे हिन्दी में बातें कर रहे थें और वे आपस में अपनी भाषा में, असमिया में। मणिपुर वाला हिन्दी ठीक से नहीं बोल पा रहा था, लेकिन बाकी सभी अच्छे से बोल और समझ ले रहे थे। अरुणाचली से भी मेरी बात होती रही। शाम तक मेरी उन सभी यात्रियों से एक तरह से मित्रता हो गयी और आपस में राजनीति की बातें भी होने लगी। ऐसे ही बातचीत और खाते- पीते रात को सब सो गए। थोड़ी देर पढ़ने के बाद मैं भी सो गया।
अगले दिन सुबह के 6 बजे मेरी नींद खुल गयी। तब तक ट्रेन न्यू जलपाईगुड़ी आ चुकी थी। चाय, पानी और अखबार वालो की आवाज से मेरी नींद खुल गयी। मैंने एक कप चाय ली और उससे पूछा तो उसने बताया, ‘ट्रेन 6 घंटें लेट हो चुकी है’। रात के 12 बजे वहां पहुंचने का समय था परंतु ट्रेन सुबह के 6 बजे न्यू जलपाईगुड़ी पहुंची।

मैंने चाय पी और फिर पढ़ाई करने लगा। सभी यात्री थोड़ी देर में उठ गए। सभी को गुवाहाटी जल्दी से जल्दी पहुंचने की फिक्र होने लगी। सब बैठ कर एक-दूसरे से बातें कर रहे थें। मैं भी उनके साथ बात कर रहा था, पढ़ भी रहा था और साथ-साथ बाहर का खूबसूरत नजारा भी देख रहा था। ट्रेन बंगाल में चल रही थी। कभी चाय के बगीचे तो कभी अनानास के खेतों के बीच ट्रेन अपनी अधिकतम गति पकड़ चुकी थी। मैं बाहर के उन नजारों का लुफ्त उठाए जा रहा था। ट्रेन का गुवाहाटी में पहुंचने का समय 8:45 बजे का था परंतु वह शाम को लगभग 4 बजे पहुंचती है। उस दिन यानि कि 2 दिसंबर को मुझे गुवाहाटी में ही रुकना था। स्टेशन के बगल में सीआरपीएफ के ट्रांसिट कैंप में मुझे रुकना था।

पहली बार मैंने इतनी लंबी यात्रा की थी, लगभग 40 घंटें की। काफी थक चुका था। कैंप पहुंच कर चाय पी कर आराम किया। रात का खान खाया और फिर पढ़ने लगा। 12:30 बजे सो गया और सुबह 4 बजे का अलार्म लगाया था मैंने। सुबह में अपने समय से उठ कर तैयार होकर 4:30 बजे स्टेशन के लिए निकला और लगभग 10 मिनट में स्टेशन पहुंच गया। 5 बजे 10 सवारी को लेकर सूमों का ड्राइवर गाड़ी आगे बढ़ता है। लगभग 30 मिनट की यात्रा के बाद हवा की ठंढक और कुहासे के बीच से धीर-धीरे गुजरती गाड़ियां बहुत आनंदित कर रही थी। कभी ऊंचें पहाड़ दिखते तो कभी कुहासा गाड़ी में आकर चेहरे पर स्पर्श करता। रह-रह कर मुझे नींद भी आ रही थी, लेकिन मैं सो नहीं रहा था। इन्हीं नजारों को देखने के लिए मैंने इतना इंतजार किया था। ऐसे दृश्य जिनकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।

डेढ़ घंटें बाद लगभग 6:30 बजे गाड़ी नोंगपो में एक ढाबे के सामने रुकती है जहां सभी यात्री उतर कर कुछ खाते- पीते हैं। मैंने भी चाय पी। वहां की चाय थोड़ी अलग थी। पंद्रह बीस मिनट के बाद गाड़ी वहां से चलती है। अब पूरा वातावरण एकदम साफ हो चुका था। सूरज की रोशनी से पहाड़ों के पेड़ रत्न के समान चमक रहे थे। सड़क के दोनों ओर के पहाड़ मानो ऐसा अहसाह करा रहे हो मानो सड़क उनके बीच नदी के समान आगे बढ़ रही हो। टू-लेन सड़क को फोर-लेन बनाया जा रहा था इसकी वजह से सड़क की स्थिति काफी दयनीय थीं और उनपर गाड़ियों की रफ्तार धीमी हो गयी थी। यह सड़क जोराबाट से शिलांग होते हुये मिजोरम जाती है। यह राष्ट्रीय राज मार्ग संख्या 6 है। लगभग 7:30 बजे गाड़ी बड़ा पानी पहुंचती है। वहां पहुंच के मैंने जो नजारा देखा वो सिर्फ फिल्मों में ही देखा था।

कुछ क्षण के लिए मेरी आंखों की पुतलियां मानो यह विश्वास करने को तैयार ही नहीं थीं, उनका ऊपर नीचे होना मानो बंद हो गया। ‘उमियम लेक’ जो प्रकृति का वरदान है। बहुत बड़ी झील है, शायद उसी के नाम पर उस जगह का नाम ‘बड़ापानी’ है। चारों दिशाओं से पहाड़ उस झील को अपने में कैद किए हुये है मानो जैसे मदारी का खेल देखने के लिए लोगों का हुजूम मदारी को चारों तरफ से घेर लेता है। उन लम्हों को मैं अपने फोन में कैद कर लेना चाहता था। मैं अपने फोन से दर्जनों फोटो लिए जा रहा था उस अद्भुत दृश्य का। पहाड़ के ऊपर जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ रही थी उस झील की सुंदरता मानो और निखरती जा रही थी। ऊपर से नजारा कुछ और ही था। पूरा पहाड़ पाईन ट्री की हरियाली से ढका हुआ था। पूरा पहाड़ मानो जैसे पाईन ट्री की सुंदरता से हिलोरे मार रहा हो। ऐसा लग रहा था मानो चीर के वृक्ष और सूरज की किरणों के बीच युद्ध हो रहा हो। ऐसा लग रहा था सूरज की रौशनी चीर के वृक्ष को भेद कर अपनी रौशनी से सड़क को उज्ज्वलित करना चाह रहा हो तो वही चीर का वृक्ष अपनी छाया से सड़क को ढक लेना चाह रहा हो। इन दृश्यों को निहारते हुये कब मावलई पहुंच गया पता ही नहीं चला।


8 बजे मैं मावलई पेट्रोल पंप पर सूमों से उतरा और वहां से नेहु की टैक्सी ली। 10-12 मिनट में नेहू पहुंच गया। पूरा विश्वविद्यालय परिसर चीर के वृक्ष से मानो सजा हुआ था। जिस प्रकार स्त्री की सुंदरता को आभूषण निखार देते है उसी प्रकार चीर के वृक्ष उस परिसर की सुंदरता में चार चंद लगा रहे थे। चीर रूपी आभूषण से पूरा विश्वविद्यालय परिसर आभूषित हो रहा था। वहाँ की सूरज की किरणें मानो सर्दी में भी चुभ रही थी। इतनी साफ सफाई शायद मैंने पहले कभी कहीं और नहीं देखी थी। चारो तरफ पाईन ट्री की हरियाली दूर ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और आसमान एकदम नीला। कंपकपाने वाली ठंढ। विभाग के बाहर बने बस स्टॉप पर बैठ कर वहाँ की खूबसूरती को चारों ओर घूम-घूम कर निहारता रहा और विभाग खुलने का इंतजार करता रहा। 9 बजे विभाग खुला तब तक अन्य परीक्षार्थी भी आ चुके थे। परीक्षा के पहले की औपचरिकताएं पूरी की गयी। सुबह 10 बजे से लेकर 11 बजे तक परीक्षा हुई। लिखित परीक्षा खत्म होने के बाद सूचना दी गयी कि जो बच्चे बाहर से आए हैं उनका साक्षात्कार आज ही होगा।

आधे घंटे के ब्रेक के बाद साक्षात्कार 12 बजे से शुरू होगा, सभी बच्चे यहाँ समय पर उपस्थित रहेंगे। उनका बाहर से मतलब एयइसे छात्र जो उस विश्वविद्यालय के नहीं थे बल्कि बाहर से आए हुये थे। सभी बच्चे पास ही बने एक कैंटीन में खाने चले गए मैं भी उनके साथ गया। मेन्यू देख कर मैंने आलू का पराठा और चाय ऑर्डर किया। कैंटीन में ही देश के सभी क्षेत्रों से आए हुये बच्चों से बात-चीत होने लगी। आप कहां से आए हैं? आपने एम.ए कहां से किया है? शिलांग कैसे आये? नेहू के बारे में में किसने बताया? किस ट्रेन से आए?

12:15 में साक्षात्कार शुरू हुआ। मेरा 2 बजे साक्षात्कार हुआ। साक्षात्कार कक्ष से बाहर निकलते ही मन बहुत शांत और हल्का महसूस हो रहा था। क्योंकि अब मैं शिलांग की खूबसूरती का मजा लेने के लिए बिलकुल तैयार हो चुका था। थोड़ी देर बाद मैं विभाग से बाहर निकलता हूं और गेट न. 2 से पोलो की टैक्सी लेता हूं। मेरी दिल्ली वापस आने की ट्रेन 6 दिसंबर को थी ताब तक मैं पोलो में ही सीआरपीएफ के कैंप में रुकने वाला था। बाकी के 3 दिन मैं शिलांग का मजा लेने वाला था। 10 मिनट में मैं पोलो पहुंच गया। वहां अपना सामान रखा और फ्रेश होकर बाहर निकला। बहुत ही तेज भुख लगी हुई थी। बाहर निकला तो पूरा अंधेरा हो चुका था। शिलांग में सूर्योदय और सूर्यास्त बहुत जल्दी होता है। 4 बजे ही पूरा अंधेरा हो गया। उस दिन तो मैं इतना थक चुका था कि कहीं घूमने भी नहीं जा सकता था। बगल में ही एक मिठाई की दुकान पर गया और वहाँ समोसे और चाय पी कर कैंप में वापस चला गया। रात को जल्दी ही खाना खा कर सो गया।

4 दिसंबर को सुबह 8 बजे उठा और 9 बजे ब्रेक फास्ट कर के निकल पड़ा शिलांग की सैर पर। नयी जगह थी मेरी लिए कुछ भी पता नहीं था, पर पिछले दो-तीन दिनों में मैंने जो थोड़ी बहुत जानकारी ली थी वो काम आने वाली थी। कैंप में मैंने पुलिस वालों को बताया की मेरे पास दो दिन है और मैं इन दो दिनों में कहां-कहां घूम सकता हूं। उनके बताए अनुसार सर्वप्रथम पोलो से मैं बस पकड़ कर पुलिस बाजार यानि कि गया। पीबी शिलांग का सर्वाधिक चहल-पहल वाला स्थान है। यहां सुबह के 5 बजे से ही खाने पीने के ठेले लग जाते है और टैक्सी, सूमो वाले की आवाज गोटी, गोटी, गोटी कानों में गूंजने लगती है। गोटी अर्थात गुवाहाटी। शिलांग और सिल्चर की गाडिया यहीं से मिलती है। यहां पर शॉपिंग के लिए बड़े-बड़े शो रूम्स, कपड़ो के, जूतों के, इलेक्ट्रॉनिक्स के, रिलायंस स्टोर, विशाल मार्केट हैं। खाने के लिए भी बहुत सारे रेस्ट्रोरेंट्स हैं।

दिल्ली मिष्ठान, बड़े मियां उनमें से ही है जिसमें मैंने खूब जलेबी और रोल खाया। यही पर बहुत सारे सिनेमा हॉल भी है। मुझे आश्चर्य तो तब हुआ जब मैंने देखा कि वहां के सिनेमा हॉल में भोजपुरी फिल्में भी प्रदर्शित होती हैं। हिन्दी, इंग्लिश और खासी फिल्में तो चलती ही हैं। पीबी हार्ट ऑफ दी सिटी है।


पीबी में काफी देर पैदल घूमने के बाद वहीं पास के एक पार्क ‘वर्ड्स लेक’ में गया। जिसके बारे में मुझे पुलिस वालों ने बताया था। बहुत सुहावना दृश्य था उस पार्क का। 15-20 मिनट तक वहां घूमता रहा और लोगों को देखता रहा। बूढ़े, बच्चे, युगल जोड़े सभी थे उस पार्क में। एक तरह से वह फैमिली पार्क था। वहां बोटिंग हाउस भी था जहां मैंने भी बोटिंग की। मैंने अकेले ही बोटिंग का आनंद लिया। वहां से फिर पीबी टैक्सी स्टैंड गया। मैं वहां से शिलांग पीक जाने के लिए टैक्सी बुक कर रहा था। टैक्सी वाला मुझे बाहरी समझ कर 400-500 रुपये मांग रहा रहा था जबकि पुलिस वालों ने मुझे 250- 300 रुपये से ज्यादा देने को मना किया था। टैक्सी वाले नहीं माने फिर मैंने वहां जाने का प्लान कैन्सल कर दिया।

दिन के 2 बज चुके थे, मुझे 6 बजे तक कैंप में जाना था। मैंने उसी के हिसाब से अपना आगे का कार्यक्रम तय किया। मैं एक बस पर बैठ कर बड़ा बाजार गया। बड़ा बाज़ार वहां का प्रमुख व्यापारी केंद्र और थोक मंडी है। वहां सब्जियों से लेकर मीट और फल-फूल सभी सस्ते दामों पर मिलते है। बड़ा बाजार घूमने के बाद मैं वहां से पैदल पीबी आ गया। वही पर एक बहुत बड़ी हैंडीक्राफ्ट की दुकान थी जहां से मैंने बहुत सारी खरीदारी की। लकड़ियों और बांस से बने हुये बैग, बच्चों के छोटे-छोटे खिलौने, कीरिंग आदि। 4 बज चुके थे। 6 बजे तक मुझे कैंप भी जाना होता है और मैं काफी थक भी गया था, तो उस दिन मैं लौट गया। जब पीबी से पोलो आया तो ऊपर से बहुत ही मनोरम दृश्य देखने को मिला। पूरा पहाड़ कृत्रिम रौशनी से जगमगा रहा था। उस दिन भी मैं जल्दी ही खा कर सो गया।

अगले दिन 5 दिसंबर को सुबह नाश्ते के बाद पोलो में ही स्थित स्टेडियम घूमने गया। वहां फुटबॉल मैच चल रहा था, मैं भी बैठकर देखने लगा। 1 घंटें मैच देखने के बाद मैं वहां से डॉन बॉसको म्यूजियम गया। मैंने पहली बार इतनी विविधताओं से भरा हुआ म्यूजियम देखा। पूर्वोत्तर के सभी 8 राज्यों के अलाव बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार की पूरी संस्कृति और इतिहास मानो मेरे सामने प्रत्यक्ष दिख रहा हो। मुझे ऐसा लग रहा था मानो मैं उस इतिहास को आज जी रहा हूं। 6 मंजिला यह म्यूजियम नॉर्थ ईस्ट और उसके पड़ोसी देश की संस्कृति की सम्पूर्ण झलकियां दिखाता हैं। डिजिटल म्यूजियम सब कुछ ऑटोमैटिक। हॉल में जाते ही सारी लाईट खुद से जल जाती हैं और निकलने पर खुद ही ऑफ हो जाती है। इतना बड़ा म्यूजियम है कि एक दिन में घूम ही नहीं सकते।

सबसे ऊपरी मंजिल पर एक व्यू-पॉइंट बना है जहां से लगभग आधे से ज्यादा शिलांग दिखता है। पूरा प्रकृतिक सौन्दर्य वहां से दिखता है। सबसे नीचे एक हैंडिक्राफ्ट की दुकान है। वहां से भी मैंने बहुत सारे सामान खरीदे। मैं थोड़ा जल्दी-जल्दी कर रहा था क्योंकि अंधेरा हो गया था और मुझे कैंप भी जाना था। मैं कैंप का जिक्र बार-बार इसलिए कर रहा हूं क्योंकि उसकी वजह से ही मैं सब कुछ समय पर कर पा रहा था। वहां तय समय पर सब कुछ होता है। थोड़ी देर भी लेट हुए तो खाना नहीं मिल पाता। इसलिए मैं समय पर पहुँच जाता था। जब म्यूजियम से बाहर निकला तो मुझे ऐसा आभास हुआ जैसे मैं अभी कोई दूसरी दुनिया से आ रहा हूं। मैं बाहर निकल कर भी जैसे उस म्यूजियम में ही था। उस म्यूजियम ने मुझे नॉर्थ ईस्ट के इतना करीब ला दिया जैसे मैं नॉर्थ-ईस्ट में बचपन से रह रहा हूं।

उन 4-5 दिनों मे मैं नॉर्थ ईस्ट को इतने करीब से जाना कि पूर्व की सभी सुनी सुनाई बातें धरी रह गईं। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि हिन्दी भाषी लोग जिस नॉर्थ-ईस्ट को जानते है वह तो उससे बिलकुल ही भिन्न है। एकदम अलग। प्रकृति की असली सुंदरता यहीं है। मैं न तो पूरा शिलांग ही घूमा न ही मेघालय और न ही नॉर्थ ईस्ट के बाकी के 7 राज्य। परंतु उन तीन दिनों में ही एक राज्य वो भी उसका एक छोटा सा हिस्सा घूम कर मैं नॉर्थ ईस्ट का फैन हो गया। उस दिन मैं मन ही मन यह भी प्रार्थना कर रहा था की मेरा एम. फिल में एडमिशन हो जाए। इन्हीं सुंदरताओं की वजह से शिलांग को पूरब का स्कॉटलैंड कहा जाता है। उस दिन मैं म्यूजियम की दुनिया में खोये-खोये सो गया। अगले दिन सुबह 7 बजे गुवाहाटी के लिए सूमो में बैठ गया। मेघालय की मेरी पहली यात्रा यहीं समाप्त हो गयी।


दिलकश शिलांग की अपनी इस प्यारी सी यात्रा के बारे में हमें लिख भेजा है अतुल वैभव ने। अतुल खूब लंबा सा लड़का है, बातें भी उतनी ही लंबी-लंबी करता है। जब भी मिलता है तो बोलता है कि असली स्वर्ग तो नॉर्थ इंडिया है। हर किसी को वहां घूमकर आना चाहिए, अरे मैं तो कहता हूं वहीं बस जाना चाहिए सबको। दो साल रहकर वहां पढ़ाई की है लेकिन जैसे लगता है इसका नॉर्थ इंडिया से जन्मों का नाता है। 


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